बहुत ख़ूब है

माहपार-ए-दरख्शां बहुत खूब है, 
प्यार मेरा मगर तुमसे मंसूब है,

जानना है ज़रूरी सुनो दीदा वर, 
बा-वफाई मुहब्बत का उस्लूब है 

आफरीं-आफरीं मेरा दीवाना पन,
लोग कहते हैं वो देखो मज्जूब है,

आशिकी का सिला मर्हबा,मर्हबा,
कैसे झुठलायेगे गर ये मक्तूब है,

तार दामन के देखेंगे बिखरे अगर,
लोग कहते फिरेंगे कि मत्लूब है,

आशिक़ी को है दरक़ार जिंदादिली, 
जीतेजी मर गया,वो जो मग्लूब है, 
उर्मिला माधव...
16.1.2014.

माहपार-ए-दरख्शां---उगता हुआ चाँद ,
दीदावर------देखने वाले,
उस्लूब---आचरण 
आफरीं--- वाह-वाह ..
मज्जूब---देखने में पागल लेकिन परमहंस 
मक्तूब--- लिखा हुआ,
मत्लूब---प्रेमी,
मग्लूब---ओंधा गिरा हुआ...

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge