बे ख़बर को दे ख़बर
मैं हकीक़त ज़िन्दगी की जानना चाहूं अगर,
या ख़बीरू अख्नबिर नी बे-खबर को दे खबर,
ढूंढती फिरती हूँ रस्ता जा-ब-जा औ दर-ब-दर,
या ख़बीरू अख्नबिर नी बे-खबर को दे खबर,
बदगुमानी,बद मिजाज़ी क्यूँ हुई है पुर असर,
या ख़बीरू अख्नबिर नी बे -खबर को दे खबर,
क्यूँ तमाशा है यहाँ जब जिंदगी है मुख़्तसर,
या ख़बीरू अख्नबिर नी बे -खबर को दे खबर,
बादशाहत के लिए क्यूँ मर रहा इतना बशर,
या ख़बीरू अख्नबिर नी बे -खबर को दे खबर....
उर्मिला माधव...
31.1.2014..
या ख़बीरू अख्नबिर नी...
ऐ खबर रखने वाले,मुझे खबर से आगाह फरमा ...
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