सोचिए-नज़्म
ख़्वाहिशों के दायरे महदूद करके सोचिए,
भीड़ में तन्हाई को मंसूब करके सोचिए,
सूरत-ए-दीवार भी हो आईना दर आईना,
ज़िन्दगी की शक़्ल को उसलूब करके सोचिए,
ख़ुद ही अपने आप को मज्जूब करके सोचिए,
द्वार घर के बंद करके चीखिये दीवानावार,
बाद उसके जो समा बंध जाएगा वो ज़ीस्त है....
उर्मिला माधव
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