सहेले

दुनियाँ के सारे मेले,
लगते हैं बस झमेले,

सबको धता बताकर,
चलते हैं अब अकेले,

तर्जीह उसको क्या दें,
जो ज़िन्दगी से खेले,

गाहे-ब-गाहे आकर,
तकलीफ में धकेले,

सुख चैन तक हमारा,
गमख्वार बनके लेले,

फिर झूठी गुफ्तगू में,
लगते हैं कितने धेले??

हमसे न निभ सकेंगे,
ता-उम्र ये......सहेले,
उर्मिला माधव..
30.11.2013..

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