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Showing posts from November, 2019

हरी हो गई

ज़ख्म की बेल फिर से हरी होगई, जिन्दगी दर्द से....अधमरी होगई, इतना ज़्यादा जलाया गया है मुझे,  कि मैं कुंदन सी तपके खरी होगई, मेरी शफ्फाक़ रूह और उजला बदन, कैसी पत्थर हुयी......मरमरी होगई, न जुदाई का गम,न मिलन की ख़ुशी इन बलाओं से बिलकुल..बरी होगई, ये मुकाबिल खड़ी है,हर इक तंज पे, खूब फितरत मेरी.....छरहरी होगई, उर्मिला माधव.. १.१२.२०१३...

सहेले

दुनियाँ के सारे मेले, लगते हैं बस झमेले, सबको धता बताकर, चलते हैं अब अकेले, तर्जीह उसको क्या दें, जो ज़िन्दगी से खेले, गाहे-ब-गाहे आकर, तकलीफ में धकेले, सुख चैन तक हमारा, गमख्वार बनके लेले, फिर झूठी गुफ्तगू में, लगते हैं कितने धेले?? हमसे न निभ सकेंगे, ता-उम्र ये......सहेले, उर्मिला माधव.. 30.11.2013..

कही थी

बात तो बिलकुल शराफ़त से कही थी, क्या ख़बर के क्या कमी उसमें रही थी, बाज़ आख़िर आ न पाया.....दोस्त मेरा,   क्या ग़ज़ब है.....क्यूँ हवा झूठी बही थी, आग पत्थर में......कभी लगती नहीं है, कैसे बदलेगी..जो फितरत ही वही थी, ख़ामख्वाह..गफलत में आया है बेचारा, सोचना उसको भी था..कितनी सही थी, जो हकीक़त थी वो तुझ तक जा न पाई तू  समझ ले  बस तेरी क़िस्मत यही थी  उर्मिला माधव... 30.11.2014...

जानती। हूँ

Sarhadon ke paar ho tum,jaanti.hun, Manzilon ke daayre pahchante hun, Fark kya hai,duriyon,nazdiikiyon main Main to tumko, sirf apnaa maanti hun.. #उर्मिलामाधव 29.11.2015

पराया था

फिल्बदीह के तह्तकही गई एक ग़ज़ल... जब अँधेरे थे ,वो पराया था, रौशनी देख के जो आया था, उसको दरकार सिर्फ़ खुशियाँ थीं  मैंने तकलीफ़ में बुलाया था, मेरी उम्मीद खुद पे कायम थी,  इससे बेहतर तो मेरा साया था,  अपने हाथों से फूंक सकती थी, वो जो इक आशियाँ बनाया था, क्या कहूँ जिससे ग़म कहे मैंने, मुझपे हंसने को सिर्फ़ आया था, ज़िन्दगी यूँ तो इक अमानत थी, वक़्त ने जिसको लूट खाया था, किसको जीने की इतनी ख्वाहिश थी  रब का बस हुक्म सा बजाया था, #उर्मिलामाधव.. 30.11.2015

बतानी पड़ेगी

हक़ीक़त हमें अब बतानी पड़ेगी, तुम्हें ग़म से बाज़ी लगानी पड़ेगी, तुम्हें याद होगा, कभी हम मिले थे, वही बात तुमको भुलानी पड़ेगी, कहाँ तक तअक़्क़ुब में फिरते रहेंगे तबीयत सभी से हटानी पड़ेगी, समझ में ज़माना भी आने लगेगा, फ़क़त नौहाख्वानी सिखानी पड़ेगी, रहेंगे ये खांचे तो महफ़ूज़ लेकिन, कहानी ....घटानी-बढ़ानी पड़ेगी, मिरा साथ तुमको कहाँ तक मिलेगा ? बख़ुद ज़िन्दगानी ....चलानी पड़ेगी, उर्मिला माधव.. 30.11.2016

धुआं सा उठता है

एक तरफ़ कुछ धुंआं सा उठता है, इसमें कोइ,ग़म निहां सा लगता है, चार सू .....अजनबी सा आलम है, क्यूँ ये ..वक़्त-ए-गराँ सा लगता है, अब तो बस एक सम्त ख़ाली है, वो के जो ....आसमान वाली है, उर्मिला माधव

बार बार

सीना हुआ फ़िगार मेरा जिस्म तार-तार, इस वक़्त ने सज़ाएं मुझे दीं हैं बार-बार, Seena huA fighar mera jism taar-taar, Is waqt ne sazaeN mujhe dein hain baar-baar, उर्मिला माधव

मुस्कुराने को

मैं सोचती थी बहुत, पहले मुस्कुराने को, सो अब ये काम मुझे सिर्फ़ काम लगता है... उर्मिला माधव

परसाई गई

उसकी गलियों की बात आई-गई, खाक़ इस दिल की फिर उड़ाई गई.. कितनी शर्मिंदगी से गुज़रा किये, उसकी तसवीर साथ पाई गई, इक अजब शक़्ल से मुखातिब थे, आईना दे के जो दिखाई गई, मैं हूँ क़िरदार उस कहानी का, जो के अंजाम तक न लाई गई, मेरी आखों में तिरे अंदाज़ को देख, कैसे-कैसों की पारसाई गई, उर्मिला माधव

कूड़ा करकट -नज़्म

ये दुनियां कूड़ा करकट है, तुम कूड़े हो,ये कूड़ा है, वो कूड़ा है,इधर-उधर भी सब कूड़ा है, सिर्फ़ अकेले हम ही हैं जो इस दुनियां में कूड़ा नईं हैं, बकते हो तुम,तुम्हीं अकेले कूड़ा नईं हो ? सोच समझ कर बोल रहे हो, या फ़िर सच सच बतला दो ना, कुफ़्र झूठ का तौल रहे हो ? सबसे पहले ख़ुद को देखो, कूड़ा ही तुम बोल रहे हो, कूड़ा ही तुम तौल रहे हो, दुनियां भर को कूड़ा कहकर, तुम अपना सच खोल रहे हो, पहले तुम सच कहना सीखो, इस दुनियां में रहना सीखो, उर्मिला माधव

बे अमां हूं मैं

उमेर नजमी की तर्ज़ पर.. सब ये कहते हैं, बे अमां हूँ मैं, फ़िर भी महफूज़ हूँ,जहां हूँ मैं, ख़ुद को ज़ाहिर नहीं किया मैंने, दुनियां कहती है इक ज़बाँ हूँ मैं, न तो पर्दों का इस्तेमाल किया, और न सोचा के कब कहां हूँ मैं, मेरी नज़दीकियां हुईं महसूस, क्योंकि हर दिल के दरम्यां हूँ मैं, फिर भी इल्ज़ाम हो तो हाज़िर हूँ, अपने घर के सिवा कहां हूँ मैं? मेरा दुश्मन नहीं कोई अब तक, क्यूंकि हर शय पे ही अयाँ हूँ मैं, नक्श पा मिट गए ये फ़िक़्र नहीं, तनहा तनहा भी कारवां हूँ मैं.... उर्मिला माधव 28.11.2017

संभाल लेना

हैं मुब्तिला हम ग़मे जहां में,हमारी दुनियां संभाल लेना, अजीब दलदल में धंस गए हैं, तो आगे बढ़के निकाल लेना, उर्मिला माधव

रहे हैं

आप आदत से अलहिदा चल रहे हैं, हम अदावत से अलहिदा चल रहे हैं अपनी आंखें को हथेली से छुपाके, हर बग़ावत से अलहिदा चल रहे हैं.. उर्मिला माधव 27.11.2017

बग़ावत है

आज सब से खुली बग़ावत है, मेरी छुटपन से ये ही आदत है क्या कहूं किस के क्या मसाइल हैं मुझसे हर शख़्स को अदावत है, जीत मेरी है, फ़िर भी कहती हूं, लो मुक़ाबिल हूं मुझमें हिम्मत है, उर्मिला माधव

ग़म संभाल कर

वो जा चुके हैं बज़्म से,इज्ज़त उछाल कर, मैंने भी रख दिया है अभी गम संभाल कर, ख़ुद ही जवाब दूं ये कहाँ फिक्र है मुझे, हालात सच को लायेंगे बाहर निकाल कर, काँटों पे लिख रही हूँ अभी आबलों के नाम, ख़ामोश मेरे दिल, न अभी कुछ सवाल कर, इस दर्द से निजात भी मिलनी तो है ज़रूर  हो उम्र भर को मुंतज़िर,क़ायम मिसाल कर, कारीगरी अजब है मगर वक़्त की जनाब, कितनों को इसने पी लिया शीशे में ढाल कर, #उर्मिलामाधव.... 26.11.2015

झुकने लगीं

कितनी ऊंची बोलियां,बाजार में लगने लगीं, इक शजर की डालियां थक हार कर झुकने लगीं, जाने कैसा शख़्स था किरदार से गिरता गया, और हवा के शोर से बदनामियाँ डरने लगीं, कुछ दिनों आलम रहा भरपूर जश्न-ए-ज़ीस्त का, फिर रुख़-ए-गुलज़ार पर बेज़ारियां दिखने लगीं.. आबरू से खेल करना,खेल ख़ुद से है जनाब, दह्र के उस पार भी चिंगारियां उठने लगीं, उर्मिला माधव 26.11.2017

नहीं सुनता है

आदमी अपने लिए खुद ही कफ़न बुनता है, और मज़ा ये है ....कोई बात नहीं सुनता है.. उर्मिला माधव....

कलेजा हो गया

रंज से खूंगर.........कलेजा होगया, गो कि हर इक लफ्ज़ बेजा होगया.... उर्मिला माधव... 23.11.2014

रंजिशों की धार पर

Ranjishon ki dhhar par kitni nishaani mit gayin, saltanat kitni mitin ,kitni riaaya mit gayin kin darakhton ki na jaane kitni shaakhen mit gayin, sabz patte mit gaye or naujawani mit gayi, mit gaye kitne sikandar or miti raah-e-junoon mit gaye hukkam hakim bas kahani rah gayi..... ------------------------------------------------------------------ रंजिशों की धार पर,कितनी निशानी मिट गईं, सल्तनत कितनी मिटीं,कितनी रिआया मिट गईं, किन दरख़्तों की न जाने,कितनी शाखें मिट गईं, सब्ज़ पत्ते मिट गए और नौजवानी मिट गईं, मिट गए कितने सिकंदर और मिटी राह-ए-जुनूँ, मिट गए हुक्काम-हाकिम,बस कहानी रह गई... #उर्मिलामाधव 23.11.2015

अधूरा लगता है

मेरी एक बहुत पसंदीदा रचना... सखियाँ कहतीं,साजन के बिन प्यार अधूरा लगता है, अम्मां कहतीं काजल बिन....सिंगार अधूरा लगता है, चाहे जितनी बिजली चमके,घर की सभी मुंडेरों पर, बिन बरखा के बादल का...हर वार अधूरा लगता है, हीरे मोती जड़े रहें और धार भी हो.....तलवारों पर, युद्ध वीर के हाथों बिन.....हथियार अधूरा लगता है, भारी भरकम दरवाजों पर.....सजी हुई मेहराबें हैं, बेटी की बारात बिना......हर द्वार अधूरा लगता है, सदियों से कई  नाम लिखे हैं जगह-जगह दीवारों पर, सत्य सनातन,शिव के बिन विस्तार अधूरा लगता है, उर्मिला माधव...

तो मुश्किल

समझ आया तो येआया, मुहब्बत एक मुश्किल है नहीं होजाए तो मुश्किल, कहीं होजाए तो मुश्किल, निकल तो आये हैं घर से, कि हम करलें..मुलाकातें, कहीं हो जाए तो मुश्किल, नहीं हो जाए तो मुश्किल, यही बस एक मुश्किल है, मुहब्बत..कैसे ज़ाहिर हो, कहीं होजाए तो मुश्किल, नहीं होजाए तो मुश्किल. उर्मिला माधव ... २३.११.२०१३..

मुश्किल हो गई

आपसे जब ये मुकाबिल हो गई,  जिंदगानी और मुश्किल हो गई, aapse jab ye muqabil ho gaii, zindgaani or mushkil ho gaii, चुपके-चुपके रोना,कहना कुछ नहीं, एक नई ख़ूबी ये हासिल हो गई, chupke-chupke rona,kahna kuchh nahin, ek naii khoobii ye haasil ho gaii, किस तरह तय होंगी इतनी दूरियां, चलते-चलते रूह बिस्मिल हो गई,  kis tarah tay hongi itni duuriyan, chalte-chalte,ruuh bismil ho gaii, आपकी हो दीद,ये ख्वाहिश शदीद, जाने कब से मुझमें शामिल हो गई  aapki ho diid, ye khwahish shadiid, jaane kab se mujhmen shamil ho gaii, तंज़ करती इश्क़ की ताबीर पर,  देख लीजे दुनियां,जाहिल हो गई.... tanz karti ishq ki taabiir par, dekh liije,duniyan jaahil ho gaii #उर्मिलामाधव.. 23.11.2015

चाहता था

वो मुझे झूठा हँसाना चाहता था, मैंने समझा ग़म मिटाना चाहता था, Wo mujhe jhutha hansanaa chahta tha, Maine samjha gham mitana chahta tha, अश्क़ तो पोंछे न अपनी उँगलियों से हाँ मगर उंगली उठाना चाहता था, Ashq to pichhe n apni ungliyon se, Haan magar ungli uthana chahta tha, तंग दिल ख़ुद दे न पाया प्यार भी, मुझसे जो पूरा ज़माना चाहता था, Tang dil khud de n paya pyar bhi, Mujhse jo puraa zamana chahta tha, क्या लिखूं अल्फ़ाज़ मैं उसके तईं, कौनसी दुनियां दिखाना चाहता था, Kya likhun alfaz main uske taiin, Kaunsi duniyan dikhana chahta tha, गाहे-गाहे अपनी खुशियों के लिए, ज़िन्दगी में आना-जाना चाहता था.. Gaahe-gaahe apni khushiyon ke liye, Zindagi men aana-jana chahta tha.. उर्मिला माधव.. 22.11.2016

पढ़के देखिए

खुद आईने के आगे ज़रा पड़के देखिये, चेहरा किताब है तो ज़रा पढ़के देखिये, गैरों पे हंस रहे हैं मियाँ बे-वज्ह ही आप , ख़ुद की भी फितरतों से ज़रा लड़के देखिये, ख़ुरशीद के तले जो जले दूर हैं वो दश्त,   छत पर ही नंगे पाँव ज़रा चढ़के देखिये, होती है कारगर भी दुआ दिलसे कीजिये,  होगा यकीन जिद पे ज़रा अड़के देखिये, बनती है बिगड़ी बात भी कोशिश तो कीजिये , अपनी तरफ से खुद भी ज़रा बढ़के देखिये.. रख लीजिये तो दिलपे ज़रा हाथ साहिबान, बाबस्ता अपने किस्सा कोई गढ़के देखिये, कोई चला जो  साथ मैं मुश्किल मुकाम तक, ता-उम्र उसके प्यार को बढ़-चढ़के देखिये... उर्मिला माधव... २१.११.२०१३.

निर्मूल है

मृत्यु को हम क्रूर कहते......ये हमारी भूल है, येही जीवन चक्र है तब किस तरह प्रतिकूल है?? जन्म के ही साथ मृत्यु सर्वथा निश्चित यहाँ, सत्यता से बचके चलना हर तरह...निर्मूल है... उर्मिला माधव... 20.11.2014...

हो रहा है

न ये दर्द-ए-दिल ही ख़तम हो रहा है, के अब सब्र मेरा भी कम हो रहा है, के आँखें बरसने-बरसने को आयीं, ये दिल भी अजब है कि नम हो रहा है,   मुझे खुद पै हंसने को जी है बहुत ही, खुदा से भी बढ़के सनम हो रहा है, बहुत झुक गया है मेरा सर ज़मीं पर, कि घर मेरा दैर-ओ-हरम हो रहा है, मेरी सांस रुक-रुक के चलने लगी बस, लो अब एड़ियों में ही दम हो रहा है.... उर्मिला माधव... 21.11.2014....

दिलदार लिख दूँ

दिल तो शर्माता है फिर भी,तुम कहो तो प्यार लिख दूँ, और तुम्हारे दिल के आगे,अपने दिल की हार लिख दूँ ? प्यार के इन दायरों में बंध के रहना है तो मुश्किल, पर किसी दीवार के कोने में इक इज़हार लिख दूँ, दिल ये कहता है,............तुम्हीं मख़सूस हो मेरे लिए, सोचती हूँ दिल ही दिल में,तुमको मैं "दिलदार" लिख दूँ.... ज़िन्दगी तो हर क़दम ........दुश्वारियों का नाम है बस इन्हीं दुश्वारियों में,इश्क़ का किरदार लिख दूँ उर्मिला माधव.... 21.11.2016 बहुत खूब दीदी.... दिल है नादाँ, कश्मकश में ये उलझता जा रहा, हाथ में तुम हाथ दे दो, तो अभी इक़रार लिख दूँ! दिल की कश्मकश पर मुहब्बत की जीत बख़ूबी बयाँ कर दी दीदी.... बधाई....

बहुत दूर कहीं

बहुत दूर कहीं  एक कुत्ते के कराहने की आवाज़, बहुत वीराना सा लगता है, दहशत सी लगती है, सूखे पत्तों की आहट, जैसे कोई अँधेरे में चलता हो, ज़िन्दगियों का जायज़ा  लेने निकलता हो, वहशत होती है, जैसे कोई याद आता हो, मेरा साथ कहाँ है?, मेरा दूसरा हाथ कहाँ है, ये क्या है? अपनी भी ख़बर नहीं, पर मुझे कोई डर नहीं, जाती हूँ ऒर आती हूँ दूसरा हाथ ले के, कुत्ता तो ख़ामोश हो गया, लगा जैसे उम्र भर को सो गया, मुझे जाना होगा, कुत्ते को क्या हुआ  हे माँ,पर तुम भी तो नहीं, माँ, बरसों हुए गए हुए, लौटती क्यों नहीं माँ, याद तो आती है  माँ ही नहीं आती, कुत्ता भी वहीँ गया लगता है, मुझे भी जाना है, मैं थक गई हूँ उर्मिला माधव 23.11.2016

पाले हैं बहुत

ग़म ही ग़म तो अपने दिल में हमने पाले हैं बहोत, क्योंकि सब खुशियों के दर पे यूँ भी ताले हैं बहोत, क्यों रखें हम राबिता,दुनियां के झूठे रंग से, जिसने चाहा उसने हम में ख़म निकाले हैं बहोत उर्मिला माधव, 21.11.2016

वजूद

तुमने उसकी शक़्ल देखी, जिसपे लिख्खा था वजूद? कनखियों से देख कर भी, .........देखता कोई न था, दिल ही दिल में मुस्कुरा के, उसने ये सोचा के शायद, आलिमों की भीड़ में  .लिख्खा-पढ़ा कोई न था उर्मिला माधव

रही शामिल

आह में टीस भी रही शामिल, रात दिल का क़रार जाता रहा, चांदनी बार-बार आती रही, कोई रह-रह के जब बुलाता रहा, उर्मिला माधव.. 20.11.2017

धुआं

धुंआ,क्रेमेटोरियम से उठता हुआ, बहुत शोर आग की लपटों का, शादी,बगल के घर में, यानि ख़ाना आबादी, बहुत शादमा हर कोई बजते हुए ढोल ताशे, नाचते हुए लोग, सच क्या है,दोनों में से? क्या श्मशान ? तो ये शादी यानि ख़ुशी किस बात की ? एक तरफ़ डिस्कोथेक का हंगामा कहाँ जाना सही है? क्या करना सही है😟 ज़मीन,मकान, दुकान, हड़पने के लिए,धोख़े बाज़ी करने वाले लोग, क्रेमेटोरियम के मानी नहीं जानते क्या ? कभी नहीं जाना है इनको क्या? उफ़ ये धुंआ, कितनी घबराहट हो रही है, अपनी मौत के डर से नहीं, मर जाने वाले के घर वालों के लिए, कोई तो अकेला ज़रूर हुआ होगा , उसके बग़ैर, कितने मुक़ाबले करने होंगे? बाद उसके, किस-किससे करने होंगे? जद्दोज़हद, छोटी से छोटी चीज़ के लिए, रिश्तेदारों की शक्ल में, दुश्मनों से मुकाबला, मजबूरियां, हंस के बोलने की, हार,तस्वीर के लिए, मार,ज़िन्दाओं के लिए... फटकार,ज़िन्दाओं के लिए व्यभिचार,ज़िन्दाओं के साथ, अंतर्दृष्टि नहीं, दृष्टि नहीं, तो दृष्टिकोण कहाँ से हो , सब कुछ, क्रेमेटोरियम के धुएं में घुटता हुआ सा... उर्मिला माधव... 20.11.2015..

सराब लगे

मुस्कुराना भी जब अज़ाब लगे, ज़िन्दगी दम-ब-दम सराब लगे, चलना फिरना तो मेस्मरेज़म है जैसे ख़ाबों में कोई ख़ाब लगे, सुब्ह होती है इक करिश्मा सी, उसपे दुनियां अजब हबाब लगे, उर्मिला माधव, 20.11.2018

करते हैं हम

एक मतला दो शेर--- -------------------- बे-वज्ह इस जीस्त पर क्यूँ इस क़दर मरते हैं हम !! मरके जीने के इलावा........और क्या करते हैं हम ?? चश्म-ए-गिरियाँ,टूटते दिल,और फ़क़त,तन्हाइयां, दर्द पीने के इलावा..........और क्या करते हैं हम ?? चाक़ दामन,हाल खस्ता........और कुछ पैबंद बस , ज़ख्म सीने के इलावा.......और क्या करते हैं हम ?? उर्मिला माधव... १९.११.२०१३.

करते हैं हम

एक मतला दो शेर--- -------------------- बे-वज्ह इस ज़ीस्त पर क्यूँ हर क़रम करते हैं हम !! मरके जीने के इलावा........और क्या करते हैं हम ?? चश्म-ए-गिरियाँ,टूटते दिल,और फ़क़त,तन्हाइयां, दर्द पीने के इलावा..........और क्या करते हैं हम ?? चाक़ दामन,हाल खस्ता........और कुछ पैबंद बस , ज़ख्म सीने के इलावा.......और क्या करते हैं हम ?? उर्मिला माधव... 19.11.2014...

नज़्म

ये दिल ढूँढता है जगहा अजनबी सी, हवा अजनबी सी ,फ़ज़ा अजनबी सी, ---------------------------------------------- ye dil dhundhta hai jaghaa ajnabii sii, hawaa ajnabii sii fazaa ajnabii sii  :: :: कभी ज़िंदगी में ये दिन भी दिखाना, के हर सम्त इक अजनबी रंग लाना, ज़मीं अजनबी,आसमां अजनबी हो, कोई शख्स हो रु-ब-रु,अजनबी हो, ----------------------------------------------- kabhii zindagi main ye din bhi dikhaana, ke har samat ik ajnabii rang laanaa, zamiin ajnabii,aasmaan ajnabii ho, koi shakhs ho ru-b-ru, ajnabii ho, :: :: लगे जिसकी हर इक अदा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी..... -------------------------------------------------------- lage jiski har ik adaa ajnabii sii, hawa ajnabii sii fazaa ajnabii sii, #उर्मिलामाधव..... 19.11.2015...

नसीब है क्या

ज़ख़्म सींना मेरा नसीब है क्या ? तेरी दुनियां कोई सलीब है क्या? मेरी आवाज़ जब लरजती है पूछते हैं कोई अदीब है क्या? सांस क्यों ज़िन्दगी पे भारी है, ज़िन्दगी मौत के क़रीब है क्या? तूने तक़लीफ़ इतनी क्यों दी है, तू गए वक़्त का रक़ीब है क्या ? एक हवा तक इधर नहीं आती, ये बता रब भी अब ग़रीब है क्या ? उर्मिला माधव.. 19.11.2016

भइये नईं ऐं

कोई अपना, भैये नईं ऐं, अपने पास रुपइये नईं ऐं, कैसी दुनियादारी भइया, जो गाड़ी में पहिये नईं ऎं, धोका धड़ी से बढ़िया ये है, प्यार नहीं,तौ कहिये,नईं ऎं, अपनी भी तौ अना है आख़िर, तुमसे कुछ भी, चहिये नईं ऎं, उर्मिला माधव.. 19.11.2016

हलचल

मेरे होने से मच गई हलचल, जब मेरी आंख हो गई जलथल, ज़ेह्न बस लौटने को कहता था, एक ख़्वाहिश थी रुक गई उस पल, मैं अकेली ऑ भीड़ ज़्यादह थी, दिल में हर चंद हो गई खलबल, इम्तेहां सब्र का हुआ ज़ाहिर, राह ख़ुद चलके आ गई,बढ़चल, उर्मिला माधव.

करता भी क्या

एक तसल्ली के सिवा मजबूर दिल करता भी क्या? मर तो पहले ही चुका था,और फिर मरता भी क्या? ek tasallii ke sivaa ,majboor dil karta bhi kya, mar to pahle hi chuka tha or phir marta bhi kya, दर्द लेकर दर-ब-दर,फिरते रहे जब उम्र भर, आख़री लम्हों में आख़िर ज़ख्म ये भरता भी क्या? dard lekar dar-bdar,phirte rhe jab umr bhar, aakhrii lamhon men aakhir zakhm ye bharta bhi kya ? मौत सी दहशत-ओ-वहशत, सर पे मंडराती रहीं, दिल-ए-बिस्मिल,रोज़-ए-महशर, देख कर डरता भी क्या? maut sii dahshat-o-vahshat sar pe mandrati rahin, dil-e-bismil, roz-e-mahshar,dekh kar darta bhi kya, उर्मिला माधव... 17.11.2016

फ्री वर्स

ख़ूबी नहीं,ख़ामी है, पहचान आदमी की जन्म लेती हैं मुश्किलें, चेहरा पढ़ने से, मुश्किल है निबाह, भारी पड़ती हैं, समझदारियाँ, बड़ी ख़ूबी है, ना समझ हो जाना, कितना मुश्किल है समझदारी को जीना भोगने पड़ते हैं, कई ख़मियाजे, बेहतर है, खामोशी नीमरज़ा  उर्मिला माधव

बाबूजी

क्या कल का अख़बार पढ़े हो बाबूजी ? दुनियां का व्यभिचार पढ़े हो बाबूजी? सच बतलाना,क्या-क्या पढ़के आए हो, इक कमसिन की हार पढ़े हो बाबूजी ? दिन भर कोरी बातें करते फिरते हैं, कुल दुनियां बीमार पढ़े हो बाबूजी ? कितनी चीख़ें पढ़ पाए हो काग़ज़ पर, कितना हाहाकार पढ़े हो बाबूजी ? क्या उस पर भी ख़ून के छींटे लिख्खे थे? किस-किस को मक्कार पढ़े हो बाबूजी ? दुनियां से अपराध मिटा के रख देंगे, ये जुमला कै बार पढ़े हो बाबूजी ? प्यार पे दावेदारी अब भी रखते हो ? फिर सब कुछ बेकार पढ़े हो बाबूजी, उर्मिला माधव

सौदा करें

आइये मिलजुल के अब जज़्बात का सौदा करें, एक तरफ़ दुनियां रखें हम इक तरफ़ देखा करें... उर्मिला माधव 17.11.2018

