मेरे इन्तज़ाम से

जनाब राहत इन्दौरी जी के शेर पर फिल्बदीह में  लिखे गए अशआर...
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जो मुतमईन नहीं थे मेरे इंतजाम से,
चर्चे हज़ार करते रहे.....मेरे नाम से,

दिल में चुभन हुई तो मेरा रुख़ बदल गया,
मैंने नवाज़ डाला उन्हें ख़ाली जाम से,

आखिर मुझे भी हक़ था कहीं ऐसा कुछ करूँ,
कुछ तो निजात पाऊं,ज़रा गम की शाम से,

कहते थे लोग मुझको बहुत ख़ूब मेजबान,
करदीं गुज़ारिशात हर इक ख़ास-ओ-आम से,

कैसा ख़ुलूस,कैसा अदब,कैसी इल्तिजा,
चिलमन गिराके बचती रही एहतिराम से,

अजदाद पुर ख़ुलूस रहे,उम्र भर जनाब,
इज्ज़त जुड़ी हुई थी,बहुत इस कयाम से,

ग़ैरत कचोटती थी मुझे दिल ही दिल में ख़ूब,
शर्मिंदा ज़िंदगी थी बहुत अपने काम से,
उर्मिला माधव

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