घर है, पर्दे नहीं
घर है
पर्दे नहीं हैं,
कालीन से ढका,
फर्श नहीं है,
एक बड़ा फर्श है ,
बैठ जाते हैं,
सब उसी पर
एक जगह,
बातें भी हैं,
जाने कहाँ-कहाँ की,
रसोई में एक गैस का चूल्हा,
जिसपे बन जाती है चाय
पूरे कुनबे की एक ही बार में,
चाय के साथ,
समोसे नहीं,
खाई जाती हैं गप्पें,
प्राइवेसी शब्द कोई नहीं जानता,
या जानना नहीं चाहता,
एक भरपूर सुकून,
सब चेहरों पर,
खाना बनाती हैं,
घर की महिलाऐं,,
बांट लिए हैं काम,
क्षमताओं के मुताबिक,
स्वयम ही,
बिना किसी दबाव के,
सब अपने कामों को
देते हैं अंजाम,
क़ाबिलियत से,
कोई नहीं चाहता सोने का
खूबसूरत पिंजरा,
खुले आसमान की खूबसूरती
दिलों का सुकून,
चेहरों की ख़ुशी,
एक लम्हा आज़ादी,
इससे बढ़कर
कैसे हो सकता है,
कोई सोने का मक़बरा,
चुनने में भूल हो गई,
सोने के नाम पर जिसने भी
मक़बरा चुना,
उसके साथ चुन ली,
एक अंतहीन क़ैद,खामोश आंसू ,
बहुत कुछ अनकहा सा......
उर्मिला माधव्.....
18.8.2017
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