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Showing posts from January, 2020

जलवे

महसूस हो रहे थे,कुछ आहटों के जलवे, आगाह कर रहे थे,टकराहटों के जलवे,

उसीके हो गए

जब किया रब ने इशारा सो गये, उठ गए तो फिर उसी के हो गए, उसकी रहमत और हमारी ज़िंदगी, मुब्तिला इतने हुए बस खो गए उसकी जानिब से हुआ रौशन चराग़, जो जहां थे सर ब सजदा हो गए... उर्मिला माधव

बे ख़बर को दे ख़बर

मैं हकीक़त ज़िन्दगी की जानना चाहूं अगर, या ख़बीरू अख्नबिर नी बे-खबर को दे खबर, ढूंढती फिरती हूँ रस्ता जा-ब-जा औ दर-ब-दर, या ख़बीरू अख्नबिर नी बे-खबर को दे खबर, बदगुमानी,बद मिजाज़ी क्यूँ हुई है पुर असर, या ख़बीरू अख्नबिर नी बे -खबर को दे खबर, क्यूँ तमाशा है यहाँ जब जिंदगी है मुख़्तसर, या ख़बीरू अख्नबिर  नी बे -खबर को दे खबर, बादशाहत के लिए क्यूँ मर रहा इतना बशर, या ख़बीरू अख्नबिर नी बे -खबर को दे खबर.... उर्मिला माधव... 31.1.2014.. या ख़बीरू अख्नबिर नी...   ऐ खबर रखने वाले,मुझे खबर से आगाह फरमा ...

मुसलमान तो हो

Tujhko iimaan ki qasam,saahib-e-iimaan to ho, Or kuchh ho ke na ho,haq se musalman to ho :: तुझको ईमां की क़सम,साहिब-ए-ईमान तो हो, और कुछ हो के न हो,हक़ से मुसलमान तो हो, :: Mera daawaa hai asar baat se hota hai zuruur, Or kuchh ho ke na ho,dil se suleman to ho :: मेरा दावा है असर बात से होता है ज़ुरूर और कुछ हो के न हो,दिल से सुलेमान तो हो :: Daayre khul ke bikhar jaate hain,chalne ke liye, Or kuchh ho ke na ho,jazba-e-toofan to ho, :: दायरे खुल के बिखर जाते हैं चलने के लिए और कुछ हो के न हो,जज़्बए-तूफ़ान तो हो, :: Tere kirdar se gar,koii gunah ban jaaye, Or kuchh ho ke na ho,jhuk ke pashemaan to ho, :: तेरे किरदार से गर, कोई गुनह बन जाए, और कुछ हो के न हो,झुक के पशेमान तो हो, उर्मिला माधव,

क़ुर्बान हो गए

तिरछी नज़र की धार पे क़ुर्बान हो गए, यूँ दिल की खुदकुशी पे पशेमान हो गए, अपने मिजाज़ में तो कभी आशिक़ी न थी, पर ऐसा कुछ हुआ के परेशान हो गए, अंदाज़ अपनी रूह के बस ज्यों के त्यों रहे हम ही जूनून-ए-इश्क़ का सामान हो गए, वो याद हमको आये तो मुश्किल गुज़र गई  हम ख़ुद भी अपने आप से बईमान हो गए फिर यूँ हुआ के रूह से हमने लड़ाई की, एक रोज़ उनके घर गए,मेहमान हो गए.. दुनियां को दरकिनार भी हमने किया बहुत ज़िंदान-ए-इश्क़ क्या हुए सुल्तान हो गए

बड़े हैं तो

आप ओहदे में कुछ बड़े हैं तो ? ख़ास मंज़िल पे ही खड़े हैं तो? गोया तकदीर के सिकंदर हों, पर भी सुरख़ाब के जड़े हैं तो ? हम न माने हैं,और न मानेंगे, अब अगर जिद पै ही अड़े हैं तो ? इसमें औक़ात किसकी जाती है, दर-ए-सुल्तान पर, पड़े हैं तो, उर्मिला माधव 28.1.2015....

गए हो तुम

मेरे जी से उतर गए हो तुम, ज़िन्दगी ग़म से भर गए हो तुम वो जो जुरअत न  कर सका कोई वो ही जुरअत तो कर गए हो तुम, ख़ामियों से तुम्हारी वाकिफ़ हूँ, मैंने समझा के डर गए हो तुम, मेरी ख़ामोशियां ही बेहतर हैं, सच तो ये है के मर गए हो तुम, उर्मिला माधव

हो जाएगा

चल,रही बाज़ी,यहीं पर फ़ैसला हो जायेगा, जो जुदा हो जाएगा वो बेवफ़ा कहलायेगा, उर्मिला माधव 27.1.20155

छोड़ दे

फिल्बदीह के तह्त कही गई ग़ज़ल---- तीर अब दिल पर चलाना छोड़ दे  अपनी ख़ातिर एक ख़ाना छोड़ दे, मैक़दों में आना जाना भूल कर, हंस ज़रा दिल का जलाना छोड़ दे, क्यूँ रहे खुशियों से यूँ महरूम तू, होश में आ लड़खड़ाना छोड़ दे, ग़म है अव्वल,ज़िन्दगी की राह में, इसलिए ख़ुद को सताना छोड़ दे, एक तू क्या हर कोई हलकान है, मान भी जा अब बहाना छोड़ दे, चश्म-ए-गिरया ऑ कलेजा तर-ब-तर, चाक दामन ,सब गिनाना छोड़ दे, ग़म ग़लत कर जा कहीं तन्हाई में, जा-ब-जा,ग़म का सुनाना छोड़ दे, जा अगर रोना ही है जी भर के रो, या कि फिर शम्मा जलाना छोड़ दे, इक ज़रा सी बात मेरी मान ले, मुफ्त के सदमे उठाना छोड़ दे... उर्मिला माधव... 27.1.2o16

दीवाली रही

उसकी हस्ती मुझसे कब ख़ाली रही, मेरे संग संग ....,उसकी दीवाली रही, कोई भी हक़दार उसका कब रहा, बिन मेरे बस उसकी बदहाली रही, उर्मिला माधव, 26.1.2017

आजकल

ज़िन्दगी थक हार कर ही चल रही है आजकल, खुल सभी की शख़्सियत हर पल  रही है आजकल, एक लहज़ा भीड़ जो देखी तो हम घबरा गए, अब बची तन्हाई है सो खल रही है आजकल, दिन निकलते ही उदासी,घिर के आती है सो अब, दोपहर भी शाम जैसी,ढल रही है आजकल, उर्मिला माधव, 27.1.2017..

