खिराज ए अक़ीदत
संतोष आनंद जी को समर्पित----
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जो भी हैं हर बार रोकर चल रहे,
ज़िन्दगी का बार ढोकर चल रहे,
आख़िरश तो सांस भी है बेवफा,
किसलिए बेकार सोकर चल रहे,
हर कोई कहता फिरे है.....चार सू,
वो किसीका प्यार खोकर चल रहे,
जो गुरूर-ए-फ़न में रहते थे कभी,
दाग़ दिल के यार धोकर चल रहे,
काम कोई क्या किसीके आएगा,
बे-सबब ग़मख्वार होकर चल रहे...
उर्मिला माधव...
१७.7.2014....
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