देश के कोने कहाँ हैं--- नज़्म
ये बताओ देश के कोने कहाँ हैं?
मुझको लगता है कोई कोना नहीं है
और जो होगा भी तो खाली नहीं है,
एक कोने में सभी माऐं खड़ी हैं,
दूसरे कोने में कुछ लाशें पड़ी हैं,
तीसरे कोने में क़ानूनी हिफाज़त,
और वतन के रहनुमाओं की नफ़ासत,
नौजवानों की उफनती सी बग़ावत,
जिस्म की नक्काशियों पर कुछ इशारे,
टूटती दीवार के टूटे सहारे,
हाथ में कासा लिए ग़ैरत हमारी,
क्यों नहीं समझेंगे सब,हमको भिखारी?
चार कोनों में बचा है एक बाकी,
इसमें गुंजाईश नहीं बिलकुल हवा की,
रोज़ क्यों होती है ये मरदम शुमारी,
इसके कुछ मानी अगर होते तो क्या था..!!
सब के सब देखो नतीजे सामने हैं,
हर किसीको ग्यारह बच्चे पालने हैं...।।
उर्मिला माधव.....
8.1.2016..
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