आलम में

यारो मुआफ़ करना हंगामा-ए-सितम में
कुछ मुंह से निकल जाए ग़र दर्द के आलम में,

अपना सफ़र अभी तक,तय तो नहीं हुआ है,
डर-डर के जी रहे हैं हम हार के भरम में,

कमज़ोर पड़ रही है,रिश्तों की पायदारी,
दुश्मन कहीं छुपा है कोई तुम में और हम में,

दस्तार बच रही है,रब की है मेहरबानी,
हलकान क्यों रहें हम वीरानियों के ग़म में,

ये ज़िन्दगी किसीकी कब मिलकियत हुई है,
रख्खा नहीं है कुछ भी इन वादा-ऑ-कसम में,

एक शब् की ज़िन्दगी है,खुद को बचाये रखना,
हरगिज़ नहीं उलझना,ज़ुल्फ़ों के पेच-ऒ-ख़म में
उर्मिला माधव....
7.11.2016

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