शरमाते हुए
दम ब दम चलते रहे हम यूं ही घबराते हुए,
हर समां देखा किये आते हुए जाते हुए,
हमने जाना ही नहीं इक जलवा अफ़रोज़ी का तौर
जब कहीं पहुंचे भी तो बस ठोकरें खाते हुए,
हमने हर इल्ज़ाम को सुन कर कभी टाला नहीं,
सब हमीं को देखते थे हमको सिखलाते हुए,
इक अजब सी कैफ़ियत से रु ब रु होते थे हम,
लोग जब जब देखते थे हमको शरमाते हुए
हम ज़बानी हर ज़मा ख़र्चे पा क्या करते यक़ीन,
झूट सर चढ़ बोलता था, सच को झुठलाते हुए
उर्मिला माधव
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