सामने का पार्क

सामने का पार्क अब ,सुनसान है,
घर के बायीं सम्त इक शमशान है,

वक़्त की मजलिस लगी है देखलो,
इससे बचना ही नहीं आसान है,

फ़िक़्र से खारिज़ नज़र,इंसान की,
दम-ब-दम मस्ती में है,अनजान है,

ख़्वाब के गोशे में जाकर सो लिया,
सुब्ह जब देखी,  ...महज़ हैरान है,

रोज़े महशर मुन्तज़र है ज़ीस्त का,
हर घडी सांसत में सबकी जान है,

क्या करीने से सजाये बाम-ओ-दर,
दौड़ता फिरता है और हलकान है,

वक़्त की ताईद हैं शम्स-ओ-क़मर,
एक फ़क़त इंसान, बे-ईमान है.....
उर्मिला माधव..
20.11.2015...

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