रखते क़दम

जाने कितनी दूरियां हैं,और मेरे थकते क़दम,
राह की दुश्वारियों मैं.....आसरा तकते क़दम,

राह मैं कोई रहनुमां होता तो कट जाता सफ़र,
और ये भी था ज़रूरी.....देख कर रखते क़दम,

है अगर इमकान तो....मजबूरियाँ होतीं सहल,
वरना ख़ाली हसरतों से..चल नहीं सकते क़दम, 

मुश्किलों से हटके चलने का हुनर आता अगर,
क्यूँ धतूरों के ज़हर को..बे-वजह चखते क़दम,

ज़िन्दगी राह-ए-अज़ल का क़र्ज़ है...ऐ दोस्तों,
ये वो रस्ता है जहाँ......पीछे नहीं हटते क़दम,
उर्मिला माधव...
8.10.2013..

इमकान---सम्भावना ..

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge