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Showing posts from February, 2020

नज़र रखिये

अपने जज़्बात पे नज़र रखिये, दिल की हर बात पे नज़र रखिये, अश्क़ बहना तो बे-गुनाही है, सिर्फ़ तादात पे नज़र रखिये, ग़म पसे पर्दा-ए-हिज़ाब रहें, अपने हालात पे नज़र रखिये, दर्द हद से गुज़रना ठीक नहीं, इसकी इफ़रात पे नज़र रखिये, दिन का ढलना तो तयशुदा ही है, अब तो बस रात पे नज़र रखिये, #उर्मिलामाधव.... 1.3.2015

शामिल नहीं

मैं किसी भी जंग में शामिल नहीं, और किसी भी ख़्वाब पै माइल नहीं, जिसको हसरत है वो रख्खे ताज भी, ख़्वाहिशों की मैं कभी काइल नहीं, उर्मिला माधव

आसान हूँ

सब समझते हैं बहुत आसान हूँ, जैसे मैं दिलजोई का सामान हूँ, दिल्लगी करते हैं मुझसे बेसबब, बेरुख़ी का मैं अजब उन्वान हूँ, मेरी जानिब से सभी आज़ाद हैं, मैं तो अपने आप में ज़िंदान हूँ, मेरा अपना आशियाँ आबाद है मैं ही सदियों से बहुत वीरान हूँ, ये समझ कर भूल मत करना कभी, तुर्शी-ए-अहबाब से ...हलकान हूँ, लोग मिलते हैं तो हंस देती हूँ बस, पर किसी हरक़त से कब अनजान हूँ... उर्मिला माधव.. 2.3.2017

लगाए रख्खा

बे-वफ़ा दोस्त को ...सीने से लगाए रख्खा, उसने भी झूठ को हर दर्ज़ा निभाये रख्खा, उसकी ख़ामोश सी रंजिश को हवा देते रहे, हमने मुस्कान को होठों पै सजाये रख्खा, हम दिखाने में कसर किसलिए रखते बोलो, हमने हर लम्हा उसे दोस्त जताए रख्खा , हमको हर बात की हर बार ख़बर होती रही, हमने हंस-हंसके हर इक राज़ छुपाये रख्खा, उर्मिला माधव... 1.3.2015...

फीकी लगती है

जब उलझन हो दुनिया फीकी लगती है, जितना देखो उतनी तीखी लगती है, तुम कहते हो अच्छी है तो अच्छी होगी, हमको ये सब ख़ुद पर बीती लगती है, उर्मिला माधव

चाहते हैं

सबसे अव्वल बात तो नज़दीक आना चाहते हैं, और फिर नज़दीक आकर,दिल दुखाना चाहते हैं एक मुद्दत से मुझे ...........तन्हाई घेरे फिर रही  उसपे ये मुश्किल वो मुझसे एक ज़माना चाहते हैं, मैं हूँ और इस ज़िन्दगी के कितने सारे मसअले, क्या ख़बर के लोग क्या झगड़े चुकाना चाहते हैं, उर्मिला माधव 29.2.2016

चिलमन

मैं अश्कबर हूँ न कोई देखे, यूँ रुख पे चिलमन गिराई हमने, न कोई आहों का दर्द जाने, यूँ बात हँसके छुपाई हमने। हमें मुहब्बत थी आँधियों से, तो कैसे तूफ़ाँ से बच निकलते, कि अपने जज़्बे पै धूल रखके, ये शम्मे महफ़िल सजाई हमने। वो संगदिल थे ये मेरी किस्मत, तो फ़िर ज़माने को क्या बताते, क्यूँ रो रहे हैं यूँ दिल ही दिल में, ये बात सबसे छुपाई हमने ।।..... उर्मिला माधव.. 28.2.2013

ख़ासमख़ास तक

तीन शेर--- ----------- आज ये ज़ाहिर हुआ है यक-ब-यक, साथ भी देगी नहीं जब सांस तक , राब्ते अब तक रहे जो राह से, क्या चलेंगे आख़री एहसास तक ??   कोई भी यकता नहीं इस खेल में, हो गए ख़ामोश ख़ासम ख़ास तक..... उर्मिला माधव... 28.2.2014. यकता---अद्वितीय  राबता---सम्बन्ध

संवरते रहे

एक मतला दो शेर... -------------------- चाह मिलने की लेकर.....संवरते रहे, सीढियां घर की......चढ़ते-उतरते रहे , उनकी गलियों का नक्शा लिए हाथ में, कुछ लकीरों से कागज़ को भरते रहे.. क्यूंकि हिम्मत हमारी दगा दे गयी, दिल ही दिल में अकेले बिखरते रहे, उर्मिला माधव... 28.2.2014..

ख़ुदकुशी से बचते हैं

लोग तो ख़ुदकुशी से बचते हैं, हम हैं के ज़िन्दगी से बचते हैं, एक ही जिस्म है सो मिट्टी का, एहतियातन नमी से बचते हैं, किस लिए दर्द में इज़ाफ़ा हो, इश्क़ ऑ दिलबरी से बचते हैं, जिस्म को अब कहां सहूलत है, इसकी रस्साकशी से बचते हैं,

पसीना है

"आँसू से भरी हैं ये आँखें,ज़ख़्मों से भरा ये सीना है, बरपा है क़हर तक़लीफों का,आया होठों पै पसीनाहै, हर ज़ख़्म लहू जब देता है,मजबूर नज़र चकराती है, तू शान-ए-क़रीमी रख अपनी तूफाँ में आज सफीना है।।  उर्मिला माधव... 27.2.2014

मिल जाएंगे

मेरे घर तशरीफ़ जब भी लायेंगे, ग़म दरीचों पै रखे मिल जायेंगे, क्या ही इस्तक़बाल होगा आपका,  जब दर-ओ-दीवार भी गिर जायेंगे, और कहीं मलबे के नीचे ढेर में, कुछ निशाँ नाचीज़ के मिल जायेंगे, #उर्मिला माधव... 27.2.2015...

