आई-गई
उसकी गलियों की बात आई-गई,
खाक़ इस दिल की फिर उड़ाई गई..
कितनी शर्मिंदगी से गुज़रा किये,
उसकी तसवीर साथ पाई गई,
इक अजब शक़्ल से मुखातिब थे,
आईना दे के जो दिखाई गई,
मैं हूँ क़िरदार उस कहानी का,
जो के अंजाम तक न लाई गई,
मेरी आखों में तिरे अंदाज़ को देख,
कैसे-कैसों की पारसाई गई,
उर्मिला माधव
१३.२.2015
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