इधर-उधर

ज़िंदगी के रास्ते में,सब इधर-उधर गए,
आस-पास चल रहे थे वो किधर-किधर गए?

ज़लज़लों की धार से,न बच सका कोई कहीं,
साथ वाले काफिले भी,सब बिखर बिखर गए,

बात ख़ास ये रही कि,उलझनें बनी रहीं,
मुश्किलों की मार से बहुत सिहर-सिहर गए,

जो चराग़ आँधियों में जल सके जला किये,
तीरगी का ज़ोर था कि,हम जिधर-जिधर गए,

शाख-शाख जल रही थी,जंगलों की आग से,
देखते ही रह गए कि जल शजर-शजर गए,
उर्मिला माधव...
21.1.2014

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