ख़ुदा समझते हैं

वो जो खुद को खुदा समझते हैं,
ज़ीस्त को मयक़दा समझते हैं 

सारी दुनिया नशे मैं गाफिल है,
बात ये तयशुदा समझते हैं ,

कौन बिखरा हुआ है अन्दर तक,
इसको बस ग़मज़दा समझते हैं,

तोड़ देते हैं दिल जो आदम का,
दहर को बुतक़दा समझते हैं,

वो जो पत्थर तराशा करते हैं,
आंसुओं को अदा समझते हैं.....
उर्मिला माधव...
11.2.2014...

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