भावनाएं
भावनाएं होगईँ, कुत्सित प्रणय की,
आस्था के पांव पीले पड़ गए,
वृक्ष की शाखाएं विचलित हो गईं
और हरे पत्ते सिकुड़ कर झड़ गए,
एक मुट्ठी छांव भी मिलने न पाई,
और पथिक अविराम गति से लड़ गए,
अनवरत क्रंदन यहां अब चल रहा,
कंटकों के जाल अविरल गड़ गए,
होगया दूषित विषम, वातावरण,
हर हृदय के घाव इतने सड़ गए...
उर्मिला माधव,
7.10.2017
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