होते हैं हम बहुत

जब दर्द से मुक़ाबिल होते हैं हम बहुत,
सब लोग सोचते हैं,रोते हैं हम बहुत,

अपना चलन हमेशा कुछ ख़ास ही रहा है,
महफ़िल के बीच हंसकर,खोते हैं हम बहुत,

साँसें जो मिल गई हैं,पूरी तो करनी होंगी
यूँ ही बार ज़िन्दगी का ढोते हैं हम बहुत

खुशियाँ गईं हमेशा ज़ख़्मों का रंग देकर,
ऐसे ही दाग़ अक्सर धोते हैं हम बहुत,

आंसू बहाये हमने तकिये में मुंह छुपाकर,
समझा ये हर किसी ने सोते हैं हम बहुत....
उर्मिला माधव....
14.11.2016

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