5 ग़ज़लें
1
आजकल के लोग कुछ ज़्यादः सयाने हो गये,
साल बेशक हो नया पर हम पुराने हो गए
रौशनी बारूद की है,चार सू रंग-ए-क़फ़न,
आदमी की ज़िन्दगी में कितने ख़ाने हो गए,
इक बिखर जाता है,खींचें,ग़र सिरा हम दूसरा,
क्या कहें दामन में अब इतने दहाने हो गए,
होगये खामोश,दुनियां के नज़ारे देख कर,
लोग ये समझा किये के हम दिवाने हो गए,
हमने जब दस्तार रख दी,मंज़िलों के छोर पे,
बस फ़लक़ के साए में,अपने ठिकाने हो गए,
हम अज़ल से ही रहे बस,इन्तेहाई सादा दिल,
दह्र की अय आंधियो ,हम क्यूँ निशाने होगये?
#उर्मिलामाधव...
2
ये मेरी हस्ती है और मैं हूँ जनाब,
आपके कहने से होगी क्यूँ ख़राब,
देख कर ऐब-ओ-हुनर इनसान के,
क्या बजाते फिरते हो ये मुंह जनाब,
मैं भी ग़र कहने पे जो आ जाऊं तो,
आप क्या दे पायेंगे फिर यूँ जवाब,
आप भी अपना गिरेबां झाँक लें,
तब समझ में आएगा,लुब्बे-लुवाब,
अपने हाथों से मसल कर आबरू,
क्यूँ बढ़ाते हैं मुसलसल यूँ अज़ाब,
क्यूँ किसीकी ठोकरों पर हो जहां,
आप ही को समझे कोई,क्यूँ नवाब...
#उर्मिलामाधव
3
khwahishon ke rang main doobe huye,
jii rahe hain log sab oonghe huye,
ab kahan ho,kaise ho,kya haal hai,
biit jaayen sadiyan bin poochhe huye,
mahfilon main baithte to hain zaroor,
muskuraate hoth,dil roothe huye,
waah-waah kya baat hai,kya sher hai,
daad haazir,lab magar,sookhe huye,
aajkal ye hii masheenii taur hai,
muskuraaye,chal diye,rookhe huye,
#उर्मिलामाधव...
4
जब दर्द से मुक़ाबिल होते हैं हम बहुत,
सब लोग सोचते हैं,रोते हैं हम बहुत,
अपना चलन हमेशा कुछ ख़ास ही रहा है,
महफ़िल के बीच हंसकर,खोते हैं हम बहुत,
साँसें जो मिल गई हैं,पूरी तो करनी होंगी
यूँ ही बार ज़िन्दगी का ढोते हैं हम बहुत
खुशियाँ गईं हमेशा ज़ख़्मों का रंग देकर,
ऐसे ही दाग़ अक्सर धोते हैं हम बहुत,
आंसू बहाये हमने तकिये में मुंह छुपाकर,
समझा ये हर किसी ने सोते हैं हम बहुत....
#उर्मिलामाधव
5
दिल को भाती है बहुत,गुल-ओ-चमन की खुश्बू
सबसे आला है मगर पाक़ ज़ेहन की ख़ुशबू
ये जुबां कुछ भी कहे,साफ़ नज़र आता है,
सबकी चाहत है फ़क़त,चैन-ओ-अमन की खुश्बू,
वो मिला आज मुझे,यूँ ही अबस कहने लगा,
याद क्यूँ आने लगी ख़ाक -ए- वतन की खुश्बू,
ये मुहब्बत है मगर इतना समझना है तुझे,
तुझसे आती है मुझे ख़ास बहन की खुश्बू ,
वो फसीलें भी सजाई जो कभी ख़ुद मैंने,
और वो रेहान,वो घर के सहन की खुश्बू,
होके काफ़ूर,उड़ी जाए,मुहब्बत की फ़ज़ा,
शाही दस्तार से अब आये कफ़न की खुश्बू.....
#उर्मिलामाधव...
6
क्या ख़बर तुझको,क्या हकीक़त है,
ज़िन्दगी ......मौत की ही आहट है,
यूँ मयस्सर हज़ार खुशियाँ हैं ,
पर कहीं इसमें कुछ मिलावट है,
मिलने वाले हज़ार मिलते हैं,
वो नहीं,जिसकी हमको चाहत है,
राम कहले रहीम कह ले पर,
रोज़-ए-महशर असल इबादत है,
एक तमाशा है जिंदगानी भी
जिसकी खातिर अज़ीम शिद्दत है,
जो न पैदा अगर हुआ होता,
कौन कहता के चल बुलाहट है?
#उर्मिलामाधव..
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