रेशम की गांठें

हमारी डायरी से---- फ़क़त रेशम सी गांठें थीं...ज़रा सी खोल ली जातीं,  जो बातें दिल को चुभती थीं,जुबां से बोल लीं जातीं, अगरचे खौफ़ इतना था...कोई दिल पर न लेजाये,  कहीं कहने से पहले एहतियातन...तोल ली जातीं, मुहब्बत को सलीके से....निभाना ही नहीं था तब,  ज़रुरत क्या थी ऐसी मुश्किलें खुद मोल ली जातीं, फरेब-ओ-मख्र में,फंसना,फंसाना शौक था जिनका,  दरीचे झाँकने को तब.........ज़मीनें गोल ली जातीं, किसीका क़त्ल करने को...हुनर की क्या ज़रुरत थी,  कि बस हाथों की तलवारें....ज़हर में घोल ली जातीं... #उर्मिला माधव... 27.2.2015...

कन्याओं को समर्पित

सभी कन्याओं को समर्पित.... ज़बरन पैदा होगये वरना हमको लोग भगा देते, अगर ज़रा भी बस में होता जिंदा ही दफ़ना देते, क़िस्मत के आगे दुनिया का जोर न चल पाया वर्ना, लोगों के ग़र बस में होता,वहीँ कहीं सुलटा देते.... #उर्मिला माधव... 27.2.1015

बिस्मिल कौन है

फ़िलबदीह का हासिल ढूंढिए इस शह्र में अब रूह-ए-बिस्मिल कौन है  और ज़रा बतलाइये किसके मुक़ाबिल कौन है मैंने मीज़ानों से पूछा,ताक़ पर रख कर ज़मीर अपनी इन बर्बादियों में और शामिल कौन है खुद हवाले करके जिसने,कश्तियाँ तूफ़ान में बादबां से जाके पूछा मेरा साहिल कौन है, ये नसीमे ख़ारो ख़स किसने जलाया आग में आबशारों ने ये सोचा ,इतना जाहिल कौन है, बर्फ़ का सीना पिघल कर एक दरिया हो गया, कौन ठहरा था यहाँ पर,इतना माइल कौन है, Urmila Madhav.... 27.2.2016

थी ही नहीं

अपनी कोई बिसात थी ही नहीं, बस तो फ़िक़्र-ए-हयात थी ही नहीं, अब मुहब्बत भी कोई क्या करता, मुझमें तो ख़ास बात थी ही नहीं, ये तो किस्मत की ख़ास ख़ूबी है, इसमें कोइ चाँद रात थी ही नहीं, सबसे कमतर थी,साफ ज़ाहिर है, शब् थी,शब-ए-बरात थी ही नहीं, चूँकि कुछ हैसियत से ऊपर थे, यूँ भी हक़ में ज़कात थी ही नहीं, उर्मिला माधव, 28.2.2017

बता रहा है कोई

बड़े अदब से मुझे ये बता रहा है कोई, अभी न जाओ अभी मिलने आ रहा है कोई, मुझे सुपुर्द-ए- ज़मीं, देर से किया जाए, के वक़्ती तौर का रिश्ता निभा रहा है कोई, अजब चलन है ज़माने का इक ज़माने से, मरे हुए की लहद क्यूँ सजा रहा है कोई, मुझे ख़बर है मिरा और क्या-क्या होना है, के जिस्म-ओ-जान का किस्सा मिटा रहा है कोई, इसी जहान में मुझसे है कोई वाबस्ता, लो मेरी मौत का क़र्ज़ा चुका रहा है कोई, मैं अब तो ख़ाक हूँ नज़रों में इस ज़माने की, अजब जुनून है के अब भी आ रहा है कोई.. उर्मिला माधव 27.2.2018

बुरा माने तो मान

मेरी आदत से अनजान, यार बुरा माने तो मान, अच्छा बुरा,समझना सीख, वरना तेरी तू ही जान, कच्ची गोली खेला है क्या? हुई नहीं अब तक पहचान? तुझको अक़्ल नहीं जो अपनी, आ हम से लेले नादान, कौन सफ़ाई दे ऑ क्योंकर? बड़का बनता है भगवान... उर्मिला माधव 27.2.2018

मत करना

इतनी ऊंची उड़ान मत करना, चाह को आसमान मत करना,   बात कहना तो वो मुक़म्मल हो, अपनी झूठी ज़बान मत करना,  itnii oonchii udaan mat karnaa, chaah ko aasman mat karnaa, baat kahnaa to wo muqammal ho, apnii jhoothii zabaan mat karnaa... उर्मिला माधव... 25.2.2014..

इबादत

Ek matlaa Hamd se.... जिसमें रब की दुआ न शामिल हो, वो इबादत हराम है मुझको, जिसमें रब की रज़ा न शामिल हो, वो इजाज़त हराम है मुझको... :: Jismen rab ki dua n shamil ho, Wo ibadat haraam hai mujhko, Jismen rab ki razaa n shamil ho, Wo ijazat haraam hai mujhko... Urmila Madhav... 25th February 2016

मुस्कुराता है

तू मुझे याद अब भी आता है, रोज़ ख्वाबों में मुस्कुराता है, दिल मगर टूट जो गया है अब, लाख चाहूँ न गुनगुनाता है, बीते लम्हों की याद आते ही, हौसला रोज़ डगमगाता है, तेरी आमद से ये हुआ आख़िर, कुछ अँधेरा भी जगमगाता है, की है हर दायरे की पैमाइश, ज़ाविया देख लडखडाता है, मैं हिफाज़त के साथ सोती हूँ, ख़्वाब में कौन बडबडाता है, मैं मगर रोज़ उठके चलती हूँ, दर मेरा कौन खटखटाता है.... उर्मिला माधव.... 25.2.2016

ख़ूब रहे

गहराई में .....कितने चेहरे डूब रहे, जब तक जीते रहे,जहां में ख़ूब रहे  जब दुनियां जागेगी, दुनियां, बदलेगी, दुनियां के बस यही महज़ उसलूब रहे.. उर्मिला माधव 25.2.2018

क्या होता है

एक मतला दो शेर----- हुए हज़ारों टुकड़े दिल के,और क़हर से क्या होता है?? हम मानिंन्द हुए मुर्दे के,और ज़हर से क्या होता है?? जिसकी हो जागीर हमेशा रहे उसी की मरते दम तक, कोई इस्तक़बाल कहे बस और शहर से क्या होता है??  दीवारों से बने हुए हैं,ताजमहल और मंदिर मस्जिद, आमद-रफ्त बशर की क़ायम और दहर से क्या होता है ?? उर्मिला माधव... 24.2.2014..

घुमाया चाक़ पर

क्या कहें हालात को, तहज़ीब रक्खी ताक़ पर, रंग में कालक मिलाई और घुमाया चाक़ पर  दिल में लाखों मैल लेकर,दिल मिलाने आगये, बे-हयाई का चलन है समझें हैं बेबाक़ पर.... अब वो रंगा-रंग जैसा होलियों का रंग कहाँ, रंग थे होली के गाढ़े,दिल बहुत शफ्फाक़,पर .... वो सुरीले फाग के रंग वो मुग़न्नी अब कहाँ, कौन है बाक़ी मुनक़्क़ीद,ख्वाहिशे,मुश्ताक़ पर, लोग जो जीते थे,ज़ात-ए-किब्रिया के वास्ते, जान दे जाते हैं आख़िर अब हुजूम-ए- शाक़ पर.... #उर्मिला माधव.... 24.2.2015.... शाक़--- मुश्किल  मुनक़्क़ीद---कद्रदान  मुश्ताक़-----अभिलाषी,उत्सुक मुग़न्नी----- गायक

अदावत कर बैठे

हम अपनी अदा के दीवाने,अन्दाज़  में अपने जीते हैं, ऐलान है अपनी जानिब से,जो चाहे बग़ावत कर बैठे, ये ज़ेब भी उसको देता है, जो नया-नया हो दुनियां में, आज़ाद ख़याली है उसकी, जो चाहे शरारत कर बैठे, उर्मिला माधव 23.2.2018

ज़िन्दगी ठहरी हुई झील सी--- फ्री वर्स

जिंदगी, ठहरी हुई झील सी, और ये बिखरी हुई सी बीनाई  मंज़रों की दिलकशी, खोई हुई सी, शाम है धुंआ-धुंआ, और फ़लक सुनसान सा, गो के बिन माह-ओ-अख्त़र सा, ग़म मगर छाती पर, जिरह बख्तर सा, न तीर,न तलवार, न उसकी धार, न किसीका प्यार, न कोई तकरार, न कोई सिंगार, न कोई जीत, न कोई हार, कुछ नहीं समा सकता, जिरह बख़्तर में.... उर्मिला माधव .... 23.2.2016 Zindagi, thahri huii jheel sii, Or ye beenaai, Bikhri huyi sii, Manzaron kii dilkashi, Khoyi hui sii, Sham dhuaan ,dhuaan, Falak sunsaan, Bagair maah-o-akhtar sa, Gam,jirah bakhtar saa N teer,n talwaar,n uski dhaar, N kisika pyar,n kisiki takraar n koi singaar, N koi jeet n haar, Kuchh nahin sama sakta.. Urmila Madhav.... 23.2.2017

याद आ रहा है

कौन मुझको याद इतना आ रहा है, वक़्त फिर से रतजगा,दोहरा रहा है, नींद आँखों से उड़ी जाती है मेरी, और अँधेरा,इस क़दर,गहरा रहा है, ये जो है सैलाब मेरे आंसुओं का, मेरे दिल को बे-वफ़ा ठहरा रहा है, डूबता दिल और मिरी ख़ामोश आहें, उम्र भर उलझन भरा चेहरा रहा है, खुशनुमां हो रौशनी खुर्शीद की प, मेरे दिल में इक फ़क़त सहरा रहा है, कैसे दिल का हाल कोई जान पाए, क्योंकि दिल पर ही अजब पहरा रहा है, उर्मिला माधव। .... 23 .2.2017

जीते हैं---फ्री वर्स

कितने मुखौटे लेके जीते हैं, ज़ख्म सींते है, आंसू पीते हैं, खूब हँसते हैं, मन में रीते हैं, कैसी-कैसी, दुहाई देते हैं, हर तरह ढूंढते, सुभीते हैं, सांस रूकती है, फिर भी जीते हैं, तुम भी जीते हो, हम भी जीते हैं, बात इतनी है, बस फजीते हैं... उर्मिला माधव... 22.2.2014...

डर जाते हैं

हम जो बारिश में कभी भीग के घर जाते हैं, यक़ता आँखों की चमक देख के डर जाते हैं, आईना देखें नहीं,इतनी क़सम दी खुद को,  लाख़ बचते हैं मगर फिर भी उधर जाते हैं,  हमने लोगों से कभी कोई भी शिकवा न किया, अपनी आहट से मगर, लोग बिखर जाते हैं, हमको अंदाज़ मगर इसका कभी हो न सका, किसकी चाहत के कहीं ख़्वाब से मर जाते हैं, ग़म की रफ़्तार तो ठहरेगी नहीं, ज़ाहिर है, चलते-चलते ही कहीं, हम ही ठहर जाते हैं.... उर्मिला माधव.... 22.2.2016

वाह वाह करते रहे

लोग सब वाह-वाह करते रहे, हम हज़ारों गुनाह करते रहे, जैसे भी हो सका जहां भर में, इक मुहब्बत की चाह करते रहे, रोने वालों को सबने रोने दिया, अपने जीने की राह करते रहे, रोने-धोने से क्या गुज़र होती, ज़िन्दगी ख़्वाब गाह करते रहे, सच्ची खुशियां कहाँ मयस्सर थीं, सिर्फ़ ग़म से निबाह करते रहे,   अपनी दुनियां बुलंद करने को, ख़ुद से ख़ुद ही सलाह करते रहे, तेरी दुनियां के सारे तुर्रम खां, देख कर,आह-आह करते रहे, उर्मिला माधव... 7.10.2015

इरादा कर लिया क्या?

