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Showing posts from October, 2019

नहीं सकते,

Kaun kahta hai chal nahi sakte, Ghar se tanha nikal nahi sakte Yun hi gafil ho khud khayali main Sochte ho sanbhal nahi skate... Tumko khona hai,jao kho jao, Muft ab dil main jal nahi sakte कौन कहता है, चल नहीं सकते, घर से तनहा निकल नहीं सकते, यूँ ही ग़ाफ़िल हो ख़ुद ख़याली में, सोचते हो संभल नहीं सकते, तुमको खोना है, जाओ खो जाओ, मुफ़्त अब दिल में जल नहीं सकते, उर्मिला माधव 1.11.2015

मिज़ाज

पहचानते कहां हो अभी  वक़्त का मिज़ाज, किस-किस की बद दुआएं लिए जा रहे हो तुम.. मीज़ान पे रखो तो ज़रा अपनी शख़्सियत, ख़ुद अपनी जग हंसाई किये जा रहे हो तुम.. उर्मिला माधव 1.11.2018

ग़ज़ल-- किताबें सरहाने रख रही हूं

मैं किताबें अब सरहाने रख रही हूं, चंद वरकों में ज़माने रख रही हूं, हर वरक संजीदगी के नाम है, एक माज़ी सोलह आने रख रही हूं, इक तजुर्बों का पुलिंदा,हर नफ़स, ज़िन्दगी के ताने-बाने रख रही हूँ, कुछ अंधेरे और दिए बुझने की राख़ और धुंए के कुछ ख़ज़ाने रख रही हूँ, गोकि एहसास-ए-घुटन हलका न हो, बंद करके,कुछ दहाने रख रही हूं,  जिस की दम पे दिन गिने हैं उम्र भर, अपनी तस्वीही के दाने रख रही हूँ, एक खनक आहों के हिस्से की भी है, सबके अपने-अपने ख़ाने रख रही हूं, उर्मिला माधव, 28.10.2017

गिला करके देख

नज़र को नज़र से मिला करके देख, कभी ख़ुद को यां तक भी ला करके देख कभी मेरे दिल को हिला करके देख, बनाया मुझे जिसने तबियत से ख़ूबाँ, मेरे कूज़ागर से गिला कर के देख, सबाब-ए-मुहब्बत तवारीख होगी, किसी मर्ग-ए-दिल को जिला कर के देख, तुझे राहतों की भी नेमत मिलेगी  कोई चाक दामन सिला करके देख, तेरी ज़िन्दगी को ही तस्कीन होगी, कभी हक किसीका दिला करके देख.... उर्मिला माधव... 31.10.2016

नज़्म दीवाली

न जाने किस जगह जा कर छुपी है अब वो दीवाली, चरागाँ जब दर-ओ-दीवार होते थे हर इक घर के,  मुहब्बत से भरे होते थे रिश्ते .....जब वो पीहर के, ज़रा सी बात पर खुशियां,नज़र आती थीं चेहरे पर, कभी अम्मा से छुप के पंख भी चुनते थे तीतर के, मगर मज़हब की कालिख़ से हर इक दीवार है काली, न जाने किस जगह जा कर छुपी है अब वो दीवाली, उर्मिला माधव... 31.10.2016

बेटू का कलाम

मेरे बेटे मधुवन की एक रचना.... ऐसा लगता है कि कुछ होगा मगर होता नहीं, रास्ता वा है मगर अपना सफ़र होता नहीं, वक्त की उन साअतों का भूलना पूरी तरह, उस तरफ़ तो हो गया है पर इधर होता नहीं, इन हवाओं में वही अावाज़ है उसकी निहाँ, वो कहीं कुछ बोलता है पर नज़र होता नहीं, है कमाल-ए-वक्त जो है अाज चर्चा आपका, वरना कोई भी यहाँ पर बाहुनर होता नहीं, इश्क में उसके ये दिल बेदार है अब इस कदर,  होश खो देता है लेकिन बेखबर होता नहीं, दार पे चढ़के भी उसका ज़िक्र है दर ख़ासो आम,  वो फ़ना तो हो गया है, बेअसर होता नहीं.... Madhuvan Rishiraj...... 31.10.2014..

सर लिया

जो उसे करना था उसने कर लिया, मैंने बस इलज़ाम अपने सर लिया, फासले दिल में मुक़म्मल हो गए, और दामन इक धुंए से भर लिया, मुतमईँ कोई हो गया उससे बहुत, मैंने हिस्से में महज़ एक डर लिया, सोचती रहती हूँ ......अब तन्हाई में, इस क़दर क्यों फैसला बदतर लिया, गुफ्तगू का वक़्त भी आया बहुत, मैंने मौजू,जान कर, दीगर लिया... खुश रहा वो भी मुझे कम आंक कर, दिल मेंरा उसपे फ़क़त हंस भर लिया... उर्मिला माधव... 31.10.2016

मुस्कुराना चाहिए

फिल बदीह में अभी-अभी कही गई ग़ज़ल--- :: है ये नेमत ज़िन्दगी तो आज़माना चाहिए, जो भी कुछ मिल जाए उसपे,मुस्कुराना चाहिए, :: hai niyamat zidagi to aazmaanaa chahiye, jo bhi kuchh mil jaaye uspe,muskurana chahiye... :: बेखुदी में मुब्तिला होकर नहीं रहना यहाँ, हंसके रोना,रोके हँसना,कुछ तो आना चाहिए, :: bekhudi main mubtila hokar nahin rahna yahan, hanske rona,roke hansna,kuchh to aanaa chahiye, :: खुशनसीबी से अगर इक दोस्त भी मिल जाए तो, दोनों हाथों से उसे ........बढ़कर निभाना चाहिए, :: khush nasiibi se agar ik dost bhi mil jaaye to, donon hathon se use badh kar nibhaana chahiye, :: कौन जाना है इसे ये ज़िन्दगी क्या खेल है, ये समझने के लिए तो एक ज़माना चाहिए, :: kaun samjha hai ise ye zindagi kya khel hai, ye samajhne ke liye to ek zamaana chahiye, :: जाने कितने मिट गए मुफलिस,तवंगर,दह्र में, हर किसीको अपने हक का आब-ओ-दाना चाहिए. :: jaane kitne mit gaye,muflis,tavangar dahr main, har kisiko,apne haq ka,aab-o-daanaa chahiye, #उर्मिलामाधव-- 31.10.2015

तन्हाइयां

आँख के नीचे की काली झाइयां, और सारी उम्र की तन्हाईयाँ   घेरती हैं अब सवालों से मुझे, आज गुज़रे वक़्त की परछाईयाँ, यूँ भी कहते ही नहीं बनता है कुछ,   जब ये मुझमें खोजें हैं रानाईयाँ, जो भी गुज़रा हो मगर इतना रहा, ज़िन्दगी ने नाप लीं गहराइयाँ , पाँव तो हर दम ज़मीं पर ही रहे  चश्म-ए-नम से देख लीं ऊँचाइयाँ, दिल मेरा अनहद कहीं सुनता रहा  दूर कुछ बजती रहीं शहनाइयाँ ---- #उर्मिलामाधव... 31.10.2015

जाओ ना

एक मतला एक शेर.... किस तरह तुमसे कहूँ आजाओ ना, नईं समझती हूँ मुझे समझाओ ना, बात तक मेरी  नहीं सुनते हो तुम, अब नहीं बोलूंगी तुम से जाओ ना, उर्मिला माधव... 31.10 2014...

मख़मूर होना है

मुहब्बत में मुझे हर हाल में मजबूर होना है, ये जब तक ह तभी तक इश्क़ में मख़मूर होना है, अगर इस घर से जब जइयो,तो दिल को तोड़ता जइयो, बचें फिर किस लिए शीशे इन्हें भी चूर होना है  ।। उर्मिला माधव.....

उधार करते हैं

ग़ज़ल हाज़िर है------ ज़ख्म-ए-दुनियां का ग़म छुपाने को वक्ती लम्हा उधार करते हैं,  जिससे तक़लीफ दिल को होती है,वो ही हम बार-बार करते हैं.... सबको मालूम है ये ग़म क्या है,ऐसे रस्ते का पेच-ओ-ख़म क्या है, दर्द-ए-दिल क्या है,क्या है ख़ामोशी फिर भी सब प्यार-प्यार करते हैं, जाने कैसी ये अब रिवायत है,बस मुहब्बत ही इनकी आयत है, क़ैस-ओ-लैला की तर्जुमानी बन,अपने दामन को तार करते हैं, कुछ ही लम्हों की ज़िंदगानी है,सब ही वाक़िफ़ हैं के ये फ़ानी है, झूठे लम्हों की खैर ख्वाही में अपनी इज्ज़त को ख़्वार करते हैं, हर मुहब्बत को सिर्फ हामी है,ये ही इंसानी दिल की ख़ामी है, अच्छी ख़ासी हसीन दुनिया को अपनी तबियत से दार करते हैं.... उर्मिला माधव.... 30.10 2014...

अच्छा नहीं था

फ़ालतू बातों में कुछ रख्खा नहीं था, आप जो कहते थे वो अच्छा नहीं था, तंज,दूरी और फ़क़त लानत,मलामत, एक मुहब्बत के अलावा क्या नहीं था ? कितनी ज़्यादः कोशिशें कीं सीखने की, क्या करें हमको ही कुछ आता नहीं था, जब भी लाया आपका पैगाम क़ासिद, डर गए बस हमने वो खोला नहीं था, इक वफ़ा ही आपकी फितरत नहीं थी, सब समझता था ये दिल बच्चा नहीं था, हम हमेशा चुप रहे कुछ आदतन ही, बोल सकते थे मगर चाहा नहीं था ....... #उर्मिलामाधव... 20.8.2014...

कुर्सी वाले बाबूजी

चमत्कार को नमस्कार है,कुर्सी वाले बाबूजी राव रंग सब निर्विकार है,कुर्सी वाले बाबूजी रंजू वंजू रीता गीता रोज नाचतीं आँगन में मद्यपान है और बहार है,कुर्सी वाले बाबूजी राग भैरवी गाएंगे तो सुबह शाम से क्या लेना अपने हाथों जीत हार है,कुर्सी वाले बाबूजी... #उर्मिलामाधव

लड़ती फिरूँ

मैं समंदर से,हवा से,किसलिए लड़ती फिरूँ जब मुझे अहसास है तू साथ तो देगा नहीं... उर्मिला माधव 30.10.2015

होना था मुझको

मैं वही हूँ जो नहीं होना था मुझको, ज़िन्दगी हूँ,इक यही रोना था मुझको, लाद के करती भी क्या बार-ए-मुहब्बत, ज़ख़्म ही तो उम्र भर धोना था मुझको, उर्मिला माधव

ज़रा बचके

निशाना तीर का उसने बड़ी तरकीब से साधा, के जो भी सामने आया,कहा उसको ज़रा बचके.... किसे गद्दीनशीं होंना है,इसका फैसला होगा, मुताबिक वक़्त के बदलेंगी शक्लें कुछ ज़रा हटके... उर्मिला माधव... 30.10.2016

अंग्रेज़ियत से

क्यों मुतास्सिर आप हैं अंग्रेज़ियत से, कब तलक चलते रहेंगे इस नियत से, बेशक़ीमत हैं .........ज़ुबाँ, हिंदी ऑ उर्दू  किस लिए बचते हैं इनकी अहमियत से, उर्मिला माधव

खेल वाले हैं--हज़ल

लोग तो कितने ऊंचे-ऊंचे खेल वाले हैं, हम हैं गंगू तेली,ख़ालिस तेल वाले हैं, रोज़ दुहाई देते है वो हम हैं तनहा,तनहा, मगर हंसीं लोगों से ख़ासे, मेल वाले हैं, इनका चक्कर रोज़ जबलपुर,दिल्ली लगता, अपना क्या है,अपन चने की ठेल वाले हैं, जबसे पैदा हुए वो तबसे सारा कुछ पढ़ डाला, अपने हाथ में सभी नतीजे,फेल वाले हैं, बहुत बिज़ी हैं मिलने का भी वक़्त न इनको मगर हंसीं लोगों के दिल की जेल वाले हैं... उर्मिला माधव.. 29.10.2916

मेहरबां

इक हुजूमे-ए-दुश्मनां, सामने है रायगां, उफ़ मुहब्बत के लिए !! किस क़दर हैं बदगुमां, जिसने बख़्शी ज़िन्दगी, वो ही देगा सायबां, खुद-ब-खुद करना सभी, कौन किसपे मेहरबां, वक़्त देखा बदतरीन, था सभी कुछ तो निहां....   किसलिए हो फ़िक्र तब, ये बताओ जान-ए-जां, उर्मिला माधव.... 26.10.2016... Ik hujoom-e-dushmanaN, Saamne hai raygaN, Uf muhabbat ke liye, Kis qadar hai badgumaN, Jisne bakhshi zindagi, Wo hii dega saybaN, Khud-b-khud karna sabhi, Kaun kispe meharbaN, Waqt dekha badtar een, Tha sabhi kuchh to nihaN, Kis liye ho fiqr tab, Ye batao jan-e-jaN, Urmila Madhav