एक दिन भारत, भारत है

2014 में कहा गया एक कलाम संभवतः उससे भी पहले---- तारीफ़ करूँ क्या जज़्बे की, बस एक दिन भारत भारत है, क्या खूब खिलौने चाबी से..... चलते हैं बहुत हिक़ारत है, आपस में झगडे करते हैं, गद्दी की खातिर मरते हैं, है वतन भरा नक्कालों से, साबित है इनकी चालों से, क्या फ़ख्र करूँ मैं भारत पर, चोरों की लिखी इबारत पर, क्या भारत फिर भी भारत है?? जब के ये बिलकुल ग़ारत है, उर्मिला माधव... 26.1.2016...

शजर देखा है

कितनी हैरत है गिरा,सब्ज़ शजर देखा है, वक़्त-ए-मुश्किल में बहुत खूब क़हर देखा है, चश्म-ए-गिरियाँ का अँधेरा ही रहा आठ पहर, किस से ये कहते फ़क़त दर्द-ए-जिगर देखा है, यूँ तो नाज़ुक था,यही कहते सुने अहले नज़र, जम के पत्थर से लड़ा......ऐसा गुहर देखा है, घर बहुत जलते रहे,अब्र कहीं बरसा किया, ऐसा मंज़र भी कभी वक़्त-ए-सहर देखा है, दिल को होता ही नहीं इसका यकीं,कैसे कहें  फिर भी ये कहते रहे लोग.....मगर देखा है,  चढ़ते दरिया में भी रफ़्तार मुक़म्मल ही रही, हमने कश्ती को बिना खौफ़-ओ-ख़तर देखा है, उर्मिला माधव... 24.1.2014..

ग़ुबार दिल से--फ्री वर्स

ये उठते हुए ग़ुबार दिल में, थका देते हैं, पाँव बंध जाते हैं, आहटें थका देती हैं  कानों को, ख़त्म होती हुई जिंदगियां, रुला देती हैं आंखों को, गर्द में मिला देती है ज़मीन आंसुओं को, बवंडरों के झोंके हिला जाते हैं रूह को, भूल गया दिमाग़, चौकन्ना होना, सो जाना चाहता है सब भूल कर, रब भूल कर, वही सच देखने को बेचैन दिल जो दिखाई नहीं देता, सुनाई देता है, धुन्ध के ग़ुबार इनमें चरमराते हुए सूखे पत्ते, खौलते हुए एहसास , दबी हुई आहें, सांप के फन की तरह उठ खड़ी होती हैं, हम इन से डरके बचाते हैं ख़ुद को, पर डसते हैं इतनी तेजी से, सांस जाने की ख़बर नहीं होती, हम फंसे रह जाते हैं उनमें उलझ जाते हैं, ज़िन्दगी भर को उर्मिला माधव 24.1.2018

झुक गए

Chuk gaye tum or ham bhi chuk gaye Sab yahin aakar achanak ruk gaye, चुक गए तुम और हम भी चुक गए, सब यहीं आकर अचानक रुक गए, Jo chale tan kar jahan main umr bhar, Rasta chalte hii chalte jhuk gaye, जो चले तन कर जहाँ में उम्र भर, रास्ता चलते ही चलते झुक गए... #उर्मिलामाधव, 23.1.2016

समंदर के बीच में

तनहा खड़ी रही मैं समंदर के बीच में, तूफ़ान मुश्किलों के बवंडर के बीच में, ताने गए जो मेरी शिकस्तों के वास्ते, कम फासले थे मेरे ऑ खंजर के बीच में, ताक़ीद ये हुई थी के हंसना है अब हराम, रहना है उम्र भर यूँ ही बंजर के बीच में, घर कह रहे थे सब जिसे वो घर कहाँ रहा, कुछ दूरियां थीं मेरे ऑ अंदर के बीच में, बातों की तर्ज़ हो गई यलगार की तरहा, मदफन की शक्ल हो गई मंदर के.बीच में, अब मैं थी और थीं मेरी मजबूरियां तमाम, गोया कि जुर्रतें हों सिकंदर के बीच में..... #Urmila 22.1.2015

कोई क्या करे

दिलजले महबूब की बांहों का कोई क्या करे??  ख़ार से लिपटी हुयी राहों का कोई क्या करे?? एक हसरत के लिए..दुनियां नज़र अंदाज़ हो,  इस क़दर बहकी हुयी चाहों का कोई क्या करे?? ग़र्क़ हो ऐसी मुहब्बत छीनले जो मुस्कराहट,  बर्फ होती,सर्द सी....आहों का कोई क्या करे, जो वफ़ा के नाम पर.....सूली चढा दे दार पर,  उस अहद के बदगुमां,शाहों का कोई क्या करे?? कर दिए ज़ंजीर जिसने....ज़िन्दगी के रास्ते,  फिर भला ऐसी सिपह्गाहों का कोई क्या करे??  उर्मिला माधव.. 23.1.2015

आएगा ही

एक जब बिछड़ा है,दूजा आएगा ही, और जो आया है वो भी जाएगा ही, मन न मैला कर मुसफिर, रास्ता है, एक दो ठोकर तो यूँ भी खायेगा ही, उठ भी जा होजा खड़ा पैरों पै अब, चल, अँधेरा और भी गहराएगा ही, ख़ूब है  इनसान का हुस्न-ए-मज़ाक़ , साँस है जब तक, अबस इतरायेगा ही, भूलना खुद को है फितरत-ए-बशर, कोई तो फिर रास्ता बतलायेगा ही उर्मिला माधव ... 23 .1 .2018

चाहती हूँ

सिर्फ़ हंसने को बहाना चाहती हूँ, मैं कहाँ सबको हंसाना चाहती हूँ, गर उमड़ आए समंदर अश्क़ का, तब मैं तनहाई में जाना चाहती हूँ, ग़ैर के कांधे की तालिब किसलिए, बार अपना ख़ुद उठाना चाहती हूँ, मैंने कब साझा किया है ग़म कहीं, राह अपनी ख़ुद बनाना चाहती हूँ, कोई हँस के बोल ले तो ठीक है, वर्ना घर को लौट जाना चाहती हूँ.. हर हक़ीक़त जानती हूँ दह्र की, इसलिए दामन बचाना चाहती हूँ, उर्मिला माधव 23.1.2018

हमें

तुम तो अजीब हाल में ले आए हो हमें, दुनिया के कैसे जाल में ले आए हो हमें, हम तो नसीमे सुब्ह के ही मुन्तज़िर रहे, हद है कि अर्ज़े हाल में ले आए हो हमें, पर्दे हटा के खींच के माज़ी में ले गए, बेवज्ह गुज़रे साल में ले आए हो हमें,

आसां कर गया

बस जुदा होकर हरासां कर गया, ज़िन्दगी लेकिन चरागां कर गया, जब ये पूछा साथ तो चल पाओगे ? उलझनों में था सो हाँ हाँ कर गया, देखते बनती थी उसकी कश्मकश, मुस्कुराने भर को सामां कर गया, क्या ये कम है ज़िन्दगी के वास्ते, ख़लवतों की राह आसां कर गया दूर तक ......देखा किये हम रहगुज़र, दिल का इक कोना सा वीरां कर गया, उर्मिला माधव .. 22.1.2017

इधर-उधर

ज़िंदगी के रास्ते में,सब इधर-उधर गए, आस-पास चल रहे थे वो किधर-किधर गए? ज़लज़लों की धार से,न बच सका कोई कहीं, साथ वाले काफिले भी,सब बिखर बिखर गए, बात ख़ास ये रही कि,उलझनें बनी रहीं, मुश्किलों की मार से बहुत सिहर-सिहर गए, जो चराग़ आँधियों में जल सके जला किये, तीरगी का ज़ोर था कि,हम जिधर-जिधर गए, शाख-शाख जल रही थी,जंगलों की आग से, देखते ही रह गए कि जल शजर-शजर गए, उर्मिला माधव... 21.1.2014

आए क्यों

दिल की खारिश को जुबां पर लाये क्यूँ ? जी नहीं था तो यहाँ तक आये क्यूँ  बस तुम्हारी ख़ुद ख़याली है अज़ाब, आ ही पहुंचे हो तो फिर पछताए क्यूँ ?  क्यों कोई मानेगा तुमको नाख़ुदा, जान कर ये धोखे तुमने खाए क्यूँ?? कामयाबी नर्म लहजे की गुलाम, इस क़दर तेवर भला दिखलाए क्यूँ, खुद-ब-खुद अपना रवैय्या लो बदल, अब ज़माना ही तुम्हें समझाए क्यूँ  उर्मिला माधव... 21.1.2015 #उर्मिलामाधव

क्यों नहीं रहती

एक बार फिर से दिल यही कहना चाहता है। .. मुझको परवाह क्यों नहीं रहती ? लब पे कोई आह क्यों नहीं रहती? कोई इज़हार-ए-इश्क़ करता रहे, दिल में कोई राह क्यों नहीं रहती ? भाते रहते हैं कितने चेहरे मगर, कोई भी चाह क्यों नहीं रहती? अपनी मर्ज़ी से ख़्वाब बुनती हूँ, हस्ब-ए-इस्लाह क्यों नहीं रहती? हुस्न-ए-मंज़र से भी मुतास्सिर हूँ, ज़ेहन में वाह क्यों नहीं रहती ? सबको है फ़िक्र दीन-ओ-दुनियां की, मुझको लिल्लाह क्यों नहीं रहती? उर्मिला माधव, 6.11.2016

रख रही हूँ

ग़ज़ल ------ मैं किताबें अब सरहाने रख रही हूं, चंद वरकों में ज़माने रख रही हूं, हर वरक संजीदगी के नाम है, एक माज़ी सोलह आने रख रही हूं, इक तजुर्बों का पुलिंदा,हर नफ़स, ज़िन्दगी के ताने-बाने रख रही हूँ, कुछ अंधेरे और दिए बुझने की राख़ और धुंए के कुछ ख़ज़ाने रख रही हूँ, गोकि एहसास-ए-घुटन हलका न हो, बंद करके,कुछ दहाने रख रही हूं,  जिस की दम पे दिन गिने हैं उम्र भर, अपनी तस्वीही के दाने रख रही हूँ, एक खनक आहों के हिस्से की भी है, सबके अपने-अपने ख़ाने रख रही हूं, उर्मिला माधव, 28.10.2017

आसमानों तक

सायबानों से आसमानों तक, अपना चर्चा रहा ज़ुबानों तक, दश्त-ओ-दहशत से कौन उलझेगा, हमने ख़ुद को रखा मकानों तक, वो तो गरदन हलाक कर देते, बात उलझी रही निशानों तक, हमने वो राह ही बदल डाली, जो के टलती रही बहानों तक, अपना उनवान ही अलहदा है, इसको रहना ही है मुहानों तक.. अपनी आदत है सर उठाने की, इसको झुकना भी है तो शानों तक, उर्मिला माधव.. 19.1.2017

एक मतला

जो नफ़ासत के लिए एक वक़्त तक मशहूर थे  ज़ेह्न में आ कर भी दिल की तिश्नगी से दूर थे उर्मिला माधव

मजबूर कर दिया

सब भूलने को वक़्त ने मजबूर कर दिया, इतना दुखाया दिल के बहुत चूर कर दिया, किरचें तमाम जोड़ कर फिर से खड़े हुए, ज़ख्मों ने बढ़के ज़ीस्त को नासूर कर दिया उर्मिला माधव

कलम किया जाए

उसका सर भी कलम किया जाए, जिसको रह-रह के ग़म दिया जाए, ग़र तगाफुल में रंग भरना हो,  सिर्फ़ गर्दन को ख़म किया जाये, जीते जी मारना है उसको गर, उसपे चर्चा भी कम किया जाए, #उर्मिलामाधव... 18.1.2016

ज़ात हो गई

मुरदार जबसे आदमी की ज़ात हो गई,  कुल जिंदगी ही अहले ख़राबात हो गई, हमने जो एक तिफ़्ल को गोदी में क्या लिया, उसकी हंसी तो रंग-ए-तिलिस्मात हो गई, हम दर-ब-दर भटकते रहे जीस्त को लिए  लो यक-ब-यक ही उससे मुलाक़ात हो गई, बेहतर यही था,ऐब भी हम ख़ुद के देखते, अपनी खता थी,हासिले सदमात हो गई,  बस सोचते ही रह गए,हर बात भूल कर, किसको ख़याल था के ,कहाँ रात हो गई, उठते थे,बैठते थे,नए देख कर अज़ाब, किस-किससे जाके कहते,कोई बात हो गई, तन्हाइयों में बैठ कर रोये भी इस क़दर, लगता था जैसे बे-अदब बरसात हो गई  कोशिश तो ये रही के हंसें उम्र भर को हम, पर आंसुओं की समझो हवालात होगई.... #उर्मिलामाधव... 14.1.2016

पिला दे कोई

प्यार का जाम पियो,गर जो पिला दे कोई, इतना एहसास रहे......ग़म न बढ़ा दे कोई... ख़ुद पस-ए-पर्दा रहो, धूल बहुत उड़ती है, अपनी ठोकर से कहीं ख़ाक उड़ा दे कोई, सांस तरतीब से आ जाये के इतना तो रहे, दर्द क्या कम है के कुछ और हवा दे कोई, उर्मिला माधव.. 18.1.2017

फ़ैसला करते हुए

फ़ैसले के नाम पर एक हौसला करते हुए, उम्र भर जीना पड़ा इक फ़ासला करते हुए, सिर्फ़ देखेंगे, कहेंगे कुछ नहीं ये तय किया, सांस जब थमने लगी थी फ़ैसला करते हुए, उर्मिला माधव

झांका करें हैं

खूब कारोबार लफ़्ज़ों का करें हैं, दूसरों के घर में,जो झाँका करें हैं तीलियां रख्खें हैं मुठ्ठी मैं दबाकर, राख़ में चिंगारियां झोंका करें हैं, कांच की दीवार वाले घर जिन्हों के, वो ही पत्थर रात-दिन फेंका करें हैं, दाग़ दामन में छुपाये डोलते हैं , दूसरों के गम पे जो थूका  करें हैं, खोल कर हैं दिल करें छींटाकशी जो, वो ही अपनी बेर को रोका करें हैं  उर्मिला माधव... 17.1.2014...

अटका हुआ है

जिस्म का ये बोझ कब हल्का हुआ है, जिल्द बनकर रूह से चिपका हुआ है, आईना सच बोलता है फितरतन ही, बेसबब ही हर जगह रुसवा हुआ है, दश्त से गुज़रे तो ख़ुद को छोड़ आए, ज़ेह्न है के आज तक अटका हुआ है, इब्तिदा है क्या अभी से सोच लें हम, रोज़े अव्वल एक ही सजदा हुआ है, उर्मिला माधव

janta hai

Kab kise thukraenge wo janta hai, Kis jagah ruk jaenge wo janta hai, Apne hathoN me kahaN koii bhi dum Kb kahaN jhuk jaenge wo janta hai Urmila Madhav

बहुत ख़ूब है

माहपार-ए-दरख्शां बहुत खूब है,  प्यार मेरा मगर तुमसे मंसूब है, जानना है ज़रूरी सुनो दीदा वर,  बा-वफाई मुहब्बत का उस्लूब है  आफरीं-आफरीं मेरा दीवाना पन, लोग कहते हैं वो देखो मज्जूब है, आशिकी का सिला मर्हबा,मर्हबा, कैसे झुठलायेगे गर ये मक्तूब है, तार दामन के देखेंगे बिखरे अगर, लोग कहते फिरेंगे कि मत्लूब है, आशिक़ी को है दरक़ार जिंदादिली,  जीतेजी मर गया,वो जो मग्लूब है,  उर्मिला माधव... 16.1.2014. माहपार-ए-दरख्शां---उगता हुआ चाँद , दीदावर------देखने वाले, उस्लूब---आचरण  आफरीं--- वाह-वाह .. मज्जूब---देखने में पागल लेकिन परमहंस  मक्तूब--- लिखा हुआ, मत्लूब---प्रेमी, मग्लूब---ओंधा गिरा हुआ...

कर लीजिए

ज़िन्दगी के वास्ते कुछ इस तरहा कर लीजिये, रंज-ओ-ग़म जो भी मिले सब मुस्कुरा कर लीजिये, ग़ैर पर उंगली उठाने से तो बेहतर है यही, अपनी कारस्तानियों पर तब्सरा कर लीजिये, दिल हथेली पर मसल कर, सूँघिये तो बरमला, बरसरे महफ़िल दुआ का हौसला कर लीजिये, बात कहना और मुकरना है ज़माने का चलन ख़ूबियों में खामियों का सिलसिला कर लीजिये उर्मिला माधव

खो गया क्या-क्या

मुहब्बत को निभाने में न जाने खो गया क्या-क्या, जुदाई बाद वो जाने के आख़िर ,हो गया क्या-क्या.. जहाँ वाले मिरी तस्वीर का रुख़ देखते भी क्यूँ, कहाँ ज़ाहिर किया मैंने के मेरा रो गया क्या-क्या ... जो माज़ी लिख रही थी आज तक भी,ज़िन्दगी मेरी, कहीं जब आसमां रोया, सवेरा धो गया क्या-क्या... उर्मिला माधव.. 16.1.2018

थक जाएंगे

थक गए हैं, थक रहे हैं, और भी थक जाएंगे, बस अचानक एक दिन स्टेज से हट जाएंगे.. उर्मिला माधव 16.1.2018

पांव फिर भी

क़ब्र में गहरे धंसे हैं पाँव फिर भी, जिसको देखो, इश्क़ ही चिल्लाए है, देख भइये, होश में आजा अभी, एक पल में ज़िन्दगी मिट जाए है, उर्मिला माधव 16.1.2018

बाख़ुदा कोई नहीं

अपनी ज़ाती ज़िन्दगी में,बाख़ुदा कोई नहीं, जो भी कुछ थे आप थे बस,दूसरा कोई नहीं, कितने लम्बे रास्ते तनहा किये तय उम्र भर, सबका इस्तकबाल था पर नाख़ुदा कोई नहीं, सब अकेले ही उठाते अपनी वीरानी का बार, कुल दह्ऱ का ये चलन है,बांटता कोई नहीं, रोज़-ए-महशर सामने है और खड़े हैं रु-ब-रु, इसकी मंजिल इन्तेहा है इब्तेदा कोई नहीं, आह भी याहू की जौलानी सी लगती है मुझे, इसलिए अब उससे बढ़कर या खुदा कोई नहीं, उर्मिला माधव 15 .1 .2017

दुःख न देते

आपके दामन में खुशियां कम अगर थीं तो हमें फिर कुछ न देते, क्या कहें अब इससे बेहतर तो यही था जो दिया वो उफ़ न देते, याद करिये इससे पहले भी तो हमने ज़िन्दगी ख़ुद,जी हमेशा, बात ये है कुछ नहीं तो इतना करते कम से कम ये दुख न देते, उर्मिला माधव

ज़माने भर के

ये कोई जिस्म हुआ...ज़ख़्म ज़माने भर के, चार क़दमों ही पे याद आएं ,ठिकाने घर के.. क्या मिलें उनसे न अख़लाक़-ए-मुहब्बत न लिहाज़, जिन के होठों पे महज़, प्यार दिखाने भर के, उर्मिला माधव ..

