तक़लीफ़ हुई थी, जब तुम पहली बार रूड बोले थे, ताज्जुब हुआ था, जब प्रतिउत्तर में तुम झूठ बोले थे, तुम ये समझे,मैंने मान लिया था, पर नहीं समझे तो बस इतना, कि मैंने सब कुछ जान लिया था , परदे के पीछे का सच, वो आधार हीन खीझ, जो तुमने मुझ पर उतारी थी, तुम ये भूल गए थे, मैंने तो ये ज़िन्दगी पहले भी, कई बार हारी थी, सदमे नहीं लगते अब, किसी भी सूरत में, क्यूंकि, मिलने से पहले मैं स्वयं ही बिछुड़ जाती हूँ, फिर उसी गली को मुड़ जाती हूँ, और अपने अतीत से जुड़ जाती हूँ, कभी-कभी सोचती हूँ, तुम्हारे कहे शब्द, मैं हमेशा,साथ नहीं हो सकता, और तुम साथ नहीं हुए, तो क्या मैं चली नहीं? ये क्रम है,मेरे जीवन का, हार-जीत से परे, कोई फ़र्क नहीं, किसी उपेक्षा से, तुम तो पहले भी नहीं थे, तुमसे मिलने को, क्या अकेली नहीं आई थी? अकेले सफ़र की शुरुआत, नहीं की थी ? अरे..!! जो हार से ही शुरू हुआ हो, उसे क्या अंतर होगा ? अब हार पहना दो, या हार मनवा लो, एक ही तो बात हुई न, उर्मिला माधव... 23.10.2016