कही थी
बात तो बिलकुल शराफ़त से कही थी,
क्या ख़बर के क्या कमी उसमें रही थी,
बाज़ आख़िर आ न पाया.....दोस्त मेरा,
क्या ग़ज़ब है.....क्यूँ हवा झूठी बही थी,
आग पत्थर में......कभी लगती नहीं है,
कैसे बदलेगी..जो फितरत ही वही थी,
ख़ामख्वाह..गफलत में आया है बेचारा,
सोचना उसको भी था..कितनी सही थी,
जो हकीक़त थी वो तुझ तक जा न पाई
तू समझ ले बस तेरी क़िस्मत यही थी
उर्मिला माधव...
30.11.2014...
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