ख़ास रखते हैं

हम जो रिश्तों की आस रखते हैं, यूँ ही उम्मीद ख़ास रखते हैं , जब ये दुनिया बदल गयी है तो, बे-वज्ह दिल उदास रखते हैं, जिनको बस दायरों से निस्बत है, खुद को ही आस पास रखते हैं, वो जो  इंसां की कद्र करते हैं , कितना सादा लिबास रखते हैं, कुछ तो ऐसे भी हैं जिगर वाले, सबकी खातिर मिठास रखते हैं,  उर्मिला माधव... 14.1.2016

बात हो गई

जनाब हफ़ीज़ जालंधरी की ज़मीन पर  आज की फिल बदीह में कही गई ग़ज़ल-- मुरदार जबसे आदमी की ज़ात हो गई,  कुल जिंदगी ही अहले ख़राबात हो गई, हमने जो एक तिफ़्ल को गोदी में क्या लिया, उसकी हंसी तो रंग-ए-तिलिस्मात हो गई, हम दर-ब-दर भटकते रहे जीस्त को लिए  लो यक-ब-यक ही उससे मुलाक़ात हो गई, बेहतर यही था,ऐब भी हम ख़ुद के देखते, अपनी खता थी,हासिले सदमात हो गई,  बस सोचते ही रह गए,हर बात भूल कर, किसको ख़याल था के ,कहाँ रात हो गई, उठते थे,बैठते थे,नए देख कर अज़ाब, किस-किससे जाके कहते,कोई बात हो गई, तन्हाइयों में बैठ कर रोये भी इस क़दर, लगता था जैसे बे-अदब बरसात हो गई  कोशिश तो ये रही के हंसें उम्र भर को हम, पर आंसुओं की समझो हवालात होगई.... #उर्मिलामाधव... 14.1.2016

चलते रहिए

जीने की ग़र ख्वाहिश है तो,शोलों पर भी चलते रहिये, सूरज की मानिंद जहाँ में,बस हर रोज़ निकलते रहिये, -------------------------------------------------------------------- jiine kii gar khwahish hai to sholon par bhii chalte rahiye, sooraj kii maanind jahaan main bas har roz nikalte rahiye... उर्मिला माधव... 19.7.2014..

होते हैं

हादसे सुब्ह-ओ-शाम होते हैं, रोज़.....रिश्ते तमाम होते हैं, अपने अखलाक़ पे,नज़र ही नहीं, दाग़........लोगों के नाम होते हैं, जो भी चाहा जुबां से कह डाला, और तब क़त्ल-ए-आम होते हैं, जो ये मजमा लगाया करते हैं, इनके...लफ़्ज़ों के दाम होते हैं, जो हैं दिल से दिमाग़ से शातिर, उनको....झुकके सलाम होते हैं, उर्मिला माधव... 14.1.2017

डर गए सब

अपने-अपने दायरों में मर गए सब, दूसरा कोई आगया तो डर गए सब, सहर होते ही मिले एक दूसरे से, शाम होते अपने-अपने घर गए सब, मुश्किलों के वक़्त सब दरकार थे, कोई भी जाना न चाहे,पर गए सब, उर्मिला माधव.. 13.1.2017

इत्मीनान में

बरपा किया है शोर सा, इतना जहान में, समझे नहीं कि हम हैं यहां किस मकान में, दरया की ख़ुश्कियों ने दिखा दी है बानगी, जब क़श्तियाँ भी उड़ने लगीं आसमान में, हर कोई गिर रहा है,ज़मीं खींचती सी है,  इस पर कमी कहां है किसी इत्मिनान में, हमको गुमां नहीं है किसी आसमान का, हम मोतबर कहाँ हैं किसी इम्तिहान में, उर्मिला माधव  13.1.2019

चिलमन

चिलमन दरूं गिरा के किया आपने गुनाह, इस बे-अदब अदा का भला क्या करेंगे आह !!, इन फासलों के साथ ही चलना है गर हमें, किसकी करेंगे आरज़ू,किसकी तकेंगे राह, करने से पहले आपने सोचा तो होगा खूब, हरक़त को आफरीं है,अदावत की वाह-वाह !! इसके हुए मआनी के उल्फत हुयी तमाम, अब देखनी है आपकी बदली हुयी निगाह, हमको किया अमीर भी इफरात से जनाब, रख्खेंगे अब सहेज के ये आह और कराह,  उर्मिला माधव... 11.1.2014..

ख़ामोश सी फिजाएं

खामोश सी फ़िज़ाएँ, सहमी हुई हवाएँ, सब हमसे पूछती थीं, कहदो कहाँ से जाएँ? अनजान से अँधेरे, सब रास्तों को घेरे, आँसू से भीगे चेहरे, रोते हुए सवेरे, क्या हमपे बीतती थी?? किस-किसको ये बताएं?? हर बात चुक गई थी, ख़ाली गईं दुआएँ ।। उर्मिला माधव.. 11.1.2014..

मुग़ालते हैं

कोइ साथ चल सकेगा,वो भी मुग़ालते हैं यादों के सिलसिले हैं,वो भी खंगालते हैं, सूखे शजर के पत्ते,गिरते हैं ख़ुद ब ख़ुद ही, दिल जो धड़क रहा है,वो भी संभालते हैं , उर्मिला माधव

पूरा जीवन

व्यथा कथा और अंतर्मन, अब बीत गया पूरा जीवन, हम मार्ग सतत जब चलते हैं, तब स्वयं स्वयम को छलते हैं, भ्रम जाल समझ सब आते हैं, हम फिर भी धंसते जाते हैं, परिचर्या जीवन शैली की, जीवन भर समझ न पाते हैं, उर्मिला माधव.. 11.1.2017

खेली है मैंने

कितनी लंबी पारी खेली है मैने, ज़हमत कितनी सारी लेली है मैने, आंसू धोकेबाज़ कहीं गिर जाते हैं, ख़ुद को लानत सारी दे ली है मैंने, मेरे ग़म का कोई साझेदार नहीं तनहा हर दुश्वारी झेली है मैंने, उर्मिला माधव 11.1.2018

प्यार लिख दूँ

दिल तो शर्माता है फिर भी,तुम कहो तो प्यार लिख दूँ, और तुम्हारे दिल के आगे,अपने दिल की हार लिख दूँ ? प्यार के इन दायरों में बंध के रहना ....है तो मुश्किल, पर किसी दीवार के कोने में इक इज़हार लिख दूँ दिल ये कहता है,तुम्हीं मख़सूस हो मेरे लिए , सोचती हूँ दिल ही दिल में,तुमको मैं दिलदार लिख दूँ.... ज़िन्दगी तो हर क़दम दुश्वारियों का नाम है  बस इन्ही दुश्वारियों में,इश्क़ का किरदार लिख दूँ उर्मिला माधव

नज़र बस एक काफ़ी है

जहां भर से सबब क्या है,सफ़र बस एक काफ़ी है, अगर बीनाई अच्छी है,.....नज़र बस एक काफ़ी है...  उर्मिला माधव.. 10.1.2017