करूंगी मैं

ग़ैर तरही ग़ज़ल---- जो अब तक कर रही हूँ मैं,वही फिर-फिर करुँगी मैं, लगेगी ठेस गर दिल को,ग़ज़ल हाज़िर करुँगी मैं, कोई जज़्बात अपने दिल में रखके रो नहीं सकती, जो ग़र आज़ार हो, अल्फ़ाज़ से ज़ाहिर करुँगी मैं, अयां होती रही हैं कुल जहाँ की साज़िशें मुझ पर, भला ऐसे ज़माने का भी क्या आख़िर करुँगी मैं, दिमाग़-ओ-दिल की ताबानी,कभी पिन्हाँ नहीं होती, फ़क़त किरदार की दम पर,जहाँ ताहिर करुँगी मैं, अगर उन्वान इज़्ज़त है तो फिर क़ुर्बान है सब कुछ, ख़लिश की हर हदों तक ज़िंदग़ी माहिर करुँगी मैं... #उर्मिलामाधव.. 27.10.2015

हाय

हाय ....   HI रुकिए.... एक मुद्दत से रुका ही तो हूँ, देखिये... आँख है तो... देखता ही तो हूँ... सुनिए.... वक़्त ही ऐसा है सुनता ही तो हूँ... उर्मिला माधव... 29.10.2014....

नहीं उतरी

मैं जिस्म जीती रही,ज़िन्दगी रही बिखरी, अजीब ज़िद थी,किसी तौर भी नहीं सुधरी, हम उम्र भर जिसे खोके हवास, रोया किये, वो चीज़ क्या थी,कभी ज़ेह्न से नहीं उतरी, हर एक सम्त लगी डूबती है नब्ज़-ए-हयात, उठाके फिरती रही झोलियों में बे-ख़बरी, उर्मिला माधव

मनाही नहीं

मनाही नहीं,सूरत देखने की, पर इसे पढ़ना भी है दिल से नहीं दिमाग़ से, कितने फरेब लिखे हैं मुश्किल है ऐसे चेहरों की इबारत पढ़ना सूरत जितनी दिलकश, उतनी उलझी हुई इबारत, तुमने सुना भी होगा सखी? ऑल दैट ग्लिटर्स इज़ नॉट गोल्ड यानि हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं इसलिए ख़ुद को खोना नहीं कितने सुहाने लगते हैं दूर के ढोल, पर पास जाकर सुनना कभी कान तो क्या, दिलो दिमाग़ भी हिल जाएंगे रोज़ पढ़ती हूँ मैं उस चमकीली सूरत को रोज़ लड़ती हूँ अपने आप से, उस चेहरे से रोज़ाना मेरे दिल की दूरी कुछ और बढ़ जाती है फ़रेब उसका रोज़ ही कुछ और ज़ियादा दिखाई देता है ये खरा सच है उस सूरत के हिस्से का जो जानना ज़रूरी है,तुम्हारे लिए, ये जो दूरी है,अच्छी है तुम्हारे लिए सूरत खुश है, फ़रेब रचकर, और मैं, उस पर हंस कर उसकी आदत में शामिल है, मुझे कम से कम करके आंकना उसी सूरत की बाबत है ये सब जो अचानक ही तुम्हारे मन को बहुत भा गई है दूरियां सुहानी हैं इन्हें क़ायम रहने दो वरना ऐसी नज़दीकियां इनका कोई मुस्तक़बिल नहीं सिर्फ़ सूरत ही सूरत है सीरत का नामो निशान नहीं मन से हारना तो मैंने कभी सीखा ही नहीं और कहा हमेशा मजबूती से एकला चालो रे..... तुम भी स...

आने दो

आने दो,वक़्त-ए-शाम आने दो, जो भी हैं,ताम-झाम आने दो, बेसबब सर पे हाथ क्या रख्खें, पहले घर तक सलाम आने दो, कौन बचता है, डगमगाने से, उनकी आंखों के जाम आने दो, अपने हाथों से क़ब्र खोदेंगे, ज़िन्दगी पहले काम आने दो, वो भी चेहरे पे हाथ रख लेगा, मेरा महफ़िल में नाम आने दो, उर्मिला माधव, 28.10.2018

लगा दी गई

दांव पे सारी दौलत लगा दी गई एक महफ़िल ही दर पे सजा दी गई, अपनी तसवीर हर जा बना दी गई आईनों से हक़ीक़त छुपा दी गई, एक सीढ़ी के जिससे गए बाम तक, भीड़ समझी गई बस हटा दी गई, उर्मिला माधव

रख रही हूँ

एक मतला दो शेर --- मैं किताबों अब सिरहाने रख रही हूं, चंद वरकों में ज़माने रख रही हूं, हर वरक संजीदगी के नाम है, एक माज़ी सोलह आने रख रख रही हूं, एक ख़नक आहों के हिस्से की भी है, सबके अपने-अपने ख़ाने रख रही हूं, उर्मिला माधव, 28.10.2017

कहते थे

जिस्म सादा था कई ज़ख़्म-ए-जिगर रहते थे, मिलने वाले भी हमें मगर मर्ग-ए-बशर कहते थे, Jism saadA tha,kaii zakgm-e-jigar rahte the, Milne waale bhi hmen marg-e-bashar kahte the हाथ हम रात भर सीने पे रखे रहते थे जो भी कहना था हमे वक़्त-ए-सहर कहते थे, Urmila Madhav

रहने दो

एक मतला--- jo iztarab-e-musalsal he usey rahne do, paanv se sar se jo ghayal hai usey rahne do, :: जो इज़्तराब -ए-मुसलसल है उसे रहने दो, पाँव से,सर से जो घायल है...उसे रहने दो.... #उर्मिलामाधव.. 28.10.2015

जाते हैं

Aaj almaariyan sajaate hain, Kal achanak hi ujad jaate hain, Kuchh padosi nayi muhabbat se, Jyon hi milte hain,bichhad jaate hain, Zindagani ajab si mushkil hai, Dere lagte hain ukhad jaate hain, Dard insaan ki ek kasauti hai, Lafz likhte hain bigad jaate hain उर्मिला माधव

सौगात हो

हो कहीं भी तुम,हमारे साथ हो, ज़िंदगी की इस तरह सौगात हो, ज़िन्दगी ये चाहती है तुमसे अब, तुमको देखूं दिन हो चाहे रात हो, वो तुम्हारा मुस्कुराना बज़्म में,  कौन नईं मर जाए जो ये बात हो, एक दिन ऐसा भी आया चाहिए, तुम रहो ऑ रात भर बरसात हो, मावरा दिल दर्द से हो जायेगा, हाथ में जिस दम तुम्हारा हाथ हो.....  उर्मिला माधव... 28.10.2014....

दुश्मनां

इक हुजूमे-ए-दुश्मनां, सामने है रायगां, इक मुहब्बत के लिए !! किस क़दर हैं बदगुमां, ज़ीस्त जिसने दी मुझे, वो ही देगा सायबां, खुद-ब-खुद करना सभी, कौन किसपे मेहरबां, वक़्त देखा बदतरीन, था सभी कुछ तो निहां....   किसलिए हो फ़िक्र तब, ये बताओ जान-ए-जां, उर्मिला माधव.... 26.10.2014...

पढ़े ही कब थे

ख़्वाब तुम्हारे गढ़े ही कब थे, तुम इस दिल में,चढ़े ही कब थे ? ख़ुद खीची जो लकीर हम ने, उस से ज़्यादा बढ़े ही कब थे? तुम से प्यार का शिकवा कैसा', तुम ये लफ़्ज़, पढ़े ही कब थे ? उर्मिला माधव 26.10.2017

पहाड़ हो गई देहरी

सहेलियों, आगे बाद में 😢 बाबा की बैठक, अम्मा की रसोई, बाबुल की देहरी, सब में एक आड़ होगई, वो देहरी पहाड़ होगई, घर का वो जीना, चढ़ें आवै न पसीना हर इक महीना जैसे, सावन का महीना, सब में एक आड़ होगई, वो देहरी पहाड़ हो गई, सांझ भई आंगन में, खटिया बिछा बिटिया, नानी बगल जाकें, पानी की रख लुटिया, सब में एक आड़ होगई, वो देहरी पहाड़ हो गई, सूनी दुपहरिया में, गलियों के कई चक्कर, भैया से मुठभेड़, होनी ही थी टक्कर,  सब में एक आड़ हो गई, वो देहरी पहाड़ हो गई, चुन्नी की दुनियां में  फ़्रॉक हो गई हवा, यौवन की देहरी पे, चुन्नी ही थी गवा(ह), सब में एक आड़ हो गई, वो देहरी पहाड़ हो गई, गलियों पे पाबंदी, हंसने पे पाबंदी, गाने पे पाबन्दी, नस-नस पे पाबंदी, पर सब पे आड़ हो गई, वो देहरी पहाड़ हो गई, उर्मिला माधव, 26.10.2017

बरी हुई थी

दिलों में नफ़रत भरी हुई थी, मैं दुश्मनों से डरी हुई थी, यही समझने में दिन गए सब, के चोट फिर से हरी हुई थी, जिसे ख़ुशी हम समझ रहे थे, वो जाने कब की मरी हुई थी, नहीं असीरी,मुझे मुआफ़िक, मैं अपनी ज़िद से बरी हुई थी, वो अपनी दुनियां बचा रही हूँ, जो मुश्किलों से खरी हुई थी, उर्मिला माधव,

शबाब क्या है

मालूम होगा आपको शक़्ल -ए-हबाब क्या है, कांटों का साथ  है तो हुस्न-ए-गुलाब क्या है, ये ज़िन्दगी है इसमें, उजलत नहीं ज़रूरी, मर्ग-ए-बशर ये समझे हश्र -ए-शबाब क्या है, उर्मिला माधव  24.10.2018

करते रहो

ख़ुद सवाल-ओ-जवाब करते रहो, अपने दिल से हिसाब करते रहो... क्यूँ ये अरमान यूँ ही मर जाए, तलब-ए-आफ़ताब करते रहो, चांदनी हो या चाँद हो ख़ुद ही, तुम तो नीयत खराब करते रहो, चाहे तरज़ीह कोई दे या नहीं, ख़ुद को यूँ ही ,सराब करते रहो, जब तलक जिस्म टूट कर न गिरे, ज़िंदगी .....बेनक़ाब करते रहो, उर्मिला माधव... 24.10.2016

चुप करा दूँ

दिल ये कहता है ज़रा सा मुस्कुरा दूँ, और तुम्हारे झूठ पे ....परदा गिरा दूँ, क्यूँ तुम्हारी आबरू पर दाग़ हो कुछ, उंगलियाँ होठों पे रख दूँ चुप करा दूँ.... उर्मिला माधव.... 24.10.2016

हाज़िर करूंगी मैं

जो अब तक कर रही हूँ मैं,वही फिर-फिर करुँगी मैं, अगर कोई ठेस पहुंचेगी,ग़ज़ल हाज़िर करुँगी मैं, कोई जज़्बात अपने दिल में रखके रो नहीं सकती, कोई आज़ार हो, अल्फ़ाज़ से ज़ाहिर करुँगी मैं, अयां होती रही हैं कुल जहाँ की साज़िशें मुझ पर, भला ऐसे ज़माने का भी क्या आख़िर करुँगी मैं, दिमाग़-ओ-दिल की ताबानी,कभी पिन्हाँ नहीं होती, फ़क़त किरदार की दम पर,जहाँ ताहिर करुँगी मैं, अगर उन्वान इज़्ज़त है तो फिर क़ुर्बान है सब कुछ, ख़लिश की हर हदों तक ज़िंदग़ी माहिर करुँगी मैं... #उर्मिलामाधव.. 24.10.2015

आह भरके

कभी कुछ बिखर के,कभी आह भरके  संभाला है ये दिल मुसलसल सिहर के, किसे क्या बताते अजब मुश्किलें थीं, ख़तरनाक दुनिया में गुजरी है डर के, न जाने वो क्या था समझ में न आया, के ये जिंदगानी मिली हमको मर के, मुक़द्दर था यकता ज़माने में अपना, हरे ज़ख्म लेकर फिरे दर-ब-दर के, मेरे आँसुओं से जो दामन था भीगा - चला भी गया दे के असबाब घर के, उर्मिला माधव... 2.10 2014...

मुस्तक़बिल

चलते रहते हैं ज़िन्दा दिल,चाहे जितनी हो मुश्किल, कितनी दूरी तय करनी है,ज़ाहिर तो हो मुस्तक़बिल, उर्मिला माधव...

वाह बोलो

मैं किसीकी क्यूँ करूँ परवाह, बोलो, एक तरफ़ा कब निभी है चाह, बोलो, जानिब-ए-मंज़िल मुझे जाना ही होगा, ज़िन्दगी भर क्यूँ तकूँ अब राह, बोलो, ज़िन्दगी को दर्द-ए-गम का वास्ता दूँ ? क्या वो आइन्दा न देगी आह, बोलो, जो मिले सौगात दे बस आंसुओं की, ये कहो कब तक करूं मैं वाह, बोलो, ज़िन्दगी मेरी में रख्खूँ या न रख्खूँ इसके मिटने पै भी लूँ इस्लाह बोलो? उर्मिला माधव... 1.10.2017

रूड बोला

तक़लीफ़ हुई थी, जब तुम पहली बार रूड बोले थे, ताज्जुब हुआ था, जब प्रतिउत्तर में तुम झूठ बोले थे, तुम ये समझे,मैंने मान लिया था, पर नहीं समझे तो बस इतना, कि मैंने सब कुछ जान लिया था , परदे के पीछे का सच, वो आधार हीन खीझ, जो तुमने मुझ पर उतारी थी, तुम ये भूल गए थे, मैंने तो ये ज़िन्दगी पहले भी, कई बार हारी थी, सदमे नहीं लगते अब, किसी भी सूरत में, क्यूंकि, मिलने से पहले मैं स्वयं ही बिछुड़ जाती हूँ, फिर उसी गली को मुड़ जाती हूँ, और अपने अतीत से जुड़ जाती हूँ, कभी-कभी सोचती हूँ, तुम्हारे कहे शब्द, मैं हमेशा,साथ नहीं हो सकता, और तुम साथ नहीं हुए, तो क्या मैं चली नहीं? ये क्रम है,मेरे जीवन का, हार-जीत से परे, कोई फ़र्क नहीं,  किसी उपेक्षा से, तुम तो पहले भी नहीं थे, तुमसे मिलने को, क्या अकेली नहीं आई थी? अकेले सफ़र की शुरुआत, नहीं की थी ? अरे..!! जो हार से ही शुरू हुआ हो, उसे क्या अंतर होगा ? अब हार पहना दो, या हार मनवा लो, एक ही तो बात हुई न, उर्मिला माधव... 23.10.2016

गर्दन

कटी कोई दार पै गरदन मुक़द्दर कह दिया उसको, ज़ुबां खोले अगर कोई तो बदतर कह दिया उसको, हुआ क्या है अदीबों को हक़ीक़त क्यों नहीं लिखते, कोई गद्दी नशीं देखा  ,सिकंदर कह दिया उसको. #उर्मिलामाधव... 23.10.2015

दफ़ा हो गए

अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं, बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए हैं  सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको, जवां क्या हुए,........बे-वफ़ा हो गए हैं, वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना,  किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं, उर्मिला माधव... 23.10.2014

कह दिया उसको

कटी कोई दार पै गरदन मुक़द्दर कह दिया उसको, ज़ुबां खोले अगर कोई तो बदतर कह दिया उसको, हुआ क्या है अदीबों को हक़ीक़त क्यों नहीं कहते, कोई गद्दी नशीं देखा ,सिकंदर कह दिया उसको मुलाज़िम है,कोई जाहिल,अगर ऊंचे महकमे का अना दिल में दबा ली ऑ , कलंदर कह दिया उसको, उर्मिला माधव, 22.10.2017

हिंदी मुक्तक

हमने मर्यादा में रह कर एक जीवन जी लिया, आत्म मंथन कर लिया ऑ आंसुओं को पी लिया, किंतु ये भी सत्य है हम रह गए बिल्कुल अकेले, फिर भी आँचल कंटकों में फट गया तो सीं लिया उर्मिला माधव, 22.10.2017

आया हुआ

जा नहीं सकता कभी शीशे में बाल आया हुआ, दिल भुला देगा कभी उनका ख़याल आया हुआ जाने किस-किस शक्ल से उठती रही हैं उँगलियाँ, जैसे मेरी सादगी पर ....हो सवाल आया हुआ, ग़म शनासी की तलब करती नहीं बेचैन अब, देख लीजे ज़िन्दगी में है कमाल आया हुआ, कुछ लकीरों में रहेंगी खामियां तकदीर की, आसमां देखेगा बस दिल पर मलाल आया हुआ उर्मिला माधव

ख़ाली है

अब मेरा सूटकेस ख़ाली है, तेरी हर याद जो हटाली है, वो जो चिठ्ठी थी इसके खीसे में, इस बरस होली में जला ली है, मुझको भाता नहीं है रंग-ए-गुलाल, इसलिए खाक़ बस उड़ा ली है, बेवफ़ा तुझको क्यूँ कहे कोई, ख़ुद ये तोहमत मैंने लगा ली है, दिल के कोने में एक बेढब सी, अपनी दुनियां अलग बसा ली है, #उर्मिलामाधव...

लहरा कर

आंधियां चल रही हैं लहरा कर  मैं भी रख आऊं इक दिया जा कर  हर तरफ रौशनी का आलम है, तीरगी क्या करेगी अब आ कर, इन चरागों में कुछ न कुछ तो है, लौट जाती है अब हवा आकर, अब वहां जाने का ख्याल न कर,    दिल जहाँ टूटता है जा-जा कर, मुझको कंदील सिर्फ़ काफ़ी है, इसमें रुक जाये है हवा आकर.... उर्मिला माधव... 21.10.2014....

देखा किये

दूर तक जाते हुए क़दमों को हम देखा किये, दिल में कुछ चीखें उठीं पर लब तलक आईं नहीं, बेवजह,बेसाख़्ता,बेइन्तिहा देखा किए, तू न आएगा कभी अब लौट कर ऐ रहनुमाँ, मुब्तिला-ए-गम थे हम बस जाने क्या देखा किए .......... उर्मिला माधव..

दूर तलक

जिस्म ही बार नज़र आया,बड़ी दूर तलक, के जहां ख़ार नज़र आया ,बड़ी दूर तलक, हर कलेजे को बहुत देर ठहर छान लिया, गर्द-ओ गुब्बार नज़र आया,बड़ी दूर तलक, जो निगाहों से परखने की कभी जुर्रत की, सिर्फ अग्यार नज़र आया,बड़ी दूर तलक, ये नहीं था कि समझ कुछ न कभी आया हो, हर तरफ़ दार नज़र आया,बड़ी दूर तलक, एक भी दिल न फरेबों से कभी खाली रहा, झूठा गमख्वार नज़र आया,बड़ी दूर तलक, ख़ुद को सरताज बनाने की बड़ी कोशिश में, बन्दा अय्यार नज़र आया बड़ी दूर तलक, उर्मिला माधव... 20.10.2014... अग्यार--- प्रतिद्वंदी...

कौन हो--- फ्री वर्स

तुम कौन हो,मैं नहीं जानती, आज भी नहीं और शायद  कभी नहीं जानती थी, अजनबी मिलते हैं, बिछुड़ जाते हैं, मिलन के साथ बिछुड़न ही क्रम है हादसों में जानें चली जाती हैं जिन्दा इंसान मुर्दा हो जाते हैं क्या वो मिल सकते हैं  हमारे लाख चाहने पर भी ? नहीं ना ? तुम्हीं कहो कितना लंबा धैर्य  रखा जाता है कभी लौट कर न आने तक अब मुझे कोई बेचैनी नहीं होती किसीके न आने की कौन इस जंजाल में फंसना चाहता है ठीक होता है चैन की नींद सोना  रचनाएँ जन्म लेती हैं इससे और तुम तो  लिख नहीं सकते एक लफ़्ज़ भी कवि थोड़े ही हो कैसे जानोगे  भावनाएं कैसेआहत होती हैं तकलीफें लिखना सिखाती हैं धार्मिक भी नहीं हो तुम विश्वास का तुमसे कोई नाता नहीं वरना शिवजी की जटाओं से बहती गंगा,जो तुम मुझे हमेशा  दिखाया करते थे  उसे खुद क्या देख नहीं लेते ? तुमने ही कहा था न ? विश्वास भी एक भावना है क्यों विश्वास की बुनियादें हिल गईं तुम्हारी,  बोलो चुप क्यों हो ? पर नहीं मैं जानती हूँ तुम नहीं बोलोगे, विश्वास जो हिल गया तुम्हारा तुम वो आदमी ही नहीं हो जो हुआ करते थे  चलती हूँ.... #उर्मिलामाधव 21....

मुक़द्दर

कटी कोई दार पै गरदन मुक़द्दर कह दिया उसको, ज़ुबां खोले अगर कोई तो बदतर कह दिया उसको, हुआ क्या है अदीबों को हक़ीक़त क्यों नहीं लिखते, हुआ गद्दी नशीं कोई ,सिकंदर कह दिया उसको मुलाज़िम है,कोई जाहिल,अगर ऊंचे महकमे का अना दिल में दबा ली ख़ूब बेहतर कह दिया उसको, उर्मिला माधव

जल्दी बहुत थी

कहीं भी समय से ....पहुँच ही न पाई, समय को गुज़रने की जल्दी बहोत थी कभी राह में,कोई तक़रार हो ली, महज़ बे मआनी सी गुफ़्तार हो ली, उसी मसअले में गिरफ़्तार हो ली, तो मैं अपनी जानिब से चलती बहोत थी, समय को गुज़रने की जल्दी बहोत थी, उर्मिला माधव, 19.10.2017

सर लिया

एक ग़ज़ल.... जो उसे करना था उसने कर लिया, मैंने बस इलज़ाम अपने सर लिया, फासले दिल में मुक़म्मल हो गए, और दामन इक धुंए से भर लिया, मुतमईन कोई हो गया उससे बहुत, मैंने हिस्से में महज़ एक डर लिया, सोचती रहती हूँ ......अब तन्हाई में, इस क़दर क्यों फैसला बदतर लिया, गुफ्तगू का वक़्त भी आया बहुत, मैंने मौजू,जान कर, दीगर लिया... खुश रहा वो भी मुझे कम आंक कर, दिल मेंरा उसपे फ़क़त हंस भर लिया... #उर्मिलामाधव.. 18.10.2015

खिराज ए अक़ीदत

संतोष आनंद जी को समर्पित---- ---------------------------------------- जो भी हैं हर बार रोकर चल रहे, ज़िन्दगी का बार ढोकर चल रहे, आख़िरश तो सांस भी है बेवफा, किसलिए बेकार सोकर चल रहे, हर कोई कहता फिरे है.....चार सू, वो किसीका प्यार खोकर चल रहे,  जो गुरूर-ए-फ़न में रहते थे कभी,  दाग़ दिल के यार धोकर चल रहे, काम कोई क्या किसीके आएगा, बे-सबब ग़मख्वार होकर चल रहे... उर्मिला माधव... १७.7.2014....

कमाल करते हो

यार तुम तो कमाल करते हो, इश्क़ पे आंखें लाल करते हो? आंखें हंसते हुए ही जंचती हैं, इन में आंसू बहाल करते हो ? कहते फिरते थे,जान हाज़िर है, अब नहीं नज़्र-ए-हाल करते हो? झूठ कहने की ताब इतनी है ? शान-ए-सच को ज़वाल करते हो? इतने आसान हम कभी भी न थे, आज फ़िर क्या सवाल करते हो? डींग हांको, मगर ये होश रहे, सब्र किसका हलाल करते हो... उर्मिला माधव 17.10.2018

ख़ूबरू है

ऐ मियाँ तुम इश्क़ से ऊपर उठो ना,ज़िन्दगी इसके भी आगे खूबरू है.... सारी दुनियां बस यहीं तक ही नहीं है,जो के वक्ती तौर पर बस रु-ब-रु है...... उर्मिला माधव.... 16.10.2014...

वा करूँ मैं

आसमां पै रास्ता अब वा करूँ मैं ? या नई दुनियां कोई पैदा करूँ मैं ? जिसको देखो दुश्मनी के रंग में है, ज़िन्दगी तू ही बता दे क्या करूँ मैं ? जब ख़ुदा भी हाथ में खंजर लिए हो, कौनसे दर पै भला सजदा करूँ मैं ? हर शिकायत आपको ज़ाहिर तो की है, और अब किस ढंग से शिकवा करूँ मैं? जल रही हैं,आग की लपटें....धकाधक, किस तरह बचके कहाँ निकला करूँ मैं, अश्क बे-गैरत है,फिर भी ख्वाहिशें हैं, साथ इनके उम्र भर.......रोया करूं मैं, दिल्लगी भी कम नहीं की है जहां ने, था यही लाज़िम फक़त देखा करूं मैं, तीरगी तक़दीर में अव्वल लिखी है, चांदनी रातों को क्यूँ रुसवा करूं मैं....

गहराई फ्री वर्स

ये मेरे भीतर की गहराई और गहरी होगई जिजीविषा ठहर गई हो जैसे कुछ सोचती नहीं सोचना चाहती भी नहीं इतिहास डसने लगता है स्कूल की पेरेंट्स मीटिंग हमेशा सताया जिसने मुझे पापा...... ये लफ़्ज़ कभी कहा ही नहीं पिता के साथ लिपटते हुए मेरे हमजोली मेरी सूनी आँखें शून्य में और शून्य हो गईं #उर्मिलामाधव 16.10.2015