दिल मिरा

ज़िंदगी भर तो दुखाया दिल मेरा, देख ले आकर दिले बिस्मिल मेरा, तंग दिल है तू,मुझे पर ग़म नहीं, मुझ को देखेगा महे क़ामिल मेरा, उर्मिला माधव.. 16.11.2016

ज़र्रा चाहिए

आसमां कहता है ? ज़र्रा चाहिए ? और दिल से पूछ क्या-क्या चाहिए ? मुझपे ज़ाहिर है तेरा जुगराफिया, आईना तुझको भी देखा चाहिए.., उर्मिला माधव, 16.11.2016

शिकवा न किया

कोई हीलः न किया,कुछ भी तमाशा न किया, मैंने बस इतना किया हश्र का जलवा न किया, तेरी बातों की अदा मुझको धमक देती रही, मैंने बस इतना किया गैर से चर्चा न किया... तूने दुश्मन की तरह पूरे इरादे रख्खे, मैंने बस इतन किया,यार को रुसवा न किया, मुझसे लोगों ने कहा यार बहुत अहमक हो, मैंने बस इतना किया,कोई भी शिकवा न किया... ग़ाम दर ग़ाम मुझे लोग ख़बर करते रहे, मैंने बस इतना किया कोई भी फतवा न किया. तेरी मिहनत तो अदावत को हवा देती थी,  मैंने बस इतना किया वक़्त भी ख़र्चा न किया... उर्मिला माधव... 15.11.2014...

कुर्सी वाले बाबूजी

चमत्कार को नमस्कार है,कुर्सी वाले बाबूजी राव रंग सब निर्विकार है,कुर्सी वाले बाबूजी रंजू वंजू रीता गीता रोज नाचतीं आँगन में मद्यपान है और बहार है,कुर्सी वाले बाबूजी राग भैरवी गाएंगे तो सुबह शाम से क्या लेना अपने हाथों सुर बहार है,कुर्सी वाले बाबूजी... सदियों से जो होता आया.इतिहासी सैलाबों में, वो ही किस्सा बार-बार है,कुर्सी वाले बाबूजी, प्रजातंत्र है,इसके मानी मालुम है ना तुमको भी ? किसको क्या-क्या इख़्तियार है,कुर्सी वाले बाबूजी  #उर्मिलामाधव... 15.11.2015...

होते हैं हम बहुत

जब दर्द से मुक़ाबिल होते हैं हम बहुत, सब लोग सोचते हैं,रोते हैं हम बहुत, अपना चलन हमेशा कुछ ख़ास ही रहा है, महफ़िल के बीच हंसकर,खोते हैं हम बहुत, साँसें जो मिल गई हैं,पूरी तो करनी होंगी यूँ ही बार ज़िन्दगी का ढोते हैं हम बहुत खुशियाँ गईं हमेशा ज़ख़्मों का रंग देकर, ऐसे ही दाग़ अक्सर धोते हैं हम बहुत, आंसू बहाये हमने तकिये में मुंह छुपाकर, समझा ये हर किसी ने सोते हैं हम बहुत.... उर्मिला माधव.... 14.11.2016

मुक़ाबिल आ गया

जिसको देखो वो मुक़ाबिल आ गया, मुश्किलों पर मेरा भी दिल आ गया, मैंने सोचा हाथ से जाने भी क्यों दूं , इतने नेज़ों बीच बिस्मिल आ गया, इस तखैय्युल में बुराई क्या है बोलो, आँख बस मूंदी के साहिल आ गया,  उर्मिला माधव... 13.11.2014...

ख़ुद परस्ती

ये ज़माना और इसकी ख़ुद परस्ती, मुख़्तसर,इनसान की औक़ात सस्ती,  हो अगर ख्वाहिश कहीं बाक़ी बक़ाया  बन तमाशाई जला के दिल की बस्ती, भूलजा सब हम पियाला हम निवाला, याद रख जिंदा दिली और फ़ाक़ा मस्ती,  उर्मिला माधव... 13.11.2015..

खींचीं ख़ुश्कियाँ

मीर,ग़ालिब,दाग़,मोमिन,चार बैठे थे जहाँ, क्या बताएं,हम हक़ीरों ने भी कीं गुस्ताखियाँ, भूल से इक लफ्ज़ भी पाई न उनसे दाद कुछ, बस करम इतना रहा के,सबकी खींचीं खुश्कियां.. #उर्मिलामाधव... 13.11.2015

छोड़ दूं क्या ?

Guftgu ka silsila hii tod dun kya ? Har kisise raabita hi chhod dun kya? Ye hawayen raas to aati nahin, Apne hathon rukh hawa ka mod dun kya? Urmila Madhav... 13.11.12

कतरा रहा है

हर इशारा उस जहां से आ रहा है, आदमी जिस सम्त से कतरा रहा है, खोल सांसों पर चढ़ाना ग़ैर मुमकिन, है वही जो अब तलक होता रहा है, पर लकीरों के फ़क़ीरों की ये दुनियां, तोड़ने वाला बहुत हंसता रहा है, हिचकियाँ हम उसकी सुनके आ रहे हैं, जिसकी जानिब से ,सितम सस्ता रहा है, एक आकिल और ज़माना ख़ास अहमक, उस की उंगली पे ही नाचे जा रहा है.. उर्मिला माधव, 13.11.2017

हंसते हुए लोग

ऑपरेशन थियेटर की तैयारियां, ज्यूलरी उतारते हुए लोग, न चाहते हुए भी हंसते हुए लोग, घबराए से फिरते हुए लोग, अफ़रा तफ़री, गहमा गहमी, भाग जाना चाहता है तन को लेके मन, जिस्म का छलनी हुआ जाना तो तय है आज कुछ  इंजेक्शनों से... उर्मिला माधव  13.11.2017

अंजुमन सजाके

कोई अंजुमन सजाके ज़रा अपना दिल लगालूं?? तुम भी सलाह देना किस-किस को मैं बुलालूं?? लबरेज़ है मुसलसल पुरनम हुआ कलेजा, शबनम से भीगे मोती पलकों पे मैं सजा लूं?? सुनसान सा उफ़क़ है बिलकुल सियाह रातें, ग़र तुम बुरा न मानो चन्दा को मुंह लगालूँ ?? कुछ दाग़ मेरे दिलके कुछ दिलजली वो बातें ज़ख्मों से बहते खूँ से दरिया सा एक बनालूँ?? कासिद भी लौट आया दर पर तुम्हारे जाकर घर की दिवार पर ही क्या अपना सर टिका लूँ?? उर्मिला माधव...  11.11.2014...

सामने का पार्क

सामने का पार्क अब ,सुनसान है, घर के बायीं सम्त इक शमशान है, वक़्त की मजलिस लगी है देखलो, इससे बचना ही नहीं आसान है, फ़िक़्र से खारिज़ नज़र,इंसान की, दम-ब-दम मस्ती में है,अनजान है, ख़्वाब के गोशे में जाकर सो लिया, सुब्ह जब देखी,  ...महज़ हैरान है, रोज़े महशर मुन्तज़र है ज़ीस्त का, हर घडी सांसत में सबकी जान है, क्या करीने से सजाये बाम-ओ-दर, दौड़ता फिरता है और हलकान है, वक़्त की ताईद हैं शम्स-ओ-क़मर, एक फ़क़त इंसान, बे-ईमान है..... उर्मिला माधव.. 20.11.2015...

