ताज़गी का
इबादत का,वफ़ा का दोस्ती का,
कोई झोंका तो आये ताज़गी का,
कहाँ जाऊं किसे देखूं,दह्र में,
कोई नक्शा नहीं है सादगी का,
नहीं मुमकिन है इंसां रु-ब-रु हो,
यहाँ इक इम्तिहां बस बानगी का,
चमक चेहरों की झूठी है यक़ीनन
क़दम मकबूल ज़ाहिर तीरगी का,
रहे जिंदा दिली यारब सलामत,
नहीं देखे ये दिल रस्ता किसीका....
उर्मिला माधव...
3.11.2014...
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