क्यों नहीं रहती

एक बार फिर से दिल यही कहना चाहता है। ..

मुझको परवाह क्यों नहीं रहती ?
लब पे कोई आह क्यों नहीं रहती?

कोई इज़हार-ए-इश्क़ करता रहे,
दिल में कोई राह क्यों नहीं रहती ?

भाते रहते हैं कितने चेहरे मगर,
कोई भी चाह क्यों नहीं रहती?

अपनी मर्ज़ी से ख़्वाब बुनती हूँ,
हस्ब-ए-इस्लाह क्यों नहीं रहती?

हुस्न-ए-मंज़र से भी मुतास्सिर हूँ,
ज़ेहन में वाह क्यों नहीं रहती ?

सबको है फ़िक्र दीन-ओ-दुनियां की,
मुझको लिल्लाह क्यों नहीं रहती?
उर्मिला माधव,
6.11.2016

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