थी ही नहीं

अपनी कोई बिसात थी ही नहीं,
बस तो फ़िक़्र-ए-हयात थी ही नहीं,

अब मुहब्बत भी कोई क्या करता,
मुझमें तो ख़ास बात थी ही नहीं,

ये तो किस्मत की ख़ास ख़ूबी है,
इसमें कोइ चाँद रात थी ही नहीं,

सबसे कमतर थी,साफ ज़ाहिर है,
शब् थी,शब-ए-बरात थी ही नहीं,

चूँकि कुछ हैसियत से ऊपर थे,
यूँ भी हक़ में ज़कात थी ही नहीं,
उर्मिला माधव,
28.2.2017

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