कतरा रहा है
हर इशारा उस जहां से आ रहा है,
आदमी जिस सम्त से कतरा रहा है,
खोल सांसों पर चढ़ाना ग़ैर मुमकिन,
है वही जो अब तलक होता रहा है,
पर लकीरों के फ़क़ीरों की ये दुनियां,
तोड़ने वाला बहुत हंसता रहा है,
हिचकियाँ हम उसकी सुनके आ रहे हैं,
जिसकी जानिब से ,सितम सस्ता रहा है,
एक आकिल और ज़माना ख़ास अहमक,
उस की उंगली पे ही नाचे जा रहा है..
उर्मिला माधव,
13.11.2017
Comments
Post a Comment