फिर से जीने का इरादा कर लिया क्या? तुमने अपने ग़म से वादा कर लिया क्या? आज कल क्या बात से फिरते नहीं तुम? सच बताओ, दिल कुशादा कर लिया क्या? उर्मिला माधव

मिट्टी का बर्तन---- नज़्म

मिट्टी का एक बर्तन बाज़ार से लेआओ, और उसके चन्द टुकड़े तुम राख में दबाओ और रेशमी क़फ़न से एक लाश को सजाओ, सन्दल,अग़र की ख़ुशबू,लोबान भी जलाओ, ग़र हो सके जो मुमकिन तो हार भी चढ़ाओ, तह में दबा लहद के कुछ वक़्त भूल जाओ, शाम-ओ-सहर पहुँच कर तुम मर्सिया भी गाओ, रस्मो रिवाज़ सारे उस लाश के निभाओ, एक रोज़ तह उलट कर देखो ज़रा लहद को, जो एक भी मिले तो लेकर शिनाख़्त आओ, उस लाश-ए-बे क़फन का कुछ तो निशान लाओ, मर्ग-ए-बशर की हालत तफ़सील से बताओ, झूठी बयानबाज़ी कुछ काम न करेगी, इन्सान की हक़ीक़त इन्सान को सुनाओ, अब बर्तनों के टुकड़े भी खोद कर लेआओ, क्या ख़ाक़ होगए हैं,बर्तन के चन्द टुकड़े बर्तन की हैसियत से इन्सान को मिलाओ, ये तल्ख़िए हक़ीक़त हर शख़्स को दिखाओ।....उर्मिला माधव. 0.2.2013.

औक़ात आदमी

माने कि या न माने मेरी बात आदमी, रखता नहीं है कोई भी औक़ात आदमी, देता फिरे ख़िताब से एक दुसरे को रोज़, बस ठग रहा है आपही जज़्बात आदमी, दिल भी मिले ज़रूरी नहीं,हाथ ही मिले,  पहचानता है आदमी की ज़ात आदमी, वादा निबाहने की जुबां रस्म बन गयी,  देता फरेब ख़ुद को यूँ दिन रात आदमी, गद्दीनशीन ख़ुद को समझता है बादशा, तुर्रा तो ये है  उस पै करे घात आदमी, जिंदा जला रहा है कोई ज़िन्दगी मगर, मुर्दे में खोजता है तिलिस्मात आदमी... उर्मिला माधव... 21.2.2014..

जिया करते हैं हम

तनहाई में बात किया करते हैं हम, बस यादों के साथ जिया करते हैं हम, इतनी भीड़ जमा रहती है किस्सों की, इनको ही दिन रात दिया करते हैं हम, यहां किसीकी कोई ज़रूरत है ही कब, प्यार सनम का याद किया करते हैं हम, सहरा में भी दरया का अहसास रहे, अश्कों की बरसात पिया करते हैं हम, महफ़िल की शिरक़त भी भारी लगती है, ख़ल्वत को ख़िदमात दिया करते हैं हम, उर्मिला माधव 20.2.2020

बेटी की सूरत

क्यूँ मुझे बेटी की सूरत बख्श दी, दूसरों के घर को जब अपना कहा, पूछ तो लेते के दिल का क्या हुआ ? आपके खूंटे की गैय्या थी ज़रूर, पर कहो इसमें कहाँ मेरा कसूर? किसलिए मुझको किया नज़रों से दूर? एक कोना भी न था मेरे लिए, रोते-रोते आग के फेरे लिए  जाने किस पल आँख मेरी लग गई  अजनबी से दर पै डोली रख गई, उर्मिला माधव... 19.2.2015

होते हैं

आने वाली ग़ज़ल का मतला--- इस दुनियां में अच्छे-अच्छे दिल वाले भी होते हैं, उन्हें ख़बर क्या गोरे चेहरे, दिल काले भी होते हैं, उर्मिला माधव, 19.2.2017

देखने का चाव

दुनियाँ कैसे चले मुझे देखने का चाव|| एक नदी में जितने धारे, बीच भंवर से करें इशारे, पार चले तो सुनले प्यारे, तू भी आजा साथ हमारे, दुनिया कैसे चले मुझे देखने का चाव|| जो डूबा है उसने पाया, तट पर जो है पहुँच न पाया, सतगुरु ने ये ज्ञान बताया, दास कबीर ने ये ही गाया, दुनिया कैसे चले मुझे देखने का चाव|| उर्मिला माधव... 18.2.2014....

मुकर जाए

एक बार फिर... --------------- वो जो रह-रहके चोट कर जाए, अपने अलफ़ाज़ से..मुकर जाए, आशिक़ी,इश्क एक फजीहत है, जिसको रोना हो वो इधर जाए, दर्द से दिल नहीं मुक़ाबिल हो, खैरियत से ही अब गुज़र जाए, मुझको हंसने को इक बहाना दे, ज़िन्दगी...जाने कब ठहर जाए, ज़ीस्त को जब भी ऐसी ख्वाहिश हो, इतनी तौफीक़ दे.......कि मर जाए, उर्मिला माधव... ६.१०.२०१३..

दर्प से अकड़े हुए चेहरे -- फ्री वर्स

दर्प से अकड़े हुए चेहरे, थक तो जाते होंगे, लगता है  भय पास जाने से, अकड़ सकती है और,अकड़ी हुई गर्दन, उचित कुछ दूरियां,सद्भावना वश, जी रहे अहम् में,कुछ बहम में, घाव भीतर सीं रहे,चुप्पियों के, मिलन से अधिक,जीवन को प्राथमिकता, गर्दन टूट सकती है अधिक अकड़ने से, और फिर मृत्यु !! नहीं-नहीं दूरी उचित है, ऐसे व्यक्तित्व, दया और क्षमा के पात्र ही तो हैं, जाओ क्षमा करते हैं, तुम्हारे जीवन की रक्षा आवश्यक है... क्षमा-क्षमा-क्षमा... गर्दन सीधी करलो ..... उर्मिला माधव... 18.2.2015

दिल थक चुका

Baat kuchh kahni hai dekho,par abhi dil thak gaya, Zindagi sahni hai dekho par abhi dil thak gaya, Shakh se toote hue gunche sametun,kab talak, Lo hawa bahani hai dekho,par abhi dil thak gaya, उर्मिला माधव

अच्छा नहीं है बार बार

अपने दिल को तोडना अच्छा नहीं है बारबार, दर्द की जद में हो चाहे...फैसला हो एक बार, :: हर अना को तोड़ कर इमकान मत कीजे जनाब, हर कोई है मस्त ख़ुद में,कौन किसका ग़मगुसार, :: ज़हमतें क्यों मोल लेना,चाहे-अनचाहे हुज़ूर, मुब्तिला गैरों में रहना,किसलिए दीवानावार? :: दह्र से उम्मीद रखना .......हैं महज़ नादानियां, और अब क्या चाहिए,जब ओढ़नी है तार-तार, :: क्या किसीके दर पै जाना अपने ग़म के वास्ते, खुद ही मुंसिफ़,ख़ुद अदालत,हो रहो ख़ुद पैरोकार... :: apne dil ko todna achchaa nahin hai baar-baar, dard ki jad men ho chahe........faisla ho ek baar har anaa ko tod kar imkaan mat kiije janaab, har koi hai mast khud men,kaun kiska gamgusaar? zahmaten kyun mol lena,chaahe-anchaahe huzoor, mubtilaa gairon men rahnaa,kisliye deewana-waar? Dahr se ummiid rakhnaa,hain mahaz naadaaniyaan, or ab kyaa chahiye,..............jab odhnii hai taar-taar, kyaa kisike dar pe jaanaa,apne gam ke vaaste, khud hi munsif,khud adaalat,ho raho khud pairokaar... Urmila Madhav... उर्मिला माधव... 18.2.2016 दर्द की जद--- दर्द की धार, अना-- स...

आईना हूँ देख लो

ख़ुद ही सूरत,ख़ुद-ब-ख़ुद ही आईना हूँ देख लो, ख़ुद रुबाई खुद-ब-ख़ुद हम्द-ओ-सना हूँ देख लो, पाक़-ओ-ताहिर दिल ये मेरा ग़ैर का तालिब नहीं, ख़ुद मुहब्बत ख़ुद-ब-ख़ुद ही आशना हूँ देख लो, ख़ुद-ब-खुद दीवानगी हूँ,होश भी हूँ,ख़ुद-ब-खुद ख़ुद तग़ाफ़ुल ख़ुद-ब-ख़ुद ही मैं अना हूँ देख लो, उड़ नहीं सकता है मेरे ख़ूबरू हाथों का रंग, ख़ुद ही रंगत,ख़ुद-ब-ख़ुद ही मैं हिना हूँ देख लो, मुश्किलें भी ख़ुद ही आकर मुझ में पिन्हाँ हो गईं, ख़ुद हिफाज़त ख़ुद-ब-ख़ुद ही मैं फ़ना हूँ देख लो, उर्मिला माधव... 15.11.2015 हम्द---ईश्वर की प्रशंसा -तारीफ़  सना-- तारीफ़  पाक़--पवित्र  ताहिर--पवित्र --sacred तगाफ़ुल---उपेक्षा  खूबरू ---सुन्दर  अना--स्वाभिमान  हिना---मेंहदी  पिन्हाँ--- छुपा हुआ  हिफ़ाज़त---सुरक्षा  फ़ना---बरबाद

तस्वीर देखिए

अब ताज़ीरात-ए-हिन्द की तस्वीर देखिये, हर ज़ाविये से मिट रही तक़दीर देखिये, कुछ ठीकरों में बेचता इंसान अपने ख्वाब, चलती कहाँ है कोई भी तदबीर देखिये, उफ़ गर्द में निहां है यहाँ आदमी की ज़ात, हर पाँव अब हुआ है यूँ ज़ंजीर देखिये, रहजन हों सलातीन तो बुनियाद भी है खाक़, लुटती हुई वतन की ये जागीर देखिये, औक़ात अब बशर की कहाँ कोई है जनाब, कुछ शोहदों के हाथ में शमशीर देखिये, उर्मिला माधव... 17.2.2014...

नो टाइटल

"The greatest test of courage on earth is to bear defeat without loosing heart." ############################################

गहराइयां

ज़िन्दगी समझी नहीं कुछ ..वक़्त की गहराइयाँ,  और हम गिनते रहे,.....अपनी फ़क़त तन्हाईयाँ,  क़त्ल हमकोे कर दिया,मुतलक़ बिना तलवार के  ज़ह्र सी लगती रहीं यूँ.......... शह्र की पुरवाइयां..।  #उर्मिलामाधव..  17.2.2016

मकां भी चाहिए मुझको

ज़मीं भी चाहिए मुझको,मकां भी चाहिए यारब, बहुत खुशियों से वाबस्ता,जहां भी चाहिए यारब जहाँ ग़मगीन होकर कोई भी रोता न हो हरगिज़, मुझे पुरजोश दुनियां का समां भी चाहिए यारब, मगर ये याद रखना है, किरायेदार हूँ ख़ालिस.. जहाँ मजनूँ की दुनियां हो,जहाँ लैला के किस्से हों, जहाँ हर बात पे,हर चीज़ के कई बार हिस्से हों,

कमाल करते हैं

तोड़ कर दिल सवाल करते हैं, दुनियाँ वाले ..कमाल करते हैं, आपकी मुश्किलों के दीदावर, रंज से .....मालामाल करते हैं, उर्मिला माधव 16.2.2017

देखा न था

वो भी शायद रहगुज़र में साथ थे, मैंने उनको पर कभी देखा न था, क्यूँ न देखा उनको मेरी आँख ने, इस क़दर मेरा चलन,ओछा न था, क्यों किसीकी ज़िन्दगी में झांकना, मेरी नज़रों में ये सब अच्छा न था, दूर से पंजों के बल वो देखते थे, हाथ चूंके मुझ तलक,पहुंचा न था, जाने क्या-क्या कह गए,बेसाख़्ता, एक भी तो लफ़्ज़ पर सच्चा न था, मेरे क़द की कर गए फ़ीताकशी, गो के मैंने क़द कभी नापा न था, उर्मिला माधव, 16.2.2017

हो सकता था

दामन मेरा तार तार भी हो सकता था, मेरे ग़म पर आबशार भी रो सकता था, अच्छा ही है,रब ने मुझे बचाया आख़िर, यही तमाशा बार-बार भी हो सकता था, थोड़े कुछ एहसास बचे हैं अच्छा है, वर्ना ये दिल ऐतबार भी खो सकता था, उर्मिला माधव, 16.2.2015

चलो छोड़ो

तमाशा बन गया आक़िल सरे महफ़िल,चलो छोड़ो, जलाया हर तरह से दिल सरे महफ़िल,चलो छोड़ो, नहीं आदत हमें हरगिज़ भी..रोने गिड़गिड़ाने की, सरापा हो गए बिस्मिल सरे महफ़िल,चलो छोड़ो, पसे पर्दा रखे ग़म सब उछाले तुमने मजलिस में, हुए तुम बेहया क़ातिल...सरे महफ़िल,चलो छोड़ो, हमारी शान में गुस्ताखियाँ करते मुसलसल..तुम, किया बर्बाद मुस्तक़बिल,सरे महफ़िल चलो छोड़ो , मेरा दीगर कलेजा है....न कुछ बोले,न उफ़ तक की, बताओ क्या न थी मुश्किल सरे महफ़िल,चलो छोड़ो... उर्मिला माधव... 15.2.2016

किस्सा हुआ

गुफ्तगू के दरमियां कल इक अजब किस्सा हुआ, नींव का पथ्थर लगा हमको बहुत खिसका हुआ, कशमकश में घूमते हम रह गए दीवानावार, रात भर हमने समेटा जब यकीं बिखरा हुआ, ज़िन्दगी भर के तजरिबे हर नफ़स हावी हुए, याद हम करते रहे तक़दीर का लिख्खा हुआ, लफ़्ज़ कुछ उसने कहे अपनी जुबां से यक़-ब-यक़, होश में था ही कहां उसका ज़ेहन बहका हुआ, अब यही बस देखना है,किस तरफ को रुख करें, कह गया हमसे बहुत कुछ कारवां छूटा हुआ, लौट कर हम आ गए अपने दर-ओ-दीवार में, इश्क़ के बाज़ार में जब दिल बहुत सस्ता हुआ।।। उर्मिला माधव 15.2.2016

निकलता है

ये जो लावा सा बह निकलता है, पहले सीने में ख़ूब जलता है, सारी ये क़ारसाज़ी दिल की है, वर्ना शोलों पै कौन चलता है ? ऐसा एक दर्द ही है जो हरदम, वक़्त के साथ रुख़ बदलता है।।....  उर्मिला माधव.. 15.2.2013

रेशम सी गांठें

.....................ग़ज़ल.............................. -----------------------------------------------  फ़क़त रेशम सी गांठें थीं...ज़रा सी खोल ली जातीं, जो बातें दिल को चुभती थीं,जुबां से बोल लीं जातीं, अगरचे खौफ़ इतना था...कोई दिल पर न लेजाये, कहीं कहने से पहले एहतियातन...तोल ली जातीं, मुहब्बत को सलीके से....निभाना ही नहीं था तब, ज़रुरत क्या थी ऐसी मुश्किलें खुद मोल ली जातीं, फरेब-ओ-मक्र में,फंसना,फंसाना शौक था जिनका, दरीचे झाँकने को तब.........ज़मीनें गोल ली जातीं, किसीका क़त्ल करने को...हुनर की क्या ज़रुरत थी, कि बस हाथों की तलवारें....ज़हर में घोल ली जातीं...  faqat resham si gaanthen thin zara si khol lee jaateen, jo baaten dil ko chubhti theen,zubaan se bol li jaateen, agarche khauf itnaa tha.............koi dil par na le jaaye, kaheen kahne se pahle ahatiyaatan ........tol lee jateen, muhabbat ko saleeke se....nibhaanaa hi nahin tha tab, zaroorat kyaa thi aisi mushkilen khud mol liee jaateen, fareb-0-makhr main fansnaa,fasaanaa shauk tha jinka, dareeche khaankne ko tab...zameene...

बहुत है

तुमसे मुझको प्यार बहुत है, एक पल का दीदार बहुत है, पूरी दुनियां से क्या करना, तुम हो इक दिलदार बहुत है, बिना तुम्हारे हर पल तनहा, दिल समझो बीमार बहुत है, उर्मिला माधव

आई-गई

उसकी गलियों की बात आई-गई, खाक़ इस दिल की फिर उड़ाई गई.. कितनी शर्मिंदगी से गुज़रा किये, उसकी तसवीर साथ पाई गई, इक अजब शक़्ल से मुखातिब थे, आईना दे के जो दिखाई गई, मैं हूँ क़िरदार उस कहानी का, जो के अंजाम तक न लाई गई, मेरी आखों में तिरे अंदाज़ को देख, कैसे-कैसों की पारसाई गई, उर्मिला माधव  १३.२.2015

दिखलाता रहा

वक़्त कितने रंग दिखलाता रहा, जाने किस-किस शक़्ल में आता रहा, फिर भी अपनी हिम्मतें सब जोडके, खुद मेरा दिल ,खुद को समझाता रहा, गाहे-गाहे,हिल गया मेरा वजूद, फ़िर भी हंसके ज़र्फ़ दिखलाता रहा, जान कर ही सब जहां की फितरतें, दिल फरेब-ए-ज़ीस्त भी खाता रहा,  एहतियातन कर लिया बस ऐतक़ाफ़, यक़-ब-यक़ जब हौसला जाता रहा, #उर्मिला  11.२.2015

