आसमानों तक

सायबानों से आसमानों तक,
अपना चर्चा रहा ज़ुबानों तक,

दश्त-ओ-दहशत से कौन उलझेगा,
हमने ख़ुद को रखा मकानों तक,

वो तो गरदन हलाक कर देते,
बात उलझी रही निशानों तक,

हमने वो राह ही बदल डाली,
जो के टलती रही बहानों तक,

अपना उनवान ही अलहदा है,
इसको रहना ही है मुहानों तक..

अपनी आदत है सर उठाने की,
इसको झुकना भी है तो शानों तक,
उर्मिला माधव..
19.1.2017

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge