हरी हो गई

ज़ख्म की बेल फिर से हरी होगई,
जिन्दगी दर्द से....अधमरी होगई,

इतना ज़्यादा जलाया गया है मुझे, 
कि मैं कुंदन सी तपके खरी होगई,

मेरी शफ्फाक़ रूह और उजला बदन,
कैसी पत्थर हुयी......मरमरी होगई,

न जुदाई का गम,न मिलन की ख़ुशी
इन बलाओं से बिलकुल..बरी होगई,

ये मुकाबिल खड़ी है,हर इक तंज पे,
खूब फितरत मेरी.....छरहरी होगई,
उर्मिला माधव..
१.१२.२०१३...

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