तस्वीरें खिंचवाते हैं और लोग खड़े राह जाते हैं,
अर्थी के उठ जाते ही सब ख़्वाब पड़े रह जाते हैं,
बड़ी-बड़ी दीवारों वाले भीतर-भीतर घुटते हैं
कोई क़ीमत नहीं किसी की बड़े-बड़े रह जाते हैं,

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