संवरते रहे
एक मतला दो शेर...
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चाह मिलने की लेकर.....संवरते रहे,
सीढियां घर की......चढ़ते-उतरते रहे ,
उनकी गलियों का नक्शा लिए हाथ में,
कुछ लकीरों से कागज़ को भरते रहे..
क्यूंकि हिम्मत हमारी दगा दे गयी,
दिल ही दिल में अकेले बिखरते रहे,
उर्मिला माधव...
28.2.2014..
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