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Showing posts from September, 2024

क्यों करूं परवाह बोलो

मैं किसीकी क्यूँ करूँ परवाह, बोलो, एक तरफ़ा कब निभी है चाह, बोलो, जानिब-ए-मंजिल मुझे जाना ही होगा, ज़िन्दगी भर क्यूँ तकूँ अब राह, बोलो, ज़िन्दगी को दर्द-ए-गम का वास्ता दूँ ? क्या वो आइन्दा न देगी आह, बोलो, जो मिले सौगात दे बस आंसुओं की, ये कहो कब तक करूं मैं वाह, बोलो, ज़िन्दगी मेरी में रख्खूँ या न रख्खूँ इसके मिटने पै भी लूँ इस्लाह बोलो? उर्मिला माधव... 29.9.2014..

याद किसीको आने वाला

याद बहुत ही आने वाला, ना जाने क्या करता होगा, नौ बज कर सैंतालिस तक तो मैंने उसको जगते देखा, उससे ज़्यादा जगने पर फिर, घर वालों से डरता होगा.. क्या-क्या करता होगा घर में शायद पढ़ता-लिखता होगा उसके कपड़े और किताबें, सब हर रोज़ बिखरता होगा, या फिर याद किसीको करके ठंडी आहें भरता होगा उर्मिला माधव

आदमी कुछ अजीब लगता था

एक नज़्म... आदमी कुछ अजीब लगता था, ज़िंदगी सा करीब लगता था, उन दिनों दिल का एक आलम था, मुश्किलों का असर ज़रा कम था , उसको देखे से चैन मिलता था, बस खुदा से वो ऐन मिलता था, अपनी दुनियाँ,बहार होती थी, आँख जब उससे चार होती थी उसने अपना चलन बदल डाला, मेरे दिल का चमन कुचल डाला, बाद उसके तो फिर ये होना था, अपने दामन को ही भिगोना था, यूँ सहर अब भी रोज़ होती है, उसकी आमद से खूब रोती है, दिल की कूव्वत जवाब देती है, उम्र भर का हिसाब लेती है... #उर्मिलामाधव... 28.9.2015

कोई मुद्दआ नहीं आएगा

है ये मेरा तेरा मुआमला,  कोई दूसरा नहीं आएगा, जहां सिर्फ़ दिल का विसाल है, कोई मुद्दआ नहीं आएगा, मुझे कब किसीसे गिला हुआ मेरा घर है ग़म के पड़ोस में मुझे ग़म ने कर दी है इत्तिला, कोई ज़लज़ला नहीं आएगा, उर्मिला माधव

जो हुआ अच्छा हुआ

इम्तिहाँ है ज़िन्दगी तो जो हुआ अच्छा हुआ, ये ही तो बेचारगी है,वक़्त कब किसका हुआ? टूटना दिल का हुआ मंज़ूर जब हर हाल में, रंज क्या करना भले झूठा हुआ सच्चा हुआ, #उर्मिलामाधव... 26.9.2015

दिल तोड़ा होगा

जब तूने दिल तोड़ा होगा, कैसे तुझको छोड़ा होगा, तनहाई में अक्सर जाकर, चौखट पै सर फोड़ा होगा, बाँयां हाथ जिगर पै रखकर,  दिल का दर्द निचोड़ा होगा,  चाहे जितना ग़म हो तुझको,  मुझ से तो पर थोड़ा होगा, तुझे भुलाने की खातिर ही, खुद को खुद से जोड़ा होगा, दिल पर दाग़ लगाने वाले, तुझसा कौन निगोड़ा होगा..... उर्मिला माधव.... 25.9.2014....

क़ीमत क्या है

उसके इनकार या इक़रार की क़ीमत क्या है, दिल से संजीदा नहीं,प्यार की क़ीमत क्या है, बिल शुबह झूठ के कुछ ख़ास कसीदे भेजे, ऐसे मतलब से बने यार की क़ीमत क्या है, जिसकी बुनियाद रखी, तुमने महज़ मतलब से, फिर भला जीत की या हार की क़ीमत क्या है, _________________________________ Uske Inkaar Ya Iqraar Ki Keemat Kya HaI, Dil Se Sanjida NahiN Pyar Ki Qeemat Kya Hai, Bil Shubah Jhuth Ke Kuchh Khaas Kseede Bheje, Aise Matlab Se Bane Yaar Ki Qimat Kya Hai, Jiski Buniyad Rakhi Tumne Mahaz Matlab Se, Phir Bhala Jeet Ki Ya Haar Ki Qimat Kya Hai, उर्मिला माधव, 23.9.2018

रंजो ग़म हमारा है

ख़ताएँ आपकी हैं रंज ओ ग़म हमारा है, समझ सकें तो यही ख़ास इक इशारा है. हमें है ख़ब्त यूं ही ग़मज़दा ही रहने का, तुम्हीं बताओ तुम्हें हमने कब पुकारा है? किसी भी वक़्त तुम्हें वक़्त ही नहीं रहता, तुम्हें समझ ही नहीं इसमें जो ख़सारा है.. हमारे पास है परचम फ़क़त बुलंदी का, हमारी उम्र तो ख़ल्वत का इक इदारा है.. हमारी आंख में ठहरा हुआ है इक सागर, मज़ा तो ये है यही ज़ीस्त का सहारा है.. उर्मिला माधव

हमारी नज़र से नज़र मत मिलाना

हमारी नज़र से नज़र मत मिलाना, वगरना तुम्हें डूब जाना पड़ेगा, अगर छोड़ जाओ तो मुड़ कर न आओ तुम्हें फ़िर मियां, टूट जाना पड़ेगा, उर्मिला माधव

रंजो ग़म हमारा है

ख़ताएँ आपकी हैं रंज ओ ग़म हमारा है, समझ सकें तो यही ख़ास इक इशारा है. हमें है ख़ब्त यूं ही ग़मज़दा ही रहने का, तुम्हीं बताओ तुम्हें हमने कब पुकारा है? किसी भी वक़्त तुम्हें वक़्त ही नहीं रहता, तुम्हें समझ ही नहीं इसमें जो ख़सारा है.. हमारे पास है परचम फ़क़त बुलंदी का, हमारी उम्र तो ख़ल्वत का इक इदारा है.. हमारी आंख में ठहरा हुआ है इक सागर, मज़ा तो ये है यही ज़ीस्त का सहारा है.. उर्मिला माधव

सोज़े ग़म पे वार दी

आंसुओं के साथ मैने,ज़िंदग़ी गुज़ार दी, वक़्त की बला उतारी,सोज़े-ए-ग़म पै वार दी, बेबसी ऑ बेकसी में बेख़ुदी का आसरा, जब हुई ज़ियादती तो मग्ज़ से उतार दी.. किसलिए क़ुबूल हों दह्र तेरी नेमतें, कहीं कोई ख़ुशी मिली तो हाथ से बुहार दी, रास्ते बिखर गए तो होंठ अपने सीं लिए पर तड़प के रूह ने सदा भी बार-बार दी यूँ भी तो जिया है इसको बाज़ियों की शक्ल में, ज़िंदग़ी जुआ लगी तो ज़िंदग़ी भी हार दी, उर्मिला माधव...

इबादत से अगरचे हम

इबादत से अगरचे हम.....बहुत मंसूब होजाएं, तो लाज़िम है ज़माने की नज़र में खूब हो जाएं, किसी दिल में क़दम रखना भी कार-ए-पुख्ता कारा है, ज़रा नज़र-ए-इनायत हो......कि बस महबूब हो जाएं, हज़ारों जान से कुरबान होने पर भी क्या हासिल, मज़ा तो तब है जबकि......दर्द के उस्लूब होजाएं, हम अब भी आज भी अपने जिगर में ताब रखते हैं, अगर जो जिद पे आजाएं...तो बस मतलूब हो जाएं... उर्मिला माधव  २२.९.२०१३

ज़ुल्फ़ कांधों पे बिखराइये

ज़ुल्फ़ कांधों पै बिखराइये, बाद उसके इधर आइये , मुझसे कहने लगे दीदावर, चांदनी रुख पै ठहराइए, मुझको कहना पड़ा देखिये, मेरे रस्ते से हट जाइए  मेरी फ़ितरत ज़रा फ़र्क है, ऐसा हरगिज़ न फरमाइए, फ़ासले मुझको दरक़ार हैं, चलत-फिरते नज़र आइये उर्मिला माधव... 22.9.2014.....

कभी मेरी गली आना----नज़्म

बहुत देखा जहां जाना ,कभी मेरी गली आना, दर-ओ-दीवार गलियों के,बहुत सीलन भरे होंगे, मगर वो तीरगी के साए में, डरकर छुपे होंगे, जो बर्ग-ए-गुल मुख़ातिब हो,तो आंसू देखना उसके, बदन में आबले होंगे ,महज़ ग़म पूछना उसके, ये मेरी ज़िंदगी जो अब तलक पुर ख़ार ज़िन्दां है, मेरे ग़म से मेरे रब की भी दुनियां,ख़ास वीरां है, चमन वीरां,सहन वीरां,लगे रूह-ओ-ज़ेहन वीरां, बहे आँखों से जो दरिया लगे गंग-ओ-जमन वीरां, यहाँ आब-ओ-हवा शम्स-ओ-क़मर को दूर रखती है, मसर्रत के जहां में ख़ास कर माज़ूर रखती है , तो ज़ेरे आसमां लो रात भर तुम भी गुज़ारो तो, बड़ी शिद्दत से हिम्मत से सितारों को पुकारो तो, अगर आवाज़ ख़ाली लौट कर आये तो बतलाना, हुआ महसूस कैसा इस तरह,बेकार चिल्लाना, उर्मिला माधव

गुज़रता है

कोई जीता है, कोई मरता है हमपे अब कुछ नहीं गुज़रता है, जाने क्या-क्या न देखा आंखों ने, क्यों ज़हन मुश्किलों से डरता है? दिल तो पथ्थर का हो गया कब का, क्यों ये रह रह के आह भरता है, क्यों वही सूरमा हो