घबरा गए हैं

एक मतला दो शेर...
हम अंधेरों से बहुत घबरा गए हैं,
घर जला कर रौशनी में आगए हैं,

ख्वाब हों या दर हकीक़त ज़िंदगी,
खेल इसके देख कर चकरा गए हैं, 

अब दर-ओ-दीवार से बेज़ार होकर,
हम भी अपने सब्र से टकरा गए हैं,
उर्मिला माधव...
7.2.2014...

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