कौन मेरे साथ है

सोचती हूँ दिन है या के रात है, बेक़सी में ....कौन मेरे साथ है, सिर्फ तन्हाई,मुख़ालिफ़ मंजिलें, उम्र भर को बस यही सौगात है, एक मुक़म्मल तीरगी मेरे तईं, रौशनी हंसती है, अच्छी बात है !! लोग सब मुश्ताक़ हो देखा किये,  चश्म-ए-गिरियाँ है कि ये बरसात है ?? मुंतज़िर हूँ साज़-ओ-सामां,बांधके, ज़िन्दगी हर पल क़ज़ा के हाथ है....   #उर्मिला 11.2.2015 मुश्ताक--- उत्सुक  चश्म-ए-गिरियाँ--- आँख के आंसू  तीरगी--- अँधेरा मुन्तजिर---- प्रतीक्षित

ख़ुदा समझते हैं

वो जो खुद को खुदा समझते हैं, ज़ीस्त को मयक़दा समझते हैं  सारी दुनिया नशे मैं गाफिल है, बात ये तयशुदा समझते हैं , कौन बिखरा हुआ है अन्दर तक, इसको बस ग़मज़दा समझते हैं, तोड़ देते हैं दिल जो आदम का, दहर को बुतक़दा समझते हैं, वो जो पत्थर तराशा करते हैं, आंसुओं को अदा समझते हैं..... उर्मिला माधव... 11.2.2014...

शऊर होता है

जिसको ख़ुद पर ग़ुरूर होता है, शख़्स वो बे-शऊर होता है, शख़्सियत उसकी कुछ नहीं होती, फिर भी बहमों से चूर होता है, जिसको हर जान से मुहब्बत हो, उसके चेहरे पे नूर होता है, ख़ुद ही ख़ुद मे जो कोई जीता है, हर कोई उससे दूर होता है, खुद को सबसे जुदा दिखाना ही, बस दिमाग़ी फ़ितूर होता है, सबके दिल में जगह बना पाना, एक उम्दा सुरूर होता है ।।... उर्मिला माधव... ९.२.२०१४..

पूछ तो ले

उफ़ शबे ग़म क्या बला है पूछ तो ले, कौन कब कितना जला है, पूछ तो ले, तेरे लफ़्ज़ों में हमेशा तंज़ ही क्यों, कब किसे क्या ग़म मिला है पूछ तो ले ख़ून छालों से रिसा ऑ चल रहा है, किस तरह इतना चला है पूछ तो ले, उर्मिला माधव 9.2.2018

हयात कौन करे

Dr. Kumar Vishwas की तर्ज़ पर,एक मिसरा इस्तेमाल बस.. टुकड़ा-टुकड़ा हयात कौन करे, इश्क़ से दो दो हाथ कौन करे, प्यार करना था,करके देख लिया, फिर नई वारदात कौन करे, जब कि ये तयशुदा है,मरना है, किसलिए हासिलात कौन करे, उर्मिला माधव.

ज़िंदगानी है यारो

निदा फ़ाज़ली जी को खिराज़-ए-अक़ीदत :: यही बात दिल को बतानी है यारो, बहुत बे-वफ़ा ज़िंदगानी है यारो, ये सांसों की रफ़्तार का आना-जाना, फ़क़त वक़्त की खींचातानी है यारो, हों हालात कुछ भी नहीं फ़र्क़  इससे, के लहज़ा-ब-लहज़ा निभानी है यारो, मुहब्बत से हो रु-ब-रु सब ज़माना, यूँ ही लम्हा - लम्हा बितानी है यारो, जिसे हम समझते हैं जागीर अपनी, यहीं सब पड़ी छोड़ जानी है यारो, हों ख़ामोश आहें या,पुर सोज़ आंखें न ग़ैरों को हरगिज़ दिखानी हैं यारो, अगर बंद हो जाएँ,मिज़्गाँ -ए-इंसां, तो शम भर में बीती कहानी है यारो... समझता है जिसको मुक़म्मल ज़माना, वो बस चार दिन की जवानी है यारो... उर्मिला माधव 8.2.2016

नज़्म--- नहीं शायद नहीं है

बालियां कानों की मेरे हिल रही हैं, कान आहट पर लगे हैं, मेरा कोई दोस्त है क्या, नहीं, शायद नहीं है, हवा आई है मुझसे बात करने, ठहर कर हाल मेरा पूछती है, इशारा कर रही है उन दरख़्तों की तरफ़, जो मुसाफ़िर को दिलासा दे रहे हैं, मुझे समझा रही है, कहीं दुनियां किसीकी दोस्त है क्या ? नहीं शायद नहीं है, बहुत से आए थे, लेकिन गए सब, अभी बाक़ी हैं, कितने और आने, कोई रुकता नहीं है, ज़रा उठ्ठो, नज़र भर कर तो देखो, तुम्हारे वास्ते भी रुक गया क्या ? नहीं शायद नहीं है, ये मीलों रास्ते चलकर जो आए हो यहां तक, तुम्हारे साथ कितने चल रहे थे, कोई साथी बचा है क्या अभी तक? नहीं शायद नहीं है, तो फ़िर क्या सोचना है तुम अभी तक भी तो तनहा ही चले हो, किसीके साथ की आदत बची है? नहीं शायद नहीं है नहीं शायद नहीं है... उर्मिला माधव 8.2.2018

फ़न दे

मैं ये तेरी दुनियां नहीं चाहती हूँ, मुझे मेरी दुनियां बनाने का फ़न दे, मिरा चश्मे गिर्या से क्यों राबिता हो, मुझे मेरी खुशियां मनाने का फ़न दे, उर्मिला माधव

एक छोटी सी नज़्म

एक छोटी सी नज़्म ... यही तो बात है सईयो, .....हमें झुकना नहीं आता, अगर हम सर झुकाते तो हमारी जां निकल जाती, तो फिर जीने के क्या मानी, कहानी ही बदल जाती, हमें तसलीम करने का .......सलीक़ा ही नहीं आया, अगर आता तो हर मुमकिन, तबीयत भी संभल जाती, उर्मिला माधव

घबरा गए हैं

एक मतला दो शेर... हम अंधेरों से बहुत घबरा गए हैं, घर जला कर रौशनी में आगए हैं, ख्वाब हों या दर हकीक़त ज़िंदगी, खेल इसके देख कर चकरा गए हैं,  अब दर-ओ-दीवार से बेज़ार होकर, हम भी अपने सब्र से टकरा गए हैं, उर्मिला माधव... 7.2.2014...

