कौन हो--- फ्री वर्स
तुम कौन हो,मैं नहीं जानती,
आज भी नहीं और शायद
कभी नहीं जानती थी,
अजनबी मिलते हैं,
बिछुड़ जाते हैं,
मिलन के साथ बिछुड़न ही क्रम है
हादसों में जानें चली जाती हैं
जिन्दा इंसान मुर्दा हो जाते हैं
क्या वो मिल सकते हैं
हमारे लाख चाहने पर भी ?
नहीं ना ?
तुम्हीं कहो कितना लंबा धैर्य
रखा जाता है
कभी लौट कर न आने तक
अब मुझे कोई बेचैनी नहीं होती
किसीके न आने की
कौन इस जंजाल में फंसना चाहता है
ठीक होता है चैन की नींद सोना
रचनाएँ जन्म लेती हैं इससे
और तुम तो
लिख नहीं सकते एक लफ़्ज़ भी
कवि थोड़े ही हो कैसे जानोगे
भावनाएं कैसेआहत होती हैं
तकलीफें लिखना सिखाती हैं
धार्मिक भी नहीं हो तुम
विश्वास का तुमसे कोई नाता नहीं
वरना शिवजी की जटाओं से
बहती गंगा,जो तुम मुझे हमेशा
दिखाया करते थे
उसे खुद क्या देख नहीं लेते ?
तुमने ही कहा था न ?
विश्वास भी एक भावना है
क्यों विश्वास की बुनियादें
हिल गईं तुम्हारी,
बोलो चुप क्यों हो ?
पर नहीं मैं जानती हूँ
तुम नहीं बोलोगे,
विश्वास जो हिल गया तुम्हारा
तुम वो आदमी ही नहीं हो
जो हुआ करते थे
चलती हूँ....
#उर्मिलामाधव
21.10.2015
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