ज़िंदगानी है यारो

निदा फ़ाज़ली जी को खिराज़-ए-अक़ीदत
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यही बात दिल को बतानी है यारो,
बहुत बे-वफ़ा ज़िंदगानी है यारो,

ये सांसों की रफ़्तार का आना-जाना,
फ़क़त वक़्त की खींचातानी है यारो,

हों हालात कुछ भी नहीं फ़र्क़  इससे,
के लहज़ा-ब-लहज़ा निभानी है यारो,

मुहब्बत से हो रु-ब-रु सब ज़माना,
यूँ ही लम्हा - लम्हा बितानी है यारो,

जिसे हम समझते हैं जागीर अपनी,
यहीं सब पड़ी छोड़ जानी है यारो,

हों ख़ामोश आहें या,पुर सोज़ आंखें
न ग़ैरों को हरगिज़ दिखानी हैं यारो,

अगर बंद हो जाएँ,मिज़्गाँ -ए-इंसां,
तो शम भर में बीती कहानी है यारो...

समझता है जिसको मुक़म्मल ज़माना,
वो बस चार दिन की जवानी है यारो...
उर्मिला माधव
8.2.2016

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