मर्ज़ी हुज़ूर

आप मानें या न मानें .....आपकी मर्ज़ी हुज़ूर, बात जो हम अपनी कहते हैं कहेंगे ही ज़रूर, नाव कागज़ की सही पर हौसला मजबूत है, चल दिये तो देख लेना ..पार होंगे ही ज़रूर, मुद्दतों देखा किये हैं अर्श की जानिब अबस, रास्ते तो हैं ज़मीं पर,देखना क्या इतनी दूर ?.... उर्मिला माधव.. 7.2.2016

आपसे

Meri duniyan hi juda hai aapse, Mutmaiin hun hi nahin insaf se, मेरी दुनियां ही अलग है आपसे, मुतमईन हरगिज़ नहीं इंसाफ़ से, Bhool baithe aab-e-zamzam ka jamaal, Jo vazuu karte rahe hain aab se, भूल बैठे आब-ए-ज़मज़म का जमाल, जो वज़ू करते रहे हैं आब से, Urmila Madhav उर्मिला माधव, 6.2.2016.

नूर ए हिन्दुतान हुई

ग़ैर मुल्क में चर्चे इसके ....नूर-ए-हिन्दुस्तान हुई, लाशों के अंबार पै बैठी ....दिल्ली क़ब्रिस्तान हुई, लाल किले की दीवारों से ..परचम भी लहराता है, किसे ख़बर है,इसके पीछे,किसकी जां क़ुर्बान हुई... उर्मिला माधव  7.2.2015..

सकते थे

हम गए वक़्त की तस्वीर बना सकते थे, उसको हाथों पे लिए ,बाम पे जा सकते थे, ख़ुद धुँआँ घुट गया ऑ घुट गए दीवार -ओ-दर, जितनी तन्हाइयाँ थीं काम में ला सकते थे.. उर्मिला माधव

गश खाओगे

ज़िन्दगी के ख़म अभी देखे कहाँ, इक ज़रा टकराओगे गश खाओगे, जितने भी हम बच गए हैं ख़ूब हैं, तुम क़यामत देख कर डर जाओगे, गो कि तूफ़ानों की रंगत देख कर, दस दफ़ा चकराओगे, बल खाओगे, जुम्मा-जुम्मा आठ दिन के हो मियां, हम तलक पहुंचे भी तो मर जाओगे उर्मिला माधव

देर रात तक

हम से नज़र मिलाती रही,देर रात तक, जो शम्मा झिलमिलाती रही देर रात तक, साक़ी ने कुछ दिया था हमें ,अपने हाथ से, वो क्या था जो पिलाती रही,देर रात तक, कब होश था हमें के ,किधर रात हो गई, क्या शै थी जो जिलाती रही,देर रात तक, तादाद से सिवा था मिरा वक़्त-ए-ना तमाम, गर्दिश भी गुल खिलाती रही,देर रात तक, फिर ऐसा कुछ हुआ के हमें नींद आ गई, दुनियां हमें बुलाती रही......देर रात तक, दहशतज़दा खड़े थे कई चारागर वहां, एक रात खिलखिलाती रही,देर रात तक, उर्मिला माधव, 4.2.2017..

चाह रही है

मुझे कहाँ कोई चाह रही है, कब किसकी परवाह रही है ? कभी न थी दरकार मुझे पर, बिला वज्ह इस्लाह रही है, अपनी दम पर चल कर देखा, क़दम-क़दम पर राह रही है, टूट गए तब कहाँ कोई था? जीत गए तो वाह रही है, झुकना अगर नहीं जो चाहा, अना मिरी लिल्लाह, रही है, उर्मिला माधव

दिल तोड़ा होगा

जब तूने दिल तोड़ा होगा, कैसे तुझको छोड़ा होगा, तनहाई में अक्सर जाकर, चौखट पै सर फोड़ा होगा, बाँयां हाथ जिगर पै रखकर,  दिल का दर्द निचोड़ा होगा,  चाहे जितना ग़म हो तुझको,  मुझ से तो पर थोड़ा होगा, तुझे भुलाने की खातिर ही, खुद को खुद से जोड़ा होगा, दिल पर दाग़ लगाने वाले, तुझसा कौन निगोड़ा होगा..... उर्मिला माधव....

हालात से

उंसियत होती नहीं है अब किसी हालात से, इतनी नफ़रत हो गई है आदमी की ज़ात से, हर नए इनसान से अब कोफ़्त होती है हमें, दब गए हैं इस क़दर हम दर्द की इफ़रात से, इक नए अंदाज से आकर गले मिलते भी हैं, पर सभी किरदार हैं इक तीरगी की रात से, उर्मिला माधव.. 2.2.2017

सीखना होगा

इंतज़ार---- किसीको चाहत का, किसीको राहत का किसीको मुहब्बत का, किसीको इजाज़त का, किसीको बग़ावत का, इक छलांग ऊंचाइयों के लिए, एक छलांग गहराइयों के लिए, कहीं आराइयों के लिए कहीं शैदाइयों के लिए सीखना होगा शैदाई होना, ख़्वाब ख़ाने की जदों तक, मर जाने की हदों तक, उर्मिला माधव 2.1.2019