इन्केसारी चाहिए

दिल की ख़ातिर क्या किसीको,गमगुसारी चाहिए, शर्त ये है,बस जुनूं की इन्केसारी चाहिए, कुछ हमारी चाहिए और कुछ तुम्हारी चाहिए

आते हो

बस यूँ ही..... खुद ही तो सताते हो, फिर रूठ भी जाते हो, पर्दा भी नहीं करते, न ही सामने आते हो, उस्लूब भी उल्फ़त का, खुद ही न निभाते हो, ज़ाहिर ही नहीं करते ,  हर बात छुपाते हो,  जैसे भी मसाइल हैं, लोगों को बताते हो, तनहाई भी मिलती है, चौपाल में आते हो .... उर्मिला माधव... 10.11.2014....

डर जाते हैं

उनसे मिलते हैंं तो ग़म और बिखर जाते हैं, अब तो ये है के ख़यालों से भी डर जाते हैं, कैसे हाथों की लकीरों को लिखा क़ुदरत ने, इस पे ग़र सोच भी लेते हैं तो मर जाते हैं, उर्मिला माधव

सवाली है

आज ये दिल बहुत सवाली है, किसलिए रात इतनी काली है, उन चरागों में रौशनी ही नहीं, जिनकी रंगत महज़ दीवाली है, ज़िन्दगी इस तरह बनाली है

जानते हैं

मुश्किलों से दिल लगाना जानते है, लब हमारे.....मुसकुराना जानते हैं, ज़िंदगी ज़िन्दादिली का नाम है पर, बेख़ुदी क्या है.....बताना जानते हैं, राह चलने का हुनर मालूम है अब, आग से दामन बचाना....जानते हैं, उर्मिला माधव... 10.11.2016

सकते हैं

कितनी मुश्किल में डाल सकते हैं, कितना दिल को संभाल सकते हैं, वक़्त हम कितना टाल सकते हैं कितनी दुनियां खंगाल सकते हैं अपनी औक़ात भी समझनी है, ज़ख़्म हम कितने पाल सकते हैं उर्मिला माधव

सजनमा लगो हो

नोट---- किसी व्यक्ति विशेष स्थान जाति,धर्म से कोई ताल्लुक़ नहीं... ************************************************ मियाँ तुम कभू तो मुसलमां लगो हो, कभू हमको बिलकुल सजनमा लगो हो, हमारी सहेली बताती थी हमको, के रिश्ते में उसके कजनमा लगो हो, के हो जुम्मा-जुम्मा फ़क़त आठ दिन के, अगर सच कहें तो अजनमा लगो हो, है सूरज की किरणों सा चेहरा तुम्हारा, हे सचमुच बताबें ,बिहनमा लगो हो, कभू छोटे बुतरू,कभू चाचा कज्जन, कभू हमरे सैयां से मन मा लगो हो... उर्मिला माधव... 10.11.2016

आकलन

दुखों के आकलन होते नहीं, कौन गिन पाया है, गिरते आंसुओं को? दर्द को किसने हथेली पर रखा है? कौन सोचे क्या है क़ीमत आंसुओं की, आँख की किस्मत  कहाँ लिख्खी है बोलो इस तरह सदियां गुज़ारीं, रोकती हूँ, पोंछती हूँ, रोज़ अपने आंसुओं को, लाल होकर छिल गए हैं गाल मेरे, किन्तु क्या अनुमान है पीड़ा का मुझको ? शून्य में ताका है, पहरों बैठ कर, और स्वयं को दे रही हूँ अब दिलासा, भित्तियों के साथ लग कर बैठ जाऊं, या कि फिर आँगन तेरे चक्कर लगाऊं, खिड़कियों पर हाथ है, सिसकियों का साथ है, रात गहराने लगी, नींद कब देती है बोलो साथ मेरा? ऐसा लगता है कि अंतिम  एक झपकी आएगी, मैं स्वयम में और स्वयम मुझमें रहेगा फिर कहानी को कोई बच्चा कहेगा.... उर्मिला माधव.. 10.11.2017

नहीं बाक़ी

न ये बाक़ी, न वो बाक़ी, कोई जल्वा नहीं बाक़ी, वो हमको याद आते हैं के जो ज़िंदा नहीं बाक़ी, ज़मीं पे पांव रखने का, किसीको होश तब आया, के जब दुन्या-ए-फ़ानी में कोई रुतबा नहीं बाक़ी, ख़ुदी महफूज़ रखने को सिपहसालार क्या रखना, उठा ले हाथ दुनियां से तो कुछ किस्सा नहीं बाक़ी, ग़रज़ क्या आख़री हिचकी पे वो रोया, नहीं रोया, किसी की बेरुख़ी से जब कोई शिकवा नहीं बाक़ी.. उर्मिला माधव, 8.11.2018

आलम में

यारो मुआफ़ करना हंगामा-ए-सितम में कुछ मुंह से निकल जाए ग़र दर्द के आलम में, अपना सफ़र अभी तक,तय तो नहीं हुआ है, डर-डर के जी रहे हैं हम हार के भरम में, कमज़ोर पड़ रही है,रिश्तों की पायदारी, दुश्मन कहीं छुपा है कोई तुम में और हम में, दस्तार बच रही है,रब की है मेहरबानी, हलकान क्यों रहें हम वीरानियों के ग़म में, ये ज़िन्दगी किसीकी कब मिलकियत हुई है, रख्खा नहीं है कुछ भी इन वादा-ऑ-कसम में, एक शब् की ज़िन्दगी है,खुद को बचाये रखना, हरगिज़ नहीं उलझना,ज़ुल्फ़ों के पेच-ऒ-ख़म में उर्मिला माधव.... 7.11.2016

ख़ातून दिल्ली की

दिल्ली की औरत------ एक नज़्म हालत-ए-हाज़िरा पर... लो मेरी दास्तां सुन लो मैं हूँ ख़ातून दिल्ली की, हिली जाती है अब बुनियाद,अफ़लातून दिल्ली की, नहीं महफूज़ अस्मत है,के दिल में ख़ास दहशत है, क़दम बाहर निकालूँ जो तो बस अंजाम वहशत है, समझ में कुछ नहीं आता के किस दर्ज़ा जिया जाए, सम्हाले ग़म कोई कितने,ज़ह्र कितना पिया जाये, ये दिल्ली आज तक लाशों के अंबारों पे रख्खी है, अभी तक आबरू औरत की मीनारों पे रख्खी है, न जाने क्या दिया अजदाद ने,दिल्ली को विरसे में, मेरा दिल चाहता है काश इसको समझूँ फिर से मैं, जहाँ औरत की अव्वल ज़ात को सस्ता समझते हैं, करे दिलजोई मर्दों की,यही रस्ता समझते हैं, मगर मुझमें भी है सीता,कोई रज़िया कोई राधा, बिना मेरी मुहब्बत के वजूद-ए-मर्द है आधा, मैं शीरीं हूँ,मैं लैला हूँ,में दुर्गा हूँ,मैं अम्बा हूँ, अगर सच जानना चाहो तो मैं चिड़ियों का चम्बा हूँ, मगर जब याद आता है के मैं ग़ैरत हूँ दिल्ली की, बहुत ख़तरे में रहती हूँ,के मैं औरत हूँ दिल्ली की, के मैं औरत हूँ दिल्ली की।।। के मैं औरत हूँ दिल्ली की।।। उर्मिला माधव...

चलन देखते हैं

अजब ज़िन्दगी का चलन देखते हैं, न दिल मैं किसीके अमन देखते हैं,  करी फिक्र गैरों की ता उम्र जिसने वो. मुश्किल से ग़ोर-ओ-कफन देखते है, जिन्होंने खड़ी कीं,वफ़ा की मिसालें, वो उल्फत का उजड़ा चमन देखते हैं, जिन्हें हो फ़क़त दुश्मनी से ही निस्बत , वो इनसान का कब......ज़ेहन देखते हैं? जहां लोग इल्म-ओ-अदब से चले हों, वहां ज़िन्दगी तक......रहन देखते हैं... उर्मिला माधव... ६.११.२०१३...

निज़ामत नहीं है

अभी तक तेरे सर पे शामत नहीं है, ये क्या ज़िन्दगी की निज़ामत नहीं है?? मुहब्बत किसीसे अगर हो ही जाए , वो बस हादसा है नियामत नहीं है , जो दिल आगया ग़र तुम्हारा किसीपे , तो फिर एक दिन भी सलामत नहीं है , अभी तक तो एक घर भी ऐसा न देखा , जहां दिल पे लानत मलामत नहीं है , फकीरी की चादर अगर मुंह पे ढक ली , तो कुछ भी ,गुज़रना क़यामत नहीं है.. '''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''' abhi tak tere sir pe shaamat nahii hai, ye kya zindagi kii nizaamat nahin hai?? muhabbat kisise agar ho hii jaaye, wo bas haadsaa hai niyaamat nahin hai, jo dil aagayaa gar tumhaara kisiipe, to phir ek din bhi salaamat nahin hai, abhi tak to ek ghar bhi aisaa na dekhaa, jahaan dil pe laanat,malaamat nahin hai, faqirii ki chaadar agar munh pe dhak lii, to ku...

आएगा क्या

कोई इस्तकबाल भी कर पायेगा क्या ? बढ़के दरवाज़े पै कोई आएगा क्या ? साथ लफ़्ज़ों के हुए हाज़िर यहाँ पर, कोई मेरे संग कुछ-कुछ गायेगा क्या ? है तख़इयुल चाँद का पर हूँ ज़मीं पै,  ख़्वाब के संग और कोई जाएगा क्या ? आईने के नाम पर पत्थर दिखा दे, इस तरह का ज़ुल्म कोई ढाएगा क्या? लोग इक दरवीश को जब दें सलामी, तब कोई हिस्सा तुम्हारा खायेगा क्या?  #उर्मिलामाधव.... 6.11.2915 इस्तकबाल---- स्वागत तखैयुल------- कल्पना दरवीश--------- फ़क़ीर,साधु....

उठता है

एक तरफ़ कुछ धुंआं सा उठता है, इसमें कोइ,ग़म निहां सा लगता है, चार सू .....अजनबी सा आलम है, क्यूँ ये ..वक़्त-ए-गराँ सा लगता है, अब तो बस एक सम्त ख़ाली है, वो के जो ....आसमान वाली है,

क्यों नहीं रहती

मुझको परवाह क्यों नहीं रहती ? लब पे कोई आह क्यों नहीं रहती? कोई इज़हार-ए-इश्क़ करता रहे, दिल में कोई राह क्यों नहीं रहती ? भाते रहते हैं कितने चेहरे मगर, कोई भी चाह क्यों नहीं रहती? अपनी मर्ज़ी से ख़्वाब बुनती हूँ, हस्ब-ए-इस्लाह क्यों नहीं रहती? हुस्न-ए-मंज़र से भी मुतास्सिर हूँ, ज़ेहन में वाह क्यों नहीं रहती ? दीन-ओ-दुनियां की,फ़िक़्र है सब को, मुझको लिल्लाह क्यों नहीं रहती? उर्मिला माधव, 6.11.2016

अच्छा नहीं था

फालतू बातों में कुछ रख्खा नहीं था, आप जो कहते थे वो अच्छा नहीं था, इक वफ़ा ही आपकी फितरत नहीं थी, सब समझता था ये दिल बच्चा नहीं था,............... उर्मिला माधव.... 5.11.2014

मुस्कुराना चाहिए

फिल बदीह में कही गई ग़ज़ल--- :: ज़िन्दगी ग़र ख़ूब है तो आज़माना चाहिए, जो भी कुछ मिल जाए उसपे,मुस्कुराना चाहिए, :: hai niyamat zidagi to aazmaanaa chahiye, jo bhi kuchh mil jaaye uspe,muskurana chahiye... :: बेखुदी में मुब्तिला होकर नहीं रहना यहाँ, हंसके रोना,रोके हँसना,कुछ तो आना चाहिए, :: bekhudi main mubtila hokar nahin rahna yahan, hanske rona,roke hansna,kuchh to aanaa chahiye, :: खुशनसीबी से अगर इक दोस्त भी मिल जाए तो, दोनों हाथों से उसे ........बढ़कर निभाना चाहिए, :: khush nasiibi se agar ik dost bhi mil jaaye to, donon hathon se use badh kar nibhaana chahiye, :: कौन जाना है इसे ये ज़िन्दगी क्या खेल है, ये समझने के लिए तो एक ज़माना चाहिए, :: kaun samjha hai ise ye zindagi kya khel hai, ye samajhne ke liye to ek zamaana chahiye, :: जाने कितने मिट गए मुफलिस,तवंगर,दह्र में, हर किसीको अपने हक का आब-ओ-दाना चाहिए. :: jaane kitne mit gaye,muflis,tavangar dahr main, har kisiko,apne haq ka,aab-o-daanaa chahiye, उर्मिला माधव--

दोस्तो

आग में आग भड़का रहा दोस्तो काम पानी का फिर क्या रहा दोस्तो?? आग,रूहानी हो,आग जिस्मानी हो, ज़िंदगी ही जली बारहा दोस्तो, उर्मिला माधव... 3.11.2014...

ताज़गी का

इबादत का,वफ़ा का दोस्ती का, कोई झोंका तो आये ताज़गी का, कहाँ जाऊं किसे देखूं,दह्र में, कोई नक्शा नहीं है सादगी का, नहीं मुमकिन है इंसां रु-ब-रु हो,  यहाँ इक इम्तिहां बस बानगी का,  चमक चेहरों की झूठी है यक़ीनन    क़दम मकबूल ज़ाहिर तीरगी का,  रहे जिंदा दिली यारब सलामत, नहीं देखे ये दिल रस्ता किसीका.... उर्मिला माधव... 3.11.2014...

साथ और राहें

तुम्हारा साथ और ये राहें, मैं अकेली हो गई थी, तुम्हारी सहेली हो गई थी, ये रास्ते के दरख़्त ये चाँद सितारे ये सभी हैं मेरे सहारे इन्हें कोई कितना भी पुकारे ये हमेशा ही एक जैसे हैं सब के हैं किसी एक के नहीं दुनियां के हर इक सच को बताना ज़रूरी नहीं होता समझती थी मैं सभी कुछ बिना बताये मेरे दिल-ओ-दिमाग़ पर धुंध कभी नहीं छाई बिना तुम्हारे कहे भी हर बात समझ में आई जाने कब से अहसास था तुम्हारे खोने का मैंने चलन ही नहीं सीखा कभी भी रोने का दामन भिगोने का तेज़ आँधियाँ चलना सिखाती हैं संभलना सिखाती हैं #उर्मिलामाधव 3.11.2015

सजाते हैं

Aaj almaariyan sajaate hain, Kal achanak hi ujad jaate hain, :: आज ......अलमारियां सजाते हैं, कल अचानक ही उजड़ जाते हैं  Kuchh padosi nayi muhabbat se, Jyon hi milte hain,bichhad jaate hain, :: कुछ पडोसी नई मुहब्बत से, ज्यों ही मिलते हैं बिछड़ जाते हैं, Zindagani ajab si mushkil hai, Dere lagte hain ukhad jaate hain, :: दर्द इंसां की इक कसौटी है, लफ्ज़ लिखते हैं बिगड़ जाते हैं  Dard insaan ki ek kasauti hai, Lafz likhte hain bigad jaate hain Urmila Madhav.... 3.11.2015

मग़रूर हैं

क्या हुआ जो आप कुछ मशहूर हैं, क्यूँ ज़रा सी बात पर....मगरूर हैं, इस क़दर उड़ना उफ़क़ पर आपका, बस..........बुलंदी के नशे में चूर हैं जीतेजी हरगिज़ न हों जन्नत नशीं, आसमां वाले.........ज़मीं से दूर हैं, उर्मिला माधव... 3.11.2014...

मग़रूर हैं

क्या हुआ जो आप कुछ मशहूर हैं, क्यूँ ज़रा सी बात पर....मगरूर हैं, इस क़दर उड़ना उफ़क़ पर आपका, बस..........बुलंदी के नशे में चूर हैं जीतेजी हरगिज़ न हों जन्नत नशीं, आसमां वाले.........ज़मीं से दूर हैं, उर्मिला माधव... 3.11.2014...

जानते हो

कौन सा ये दर्द है ....पहचानते हो ? क्या छुपा है इस हंसी में जानते हो ? उर्मिला माधव

लौट जाएंगे

आप इतना जो दिल दुखायेंगे  हम भला किस लिए निभायेंगे, राह उलटी तरफ भी चलती है, उलटे पैरों ही लौट जायेंगे, उर्मिला माधव..

जब्र से

आंधी से हाल-ए-वक़्त से,तूफां के जब्र से, बाहर निकल के आ गई मैं अपनी क़ब्र से, ज़िंदा जला रहे थे सभी मेरे दिल की लाश, और भीड़ में खड़ी थी कहीं मैं भी सब्र से, उर्मिला माधव.... 3.11.2016

दुखाएँगे

एक मतला एक शेर---- आप इतना जो दिल दुखायेंगे  हम भला किस लिए निभायेंगे, राह उलटी तरफ भी चलती है, उलटे पैरों ही लौट आयेंगे, #उर्मिलामाधव.. 2.11.2015

और हम

ये हमारी ज़िन्दगानी और हम, उम्र भर ही नातवानी और हम, हम अकेले और इतने !! हादिसे, रोज़ इक बनती कहानी और हम, वक़्त लाया बाम पर हम आगये, उफ़ हमारी बे-ज़बानी और हम, बे-अदब जुमले निशाने साध कर, शोहदों की लनतरानी....और हम,   ये अजब से हादसे हर ग़ाम पर, आँख जैसे पानी-पानी और हम, उर्मिला माधव... 2.11 .2016

लज्जित हूं

लज्जित हूँ मैं , मैं लज्जित हूँ, तुम्हारे दर्प से, खिल्ली उड़ाती हुई, भंगिमाओं से, भावनाओं पर, ठेस पहुंचाते हुए  हठ से, मैं लज्जित हूँ, तुमको समझते हुए भी, ना समझ कर, मैं लज्जित हूँ, आह भरती हुई,वाह पर, मैं लज्जित हूँ, तुम्हें,भीड़ के साथ , खड़ा देख कर, हां मैं लज्जित हूँ, तुम्हारी उन कुंठाओं से, नहीं दिखाई देतीं, जो तुम्हें स्वयम को , मैं पीड़ित हूँ, पथिक---- तुम्हारे भटकाव से, छलनाओं से दिग्भ्रमित, पथिक, मार्ग की बाधाएं,विषम हैं, सीखना होगा, स्वयम के पैरों से चलना, ज़िंदाबाद के नारे, देते हैं बढ़ावा भटकाव को, मैं लज्जित हूँ, तुम्हारे अंधकार की भटकन से, बहुत लज्जित हूँ, तुम्हारे ओढ़े हुए, दर्प से, हां मैं लज्जित हूँ, तुम्हारे,अहंकार से ..… लज्जित हूँ मैं.... उर्मिला माधव, 2.11.2017

चल पाओगे

तुम हमारी मुश्किलों के साथ कब चल पाओगे, साफ़ कहते हैं के आधी राह पर रुक जाओगे, कौन आख़िर चाहता है,उम्र भर जलता रहे, गर तड़पते देख लोगे,तुम बहुत घबराओगे, ज़ख़्म मत छेड़ो गुज़ारिश कर रहे हैं ऐ मियां, ज़िद अगर कर जाओगे तो बाद में पछताओगे, इक ज़माना हो गया,हम इश्क़ लिखते ही नहीं, हम अगर लिख्खेंगे तुम ही दस तरह बल खाओगे हम भी तो हर चंद ख़ुद को रोकते रहते हैं बस, फिर भी ना माने तो ठंडी आग में जल जाओगे, उर्मिला माधव, 2.11.2017

अंगिका में एक कोशिश

अंगिका में एक कोशिश 😊 तहिया कत्ते पिरितिया में कानत रहय बतिया एको न केहू कै मानत रहय, कुच्छो होबय न वाला छय पछताला से, की नतीजा छय ऊ की न जानत रहय ? जहिया कहलौं न सुन लय ऊ एकऊ घड़ी, अब करेजा कै कतबो हू खानत रहय, उर्मिला माधव, 2.11.2017