बेपरवाहियां
दिल ने लीं अब ओढ़ बे-परवाहियाँ,
रूठ जाए रब या रूठे माहियां,
वक़्त वो कुछ और था सुनिये ज़रा
जब डराती थीं हमें तन्हाईयाँ,
ख़ुद अकेले माद्दा रखते हैं हम,
क्या बिगाडेंगी ये अब रुसवाइयां,
देख पाए जो न एक बारात तक,
वो बजायें आजकल शहनाईयां,
जिनकी आधी बात में भी दम नहीं,
नापते हैं दिल की वो गहराइयां .....
#उर्मिलामाधव...
18.8.2017..
Comments
Post a Comment