रख रही हूँ

एक मतला दो शेर ---

मैं किताबों अब सिरहाने रख रही हूं,
चंद वरकों में ज़माने रख रही हूं,

हर वरक संजीदगी के नाम है,
एक माज़ी सोलह आने रख रख रही हूं,

एक ख़नक आहों के हिस्से की भी है,
सबके अपने-अपने ख़ाने रख रही हूं,
उर्मिला माधव,
28.10.2017

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge