लोग सब वाह-वाह करते रहे,
हम हज़ारों गुनाह करते रहे,

जैसे भी हो सका जहां भर में,
इक मुहब्बत की चाह करते रहे,

मरने वालों को सब ने मरने दिया,
अपने जीने की राह करते रहे,

रोने-धोने से क्या गुज़र होती,
जीस्त को ख़्वाब गाह करते रहे,

सच्ची खुशियां कहाँ मयस्सर थीं,
झूठे ग़म से निबाह करते रहे,  

अपना जलवा बुलंद करने को,
ख़ुद से ख़ुद ही सलाह करते रहे,

तेरी दुनियां के सारे तुर्रम खां,
देख कर,आह-आह करते रहे,
उर्मिला माधव

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