अटका हुआ है

जिस्म का ये बोझ कब हल्का हुआ है,
जिल्द बनकर रूह से चिपका हुआ है,

आईना सच बोलता है फितरतन ही,
बेसबब ही हर जगह रुसवा हुआ है,

दश्त से गुज़रे तो ख़ुद को छोड़ आए,
ज़ेह्न है के आज तक अटका हुआ है,

इब्तिदा है क्या अभी से सोच लें हम,
रोज़े अव्वल एक ही सजदा हुआ है,
उर्मिला माधव

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