लहरा कर
आंधियां चल रही हैं लहरा कर
मैं भी रख आऊं इक दिया जा कर
हर तरफ रौशनी का आलम है,
तीरगी क्या करेगी अब आ कर,
इन चरागों में कुछ न कुछ तो है,
लौट जाती है अब हवा आकर,
अब वहां जाने का ख्याल न कर,
दिल जहाँ टूटता है जा-जा कर,
मुझको कंदील सिर्फ़ काफ़ी है,
इसमें रुक जाये है हवा आकर....
उर्मिला माधव...
21.10.2014....
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