पुकारा करते हैं

ये इश्क़ो मुहब्बत की दुनियां, हर शख़्स के दिल को भाती है, कुछ हम जैसे दीवाने हैं  जो रंज गवारा करते हैं हम शर्मो हया के मारे हैं,  दामन में छुपाते हैं दिल को, ये किसको ख़बर है,सच  क्या है, हम किसको पुकारा करते हैं ? उर्मिला माधव

नज़्म सुभीता है

यूँ बोले अल्लाह क़सम.....दिल प्यार से हमने जीता है, उफ़ झूठ पे चलने वालों को,भई कितना बड़ा सुभीता है, ली हाथ में जब तस्बीह..लिया हरि नाम हज़ारों रंगों में, बस शाम हुयी तो गम के आंसू.....मयखाने में पीता है, भई कितना बड़ा सुभीता है... उर्मिला माधव... 9.1.2014

नज़्म-- जहाँ जाना

बहुत देखा जहां जाना ,कभी मेरी गली आना, दर-ओ-दीवार गलियों के,बहुत सीलन भरे होंगे, और हाँ वो तीरगी के साए में, डरकर छुपे होंगे, जो बर्ग-ए-गुल मुख़ातिब हो,तो आंसू देखना उसके, बदन में आबले होंगे ,महज़ ग़म पूछना उसके, ये मेरी ज़िंदगी जो अब तलक पुर ख़ार ज़िन्दां है, मेरे ग़म से मेरे रब की भी दुनियां,ख़ास वीरां है, चमन वीरां,सहन वीरां,लगे रूह-ओ-ज़ेहन वीरां, बहे आँखों से जो दरिया लगे गंग-ओ-जमन वीरां, यहाँ आब-ओ-हवा शम्स-ओ-क़मर को दूर रखती है, मसर्रत के जहां में ख़ास कर माज़ूर रखती है , के ज़ेरे आसमां लो रात भर तुम भी गुज़ारो तो, बड़ी शिद्दत से हिम्मत से सितारों को पुकारो तो, अगर आवाज़ ख़ाली लौट कर आये तो बतलाना, हुआ महसूस कैसा इस तरह,बेकार चिल्लाना, कभी मेरी गली आना..... #उर्मिलामाधव... 9.1.2016

होश पर

सर तो ये रख्खा गया है दोष पर, किस लिए छीना गया है होश पर, क्या लगाया इसके भीतर राम जी, जाने क्या-क्या सोचता है जोश पर, दायरों की करके कुल मट्टी पलीद, ज़िक्र भी छेड़ा गया मयनोश पर, उर्मिला माधव

अदा करदो

तुम तो बस इतना हक़ अदा करदो, दामन-ए-दिल को ग़मज़दा कर दो, देर किस बात की है इसमें अब, जितनी जल्दी हो,इब्तदा कर दो.. उर्मिला माधव

संभलता नहीं है

दोस्तों मेरी पोस्ट डिलीट हो गई है,क्यों -- पता नहीं,इसलिए दोबारा पोस्ट कर रही हूँ.. ग़म बहुत है संभलता नहीं है, बोझ ये मुझसे चलता नहीं है, क्यूँ है ये शहर ख़ामोश इतना, क्या ये सन्नाटा खलता नहीं है, बेसबब कोई शायद यहाँ पर, घर से बाहर निकलता नहीं है, कितनी मुश्किल हैं ये मुश्किलें भी, मेरा  दिल क्यूँ बहलता नहीं है ? अपने दामन का साया ही देदो, दिन में सूरज पिघलता नहीं है.... उर्मिला माधव.. 9.1.2017

बोलती बहुत है

Ye mahaz bejaan hai, .....par bolti hai, Isliye tasveer se khush ho gaye ham, Urmila Madhav 9.1.2018

ख़ुश हो गए

Zindagi par ungliyan uthti bahut haiN, Isliye tasveer se khush ho gaye ham... Urmila Madhav 9.1.2017

तू भी नहीं

Main agar mazboot hoon murdaar to tu bhi nahin, Raasta roke mera wo haar to too bhi nahin, Barq aaii thi kabhi girne, dabishtaaN ki taraf, Maine hans ke kah diya, gulzaar to tu bhi nahin, Khud ba khud to jal rahi hai,tu sarapa aag hai, Ghar jala kar hans saki,har baar to tu bhi nahin, Muddaton se jal rahe hain ham to sehra ki tarah, Par samandar saA kahin kirdar to tu bhi nahin BewafaiI ka abas,ilzaam kyun mere taiiN, Saahib-e-kirdaar saa gham khwaar to tu bhi nahin, ZindagI ko jaa-b-jaa ruswa kare hai kisliye, Sach yahi hai ke bahut , bezaar to tu bhi nahin.... Urmila Madhav.. 23.8.2017

जोड़ कर देखिए

मुंह ज़रा मोड़ कर देखिये, आप ज़िद छोड़ कर देखिये, आप मुझसे बुरे भी हैं क्या ? आइये होड़ कर देखिये, अपनी टूटी हुई ज़िन्दगी, फ़िर ज़रा जोड़ कर देखिये, आप गर ख़ुद पे भारी हुए, कुछ अना तोड़ कर देखिये... कारसाज़ी है चौखट में क्या, ये तो सर फोड़ कर देखिये, उर्मिला माधव,

देश के कोने कहाँ हैं--- नज़्म

ये बताओ देश के कोने कहाँ हैं? मुझको लगता है कोई कोना नहीं है  और जो होगा भी तो खाली नहीं है, एक कोने में सभी माऐं खड़ी हैं, दूसरे कोने में कुछ लाशें पड़ी हैं, तीसरे कोने में क़ानूनी हिफाज़त, और वतन के रहनुमाओं की नफ़ासत, नौजवानों की उफनती सी बग़ावत, जिस्म की नक्काशियों पर कुछ इशारे, टूटती दीवार के टूटे सहारे, हाथ में कासा लिए ग़ैरत हमारी, क्यों नहीं समझेंगे सब,हमको भिखारी? चार कोनों में बचा है एक बाकी, इसमें गुंजाईश नहीं बिलकुल हवा की, रोज़ क्यों होती है ये मरदम शुमारी, इसके कुछ मानी अगर होते तो क्या था..!! सब के सब देखो नतीजे सामने हैं, हर किसीको ग्यारह बच्चे पालने हैं...।। उर्मिला माधव..... 8.1.2016..

पाओगे तुम

गोशे-गोशे मैं हमारी खुशबुएँ......पाओगे तुम, देखने चेहरा गुलों का किसके घर जाओगे तुम?? उर्मिला माधव... ७.१.२०१४...

डोरियां

वो अपरिमित प्रेम जिसकी डोरियाँ टूटी हुई, वेदनाओं के तिमिर में भावना रोती हुई... उर्मिला माधव

5 ग़ज़लें

1 आजकल के लोग कुछ ज़्यादः सयाने हो गये, साल बेशक हो नया पर हम पुराने हो गए रौशनी बारूद की है,चार सू रंग-ए-क़फ़न, आदमी की ज़िन्दगी में कितने ख़ाने हो गए, इक बिखर जाता है,खींचें,ग़र सिरा हम दूसरा, क्या कहें दामन में अब इतने दहाने हो गए, होगये खामोश,दुनियां के नज़ारे देख कर, लोग ये समझा किये के हम दिवाने हो गए, हमने जब दस्तार रख दी,मंज़िलों के छोर पे, बस फ़लक़ के साए में,अपने ठिकाने हो गए, हम अज़ल से ही रहे बस,इन्तेहाई सादा दिल, दह्र की अय आंधियो ,हम क्यूँ निशाने होगये? #उर्मिलामाधव...                               2 ये मेरी हस्ती है और मैं हूँ जनाब, आपके कहने से होगी क्यूँ ख़राब, देख कर ऐब-ओ-हुनर इनसान के, क्या बजाते फिरते हो ये मुंह जनाब, मैं भी ग़र कहने पे जो आ जाऊं तो, आप क्या दे पायेंगे फिर यूँ जवाब, आप भी अपना गिरेबां झाँक लें, तब समझ में आएगा,लुब्बे-लुवाब, अपने हाथों से मसल कर आबरू, क्यूँ बढ़ाते हैं मुसलसल यूँ अज़ाब, क्यूँ किसीकी ठोकरों पर हो जहां, आप ही को समझे कोई,क्यूँ नवाब... #उर्मिलामाधव         ...

वाह वाह करते रहे

लोग सब वाह-वाह करते रहे, हम हज़ारों गुनाह करते रहे, जैसे भी हो सका जहां भर में, इक मुहब्बत की चाह करते रहे, रोने वालों को सबने रोने दिया, अपने जीने की राह करते रहे, रोने-धोने से क्या गुज़र होती, ज़ीस्त को ख़्वाब गाह करते रहे, सच्ची खुशियां कहाँ मयस्सर थीं, सिर्फ़ ग़म से निबाह करते रहे,   अपनी दुनियां बुलंद करने को, ख़ुद से ख़ुद ही सलाह करते रहे, तेरी दुनियां के सारे तुर्रम खां, देख कर,आह-आह करते रहे, #उर्मिलामाधव... 7.10.2015

लाये गए हैं

पुराने पन्नों से----------- हम सज़ा की हद में बतलाये गए हैं , और यहाँ तक खींच कर लाये गए हैं , किस सजा के मुस्तहक हम होगये, जाने क्या-क्या जुर्म बतलाये गए हैं ?? मोहमल इलज़ाम हैं सब,मुत्मइन हम,  दर हकीक़त हम तो झुठलाये गए हैं, उफ़ पस-ए-पर्दा रखे गम छील डाले, और अदालत में वो दिखलाए गए हैं , इससे बढ़कर और क्या मायूस होंगे , हर तरह बेइमान जतलाये गए हैं ... उर्मिला माधव... २९.८.२०१३
लोग सब वाह-वाह करते रहे, हम हज़ारों गुनाह करते रहे, जैसे भी हो सका जहां भर में, इक मुहब्बत की चाह करते रहे, मरने वालों को सब ने मरने दिया, अपने जीने की राह करते रहे, रोने-धोने से क्या गुज़र होती, जीस्त को ख़्वाब गाह करते रहे, सच्ची खुशियां कहाँ मयस्सर थीं, झूठे ग़म से निबाह करते रहे,   अपना जलवा बुलंद करने को, ख़ुद से ख़ुद ही सलाह करते रहे, तेरी दुनियां के सारे तुर्रम खां, देख कर,आह-आह करते रहे, उर्मिला माधव

लिबास लगता है

ख़ामख्वाह दिल उदास लगता है, जिस्म ग़म का लिबास लगता है  ये जहां भी अजीब उलझन है, कब कोई ग़म शनास लगता है, अपना आपा संभल सका जो कभी, बस वही वक़्त ख़ास लगता है, --------------------------------------- Khamkhwah dil udas lagta hai, jism gam ka libaas lahta hai , ye jahaan bhi ajiib uljhan hai, koii naiin gam shanaas lagta hai, apnaa aapaa sambhaal leven agar, bas wahi waqt khaas lagta hai....  #उर्मिलामाधव... 6.1.2016

हर गाम पे

हमने अपनी ज़िन्दगी के नाम पे, सिर्फ़ मज़बूती रखी हर गाम पे, दिल को जब तबियत हुई तो हंस लिया, सोचना क्या इसमें सुब्हो शाम पे, राब्ते तोड़े नहीं हमने बख़ुद, टूट गए तो रोये कब अंजाम पे, एक मुश्किल वक़्त था सो कट गया, जब अकेले ही खड़े थे बाम पे, रफ्तनी के वक़्त देखा जाएगा, आह क्या भरना किसी इल्हाम पे... उर्मिला माधव.. 6.1.2016

आसपास रहे

वो जब तलक भी रहा उसके आसपास रहे, वो जब चला ही गया उम्र भर उदास रहे, वो क्या समझता हमें उसकी क्यूं ज़रूरत थी, बस एक वो ही न था, कितने ग़म शनास रहे, बताते कैसे उसे, दिल पे क्या गुज़रती रही, हम उसकी याद में किस दर्ज़ा बदहवास रहे, उर्मिला माधव

लगता था

आदमी कुछ अजीब लगता था, ज़िंदगी सा करीब लगता था, उन दिनों दिल का एक आलम था, मुश्किलों का असर ज़रा कम था , उसको देखे से चैन मिलता था, बस खुदा से वो ऐन मिलता था, अपनी दुनियाँ,बहार होती थी, आँख जब उससे चार होती थी, उसने अपना चलन बदल डाला, मेरे दिल का चमन कुचल डाला, बाद उसके तो फिर ये  होना था, अपने दामन को ही भिगोना था, यूँ सहर अब भी रोज़ होती है, उसकी आमद से खूब रोती है, दिल की कूव्वत जवाब देती है, उम्र भर का हिसाब लेती है... उर्मिला माधव... 4.1.2014.

कर पाया नहीं

आदमी दिल की ख़लिश को पार कर पाया नहीं, पाक़ दिल से हर किसीको प्यार कर पाया नहीं, ख़ुद को ओहदेदार समझा, दिल की खारिश के तह्त, फिर भी हस्ती को कभी मेयार कर पाया नहीं, उर्मिला माधव

चूड़ियां--- नज़्म

यादें---- रात भर मेरे मुहल्ले में अजब सा शोर था, यूँ लगा जैसे किसीकी चूड़ियों पर ज़ोर था, हाथ डाले हाथ में आपस में बातें कर रहे थे, एक घटिया रस्म को अंजाम देते डर रहे थे, कल सवेरे चूड़ियां कुछ लाई थी बाज़ार से, और पहन कर हाथ को देखा बहुत ही प्यार से बे-खबर थी,शाम तक क्या हादसा हो जाएगा, हर किसीका ध्यान उसकी चूड़ियों पर जाएगा, दर्द के रिश्ते कभी मिलते रहे जो प्यार से रस्म के मद्दे नज़र सब होगये बेकार से, मांग की सुर्खी हटा कर लोग समझाने लगे, ज़िंदगी की तल्खियत,बातों से दिखलाने लगे, देखने सुनने की उसको ताब थी बाक़ी कहाँ, थी बहुत हलकान दोज़ख होगया कैसा जहां, अब ज़माने के लिए बस एक मसला ख़ास था चूड़ियाँ पत्थर से फोड़ी जायेंगी एहसास था...... उर्मिला माधव... 10.11.2016

पनाहों में

ग़ज़ब दीवानगी है ये,मुहब्बत की पनाहों में, छलकने ही नहीं पाया ज़रा भी दर्द आहों में. बहुत रूपोश रख्खा था ज़माने भर की नज़रों से, जो दिल में दर्द रहता था उभर आया निगाहों में, हम अपना हाथ पेशानी पे रख के सोचते हैं अब, ज़माना हो गया हमको गए, दिलबर की बांहों में उर्मिला माधव

क़र्ज़दार हुए

वक़्त के हम भी क़र्ज़दार हुए, मरहले गम के दरकिनार हुए, दिल को ताक़त कहाँ धड़कने की, शुक्र है दोस्त.......ग़मगुसार हुए, ज़िन्दगी सुब्ह -ओ-शाम ढलती है, सब मगर इसके......परस्तार हुए, यूँ तो थकते क़दम भी रुकते रहे, चढ़ते दरिया के फिर भी पार हुए, सिर्फ़ शिद्दत....मुफ़ीद होती है, हौसले ग़र......ब-इख्तियार हुए..... --------------------------------- waqt ke ham bhi qarzdaar hue, marhale gam ke darqinaar hue, dil ko taaqat kahan dhadakne kii, shukr hai dost gamgusaar hue, zindagi subh-o-shaam dhalti hai, sab magar iske......parastaar hue, yun to thakte qadam bhi rukte hain, chadhte dariya ke phir bhi paar hue, sirf shiddat............mufeed hoti hai, hausle gar............ba-ikhtiyaar hue... उर्मिला माधव... 2.1.2014...

क़र्ज़दार हुए

वक़्त के हम भी क़र्ज़दार हुए, मरहले गम के दरकिनार हुए, दिल को ताक़त कहाँ धड़कने की, शुक्र है दोस्त.......ग़मगुसार हुए, ज़िन्दगी सुब्ह -ओ-शाम ढलती है, सब मगर इसके......परस्तार हुए, यूँ तो थकते क़दम भी रुकते रहे, चढ़ते दरिया के फिर भी पार हुए, सिर्फ़ शिद्दत....मुफ़ीद होती है, हौसले ग़र......ब-इख्तियार हुए..... --------------------------------- waqt ke ham bhi qarzdaar hue, marhale gam ke darqinaar hue, dil ko taaqat kahan dhadakne kii, shukr hai dost gamgusaar hue, zindagi subh-o-shaam dhalti hai, sab magar iske......parastaar hue, yun to thakte qadam bhi rukte hain, chadhte dariya ke phir bhi paar hue, sirf shiddat............mufeed hoti hai, hausle gar............ba-ikhtiyaar hue... उर्मिला माधव... 2.1.2014...

हंसते हैं हम

चार दिन की जिंदगानी....इसलिए हँसते हैं हम, लोग कहते हैं भंवर में...किसलिए फंसते हैं हम, अब न हमको चाहिए,दर्द-ए-मुहब्बत रंज-ओ-गम,  इसलिए कोई कमाँ दिल पर......नहीं कसते हैं हम, जगमगाती बस्तियां और ये चमकते जिस्म-ओ-जाँ,  गम की इन परछाईयों से.........दूर ही बसते हैं हम, -------------------------------------------------- chaar din kii zindgaani...............isliye hanste hain ham, sab ye kahte hain,bhanwar main kisliye fanste hain ham, ab na hamko chaahiye,dard-e-muhabbat,ranj-o-gam, isliye koi kamaan...........dil par nahin kaste hain ham, jagmgaati bastiyaan or........ye chamakte,jism-o-jaan, gam ki in parchhaiyon se........door hi baste hain ham.... उर्मिला माधव... 2.1.2014

मुहब्बत की पनाहों में

ग़ज़ब दीवानगी है ये,मुहब्बत की पनाहों में, छलकने ही नहीं पाया ज़रा भी दर्द आहों में. बहुत रूपोश रख्खा था ज़माने भर की नज़रों से, जो मेरे दिल में रहता था उभर आया निगाहों में, Urmila Madhav 2.1.2015

बात करते हो

क्यूँ ज़माने की बात करते हो, बिन मुहब्बत के,रात करते हो, रात आँखों में कल कटी मेरी, ख़त्म यूँ ही हयात करते हो, उर्मिला माधव.. 2.1.2017

हे भगवान

आपा-धापी हे भगवान!! दौड़ा-भागी हे भगवान!! क्या सच में इंसान यही? खींचा-तानी हे भगवान!! एक दूजे के कान भरे, काना फूसी हे भगवान !! दीवारों की मजबूती? ताका-झांकी हे भगवान !! मक्कारी का रंग अजब, धोखे बाज़ी हे भगवान !! सीधा रस्ता है मुश्किल, टोका-टाकी हे भगवान!! बिन पैसे बाज़ारों में, गहमा-गहमी हे भगवान!! तेरे नाम की दुनियां में? ऐसी-तैसी हे भगवान!! उर्मिला माधव... 17.5.2015...

जारी हुई लड़ाई

रोज़े अज़ल से आख़िर जारी हुई लड़ाई, अब तक भी लड़ रहे हैं, हारी हुई लड़ाई, मर्दाना हस्तियों को लड़ने का ग़म नहीं है, दुनियां की मस्लहत से भारी हुई लड़ाई, नुकसान इक हुआ है, पाबंदिये तबस्सुम, कुछ इस तरह ज़हन पर तारी हुई लड़ाई, उर्मिला माधव