दोस्त मालूम नहीं-- फ्री वर्स

दोस्त कहाँ होते हैं मालूम नहीं, दुःख को दुःख की तरह समझने वाले कहाँ होते हैं जो प्यार के अहसास को निर्भरता का नाम नहीं देते  कहाँ होते हैं ऐसे लोग मालूम नहीं बरसों पहले किसीके मुंह से ये लफ़्ज़ पहली बार सुना था ब्रीदिंग स्पेस... जिससे कहा गया  उसने भोलेपन में समझा ही नहीं मेरे लिए भी नया था लेकिन आज मैं इसके मानी ख़ूब जानती हूँ इसे दामन छुड़ाना कहते हैं अंग्रेजी है ये हमारी समझ से दूर ऐसे घुमावदार लफ़्ज़ अच्छे नहीं सच और साफ कह देना  ज़ियादा ठीक था मुझे अगर ये लफ़्ज़ जब भी सुनना ही पड़ जायेगा प्रीफर करुँगी भूलना उम्र भर का ऐसे अल्फ़ाज़ रिश्तों के मज़ाक उड़ाते से लगते हैं यानि घुटन कोई क्यों बर्दाश्त करे बेहतर हो.... चलो एक बार फिर से अजनबी बन जांय क्योंकि मुझे ख़ामोशी  फूलों जैसी नहीं लगती चिकनी बातें करना मुझे नहीं आता,कभी आया भी नहीं और आना भी नहीं है अच्छा है बहुत ये एकला चालो रे... #उर्मिलामाधव 16.10.2015

ज़रा सा निकल गया

जब मेरी इज़्ज़तों का जनाज़ा निकल गया, हर आदमी ही मुझसे शनासा निकल गया, हाथों से रोकती थी मुक़द्दर को हर नफ़स, कैसे बताऊँ बच के ज़रा सा निकल गया, उर्मिला माधव  16.10.2017

डर गया होता

एक मतला दो शेर----- अगर ये वक़्त कभी हम से डर गया होता, ये समझो ज़ोर-ओ-ज़बर ग़म भी मर गया होता, सदा-ए-रंज-ओ अलम, हमसे डर गई होती, बहार-ओ-गुल का चमन रक्स कर गया होता, अगर वफ़ा की नज़र,हमसे मिल गई होत...

उखड़ जाती है

जब किसी क़ब्र की एक ईंट उखड जाती है, घर की दीवार से कुछ राख़ सी झड़ जाती है, दश्त-ए-खुर्शीद से उतरी सी कोई बेचैनी , लम्बे अरसे के लिए ग़म से जकड़ जाती है, ग़म ज़दा करके मेरे पीछे ही पड़ जाती है, ऐसा लगता है हर इक ज़ात से हूँ वाबस्ता, वरना क्या चीज़ है जो रूह में गड़ जाती है, उर्मिला माधव

सोचिए-नज़्म

ख़्वाहिशों के दायरे महदूद करके सोचिए, भीड़ में तन्हाई को मंसूब करके सोचिए, सूरत-ए-दीवार भी हो आईना दर आईना, ज़िन्दगी की शक़्ल को उसलूब करके सोचिए, ख़ुद ही अपने आप को मज्जूब करके सो...

शर्मिंदगी है

क्या बची आँखों में कुछ शर्मिंदगी है? या अभी तक भी मुसलसल गंदगी है? आग दरिया में लगा कर क्या करोगे? जिसकी फितरत ही सरासर बंदगी है, दिल हमारा खूब दरिया है अभी तक,  इसलिए महफ़ूज़ अपन...

भीड़ नहीं हो -फ्री वर्स

प्रियवर--- तुम भीड़ नहीं हो भीड़ में कुछ आँखें बहुत चुभती हैं मुझे तुम जानते हो क्या कहती हूँ मैं भीड़ की आँखों की चुभन सालती है मुझे तुम जानते हो क्या कहती हूँ मैं तुम्हारा भीड़ स...

5 ग़ज़लें

1 2122/1212/22 फाइलातुन/मफाइलुन/फैलुन उसने चाहा था वो लिखा जाये, इससे बेहतर है ....मर्सिया गाये दिल मगर इन्तिख़ाब करता है अब किसीसे न कुछ कहा जाये झूठ से पुर असर तबस्सुम क्या, इब्न-ए-आदम पै ...

मौसमों का

याद क्या करना ग़मों का, आते-जाते ...मौसमों का, ख़ैर मक़दम ही किया है, ज़ह्र से उन आलमों का, क्यूं रहे शिकवा किसीसे, उम्र भर के मातमों का, डर कहां बाक़ी रहा अब, गोलियों का और बमों का सामना ...

क्या क्या बदल गया है

वो आदमी वही है,लहजा बदल गया है, अब दरमियां हमारे,क़िस्सा बदल गया है, wo aadmii wahi hai,lahjaa badal gayaa hai, ab darmiyan hamaare qissa badal gaya hai, हम मुन्तज़िर रहे हैं,आने की कह गया था, गिनते हैं उँगलियों पर,हफ्ता बदल गया है, ham munzir rahe hain aane kii kah gaya tha, ginte hain ungliyon par haftaa badal gaya hai, ल...

नज़्म

ranjishon ki dhhar par kitni nishaani  mit gayin, saltanat kitni mitin ,kitni riaaya mit gayin kin darakhton ki na jaane kitni shaakhen mit gayin, sabz patte mit gaye or naujawani mit gayi, mit gaye kitne sikandar or miti raah-e-junoon mit gaye hukkam hakim bas kahani ra gayi.....Urmila Madhav...

जीत जाते हैं

एक मतला एक शेर...। ये देखो आज अपने दम पे ही हम जीत जाते हैं, वगरना ऐसी कोशिश में ज़माने बीत जाते हैं, कभी ऐसा भी जज़्बा था हमारी जिंदगानी में, हरेक पल फैसला करते थे,छोडो रीत जाते हैं, ...

लिखा जाए

उसने चाहा था वो लिखा जाये, इससे बेहतर है ....मर्सिया गाये दिल मगर इन्तिख़ाब करता है अब किसीसे न कुछ कहा जाये झूठ से पुर असर तबस्सुम क्या, इब्न-ए-आदम पै हर गिला जाए, किसकी अब बानगी त...

सितम में

यारो मुआफ़ करना हंगामा-ए-सितम में कुछ मुंह से निकल जाए ग़र दर्द के आलम में, अपना सफ़र अभी तक,तय तो नहीं हुआ है, डर-डर के जी रहे हैं हम हार के भरम में, कमज़ोर पड़ रही है,रिश्तों की पायदार...

करे कोई

आली जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब साहब की ज़मीनपर कही गई फिल्बदीह की एक ग़ज़ल... kis-se kya-kya kaha kare koii yun hi kab tak jalaa kare koii, zindagi bhar kii ye musiibat hai, gam se kab tak maraa kare koi, kab kahan pe ye saans ruk jaaye itna kab tak daraa kare koii, gar ye himmat jawaab de jaaye, aisii haalat main kya kare koii, apni jaanib se bas nibaah rahe, chaahe jitnaa dagaa kare koii , waqt bhii waqt par badalna hai, sabr kuchh to zaraa kare koii, aashiqii ishq ek fajiihat hai, khud ko kyun mubtila kare koii, #उर्मिलामाधव 10.10.2015

रहती है

मेरे सर पे सवार रहती है, बेख़ुदी बेशुमार रहती है, तीरगी तेरा अदा तेरी रमज़, जिस्म के आर-पार रहती है, उर्मिला माधव

रखते क़दम

जाने कितनी दूरियां हैं,और मेरे थकते क़दम, राह की दुश्वारियों मैं.....आसरा तकते क़दम, राह मैं कोई रहनुमां होता तो कट जाता सफ़र, और ये भी था ज़रूरी.....देख कर रखते क़दम, है अगर इमकान तो....मजबूर...

कुछ नहीं होगा

फ़िक़्र करने से कुछ नहीं होगा, आह भरने से कुछ नहीं होगा, दिल में इक इन्कलाब है तो है, मुफ़्त डरने से कुछ नहीं होगा, राह भी इन्तिख़ाब करके चल, बात करने से कुछ नहीं होगा, ले सहर खुशनुमा ...

ख़ुदा करके

रूह को जिस्म से जुदा करके, ख़ूब रोये यूँ......इब्तेदा करके, यूँ भी रस्मन निबाह करना था, ज़िन्दगी जी ख़ुदा-ख़ुदा करके, क़द्र करके भी देखती दुनियां, चाहते हम भी नाख़ुदा करके... उर्मिला माधव.. ...

प्रज्वलित करो

अबा भी तार-तार हो, फ़लक़ भी शोलाबार हो की तर्ज़ पर--- जब ह्रदय विदीर्ण हो, स्वप्न जीर्ण-शीर्ण हो, मार्ग भी संकीर्ण हो, हारना नहीं पथिक, उठ खड़े हो वेग से, जो करो,त्वरित करो, अंधकार के समक...

तख़य्युल

हमने जो कुछ भी लिखा है इक तख्खईयुल है महज़ इसमें हरगिज़ शख्सियत कोई ...दूसरी शामिल नहीं... :::::::::::::::::::::::::::::::::: hamne jo kuchh bhii likha hai ik takhkhaiul hai mahaz, ismen hargiz shakhsiyat ..........koi dusrii shamil nahin.... उर्मिला माधव... 8.10.2016

प्रणय को --- गीतिका

क्यों अकारण ही करें पीड़ित हृदय को, स्वयम ही स्वीकार लें बाधित समय को, हर नदी की संधि है,सागर के तट पर, ये हुआ, स्वीकारना निश्चित विलय को, जब कभी सागर ने अपने बांध तोड़े, कौन कर पाया...

ख़ताबार हैं सभी

kuchh mitron ki farmaish par.. ---------------------------------- जिनको ग़ुरूर-ए-फ़न है ख़ताबार हैं सभी, कुल क़ायनात के वो गुनहगार हैं सभी, जो ज़िन्दगी से ज़िन्दगी को हारकर चले, वो अपनी ज़िन्दगी के सितमगार हैं सभी, इन्सानियत की ...

कोई नहीं

राह जो चलनी है इसमें खूबियाँ कोई नहीं, रूह-ए-खुद को छोड़ के वक़्त-ए-गिरां कोई नहीं, दह्र है जलता हुआ और पथ्थरों के आदमी चिलचिलाती धूप है ऑ आशियाँ कोई नहीं, और कितना आज़माना,जो हुआ व...

मआनी है

सारा दारोमदार है तुम पर ये समझना तो बे-मआनी है तुम समझते हो हम ही नादाँ है? दिल तजुर्बों की राजधानी है, उर्मिला माधव

क़ुर्बान होगए

तिरछी नज़र की धार पे क़ुर्बान हो गए, यूँ दिल की खुदकुशी पे पशेमान हो गए, अपने मिजाज़ में तो कभी आशिक़ी न थी, पर ऐसा कुछ हुआ के परेशान हो गए, अंदाज़ अपनी रूह के बस ज्यों के त्यों रहे हम ह...

भावनाएं

भावनाएं होगईँ, कुत्सित प्रणय की, आस्था के पांव पीले पड़ गए, वृक्ष की शाखाएं विचलित हो गईं और हरे पत्ते सिकुड़ कर झड़ गए, एक मुट्ठी छांव भी मिलने न पाई, और पथिक अविराम गति से लड़ गए, अ...

क़ुर्बान हो गए

तिरछी नज़र की धार पे क़ुर्बान हो गए, यूँ दिल की खुदकुशी पे पशेमान हो गए, अपने मिजाज़ में तो कभी आशिक़ी न थी, पर ऐसा कुछ हुआ के परेशान हो गए, अंदाज़ अपनी रूह के बस ज्यों के त्यों रहे हम ह...

ठहर जाए

वो जो रह-रहके चोट कर जाए, अपने अलफ़ाज़ से..मुकर जाए, आशिक़ी,इश्क एक फजीहत है, जिसको रोना हो वो इधर जाए, दर्द से दिल नहीं मुकाबिल हो, खैरियत से ही अब गुज़र जाए, मुझको हंसने को इक बहाना दे, ...

नहीं कहते

आह को अजनबी नहीं कहते, इश्क़ को ज़िन्दगी नहीं कहते, दिल को महदूद रखना अच्छा है ग़ैर से ग़म कभी नहीं कहते, गुफ़्तगू में हज़ार ख़म निकलें, उसको हम सादगी नहीं कहते, गर चे है फ़िक़्र दीनो दुन...

नफ़ा हो गए हैं

अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं, बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए है समेटे नहीं जा सके दिल के टुकड़े, ये हिस्से भी कितनी दफ़ा हो गए हैं, सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको, जवां क्या हुए,........बे-वफ़ा हो गए ...

मुअय्यन है

ज़िन्दगी कब तलक मुअय्यन है, लोग ....रह-रह के आज़माते हैं, जिसकी बुनियाद ही नहीं कुछ भी, उस पे सब ......अटकलें लगाते हैं, Zindagi kab talak muayyan hai, Log rah-rah ke aazmate hain, Jiski buniyad hi nahin kuchh bhi Us pe sab atkalen lagaate hain, Urmila Madhav 5.10.2017

कहानी-- तनारीरी

क्या ये दिन भर,तनारीरी लगाए रखती हो पढ़ाई में जी क्यूँ नहीं लगाती ये सब क्या काम आएगा,क्या तुमको कहीं मुजरा करना है जो  दिन भर थेई-थेई-थेई त त ता करती रहती हो,नहीं तो तबला पीटती र...