हो रहा है

न ये दर्द-ए-दिल ही ख़तम हो रहा है,
के अब सब्र मेरा भी कम हो रहा है,

के आँखें बरसने-बरसने को आयीं,
ये दिल भी अजब है कि नम हो रहा है,
 
मुझे खुद पै हंसने को जी है बहुत ही,
खुदा से भी बढ़के सनम हो रहा है,

बहुत झुक गया है मेरा सर ज़मीं पर,
कि घर मेरा दैर-ओ-हरम हो रहा है,

मेरी सांस रुक-रुक के चलने लगी बस,
लो अब एड़ियों में ही दम हो रहा है....
उर्मिला माधव...
21.11.2014....

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