5 ग़ज़लें
1
2122/1212/22
फाइलातुन/मफाइलुन/फैलुन
उसने चाहा था वो लिखा जाये,
इससे बेहतर है ....मर्सिया गाये
दिल मगर इन्तिख़ाब करता है
अब किसीसे न कुछ कहा जाये
झूठ से पुर असर तबस्सुम क्या,
इब्न-ए-आदम पै हर गिला जाए,
किसकी अब बानगी तलाशे दिल,
ख़ाक़ दरिया में जब बहा आये,
अब ये तबियत कहीं नहीं लगती,
इस तरह कब तलक चला जाए,
अपनी मुठ्ठी में ख़ाक़ रखते हैं,
ज़िन्दगी तुझसे क्या मिला जाए..
#उर्मिलामाधव
2
2122/1212/22
फाइलातुन/मफाइलुन/फैलुन
वो जो रह-रहके चोट कर जाए,
अपने अलफ़ाज़ से..मुकर जाए,
आशिक़ी,इश्क एक फजीहत है,
जिसको रोना हो वो इधर जाए,
दर्द से दिल नहीं मुकाबिल हो,
खैरियत से ही अब गुज़र जाए,
मुझको हंसने को इक बहाना दे,
ज़िन्दगी...जाने कब ठहर जाए,
जीस्त को जब भी ऐसी ख्वाहिश हो,
इतनी तौफीक़ दे.......कि मर जाए,
#उर्मिलामाधव..
3
122/122/122/122
फऊलुन/फऊलुन/फऊलुन/फऊलुन
अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं,
बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए है
समेटे नहीं जा सके दिल के टुकड़े,
ये हिस्से भी कितनी दफ़ा हो गए हैं,
सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको,
जवां क्या हुए,........बे-वफ़ा हो गए हैं,
मुहब्बत के मानी बचे ही कहाँ कुछ,
फ़क़त अब ज़ियाँ और नफ़ा हो गए हैं....
वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना,
किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं,
#उर्मिलामाधव..
4
2122/2122/2122/2122
फाइलातुन् x 4
उम्र भर को जुड़ गए हैं,आपसे जज़्बात मेरे.
साथ बस देते नहीं हैं,आजकल हालात मेरे,
ख़ुश्क आँखों का वो मंज़र देख कर ऐसा हुआ
अश्क़ लानत दे गए हैं क्या कहूँ कल रात मेरे,
सोचती हूँ आख़िरश बाहर निकलकर क्या करूँ
दम-ब-दम जलती ज़मीं ऑ सर पै ये बरसात मेरे,
दोनों हाथों से उठा कर फेंकती रहती हूँ बाहर,
हो गई घर में ग़मों की रात-दिन इफरात मेरे,
भूल सी जाती हूँ मैं सब,मेरी दुनियां क्या हुई ?
वहशतें सी कह रही हैं कान में कुछ बात मेरे...
#उर्मिलामाधव,
5
2122/1122/1122/22
(फाइलातुन/ फइलातुन/ फइलातुन/ फैलुन)
जितनी निभती हो उसे दिल से निभालो यारो,
वरना कुछ दोस्त नए फिर से बनालो यारो...
दोस्ती खेल नहीं इसकी अदा सबको खबर,
अपनी बाज़ी को ज़रा ढंग से बिछा लो यारो,
आग से आग सुलगती है,कभी बुझती नहीं,
ग़म के शोलों की दवा ग़म न बनालो यारो,
दिल के हालात को महदूद नहीं रखना बस,
हम भी तो हैं न, चलो हमको सुनालो यारो,
कुछ घने दश्त हैं,छाले हैं अजब दुनियां है
जिसका अंदाज़ नहीं,उसका मज़ा लो यारो...
उर्मिला माधव....
6
2122/2122/2122
फाइलातुन/ फाइलातुन फाइलातुन
लोग जो ग़ुरबत का रोना रो रहे हैं,
ख़ुद-ब-ख़ुद ही बीज इसके बो रहे हैं,
दाने-दाने को भले मोहताज हरगिज़,
ज़िन्दगी को बोझ बनके ढो रहे हैं,
घर नहीं है,दर नहीं बिस्तर नहीं है
दम-ब-दम अतफ़ाल फिर भी हो रहे हैं ,
अब नहीं ख़ाली जगह चींटी बराबर,
रोज़ बस किस्से वतन में हो रहे हैं,
क्या सियासत दां करेंगे रहनुमाई,
खुद के ही दामन के धब्बे धो रहे हैं,
#उर्मिलामाधव
Comments
Post a Comment