नज़्म--- नहीं शायद नहीं है
बालियां कानों की मेरे हिल रही हैं,
कान आहट पर लगे हैं,
मेरा कोई दोस्त है क्या,
नहीं, शायद नहीं है,
हवा आई है मुझसे बात करने,
ठहर कर हाल मेरा पूछती है,
इशारा कर रही है उन दरख़्तों की तरफ़,
जो मुसाफ़िर को दिलासा दे रहे हैं,
मुझे समझा रही है,
कहीं दुनियां किसीकी दोस्त है क्या ?
नहीं शायद नहीं है,
बहुत से आए थे,
लेकिन गए सब,
अभी बाक़ी हैं, कितने और आने,
कोई रुकता नहीं है,
ज़रा उठ्ठो, नज़र भर कर तो देखो,
तुम्हारे वास्ते भी रुक गया क्या ?
नहीं शायद नहीं है,
ये मीलों रास्ते चलकर जो आए हो यहां तक,
तुम्हारे साथ कितने चल रहे थे,
कोई साथी बचा है क्या अभी तक?
नहीं शायद नहीं है,
तो फ़िर क्या सोचना है
तुम अभी तक भी तो तनहा ही चले हो,
किसीके साथ की आदत बची है?
नहीं शायद नहीं है
नहीं शायद नहीं है...
उर्मिला माधव
8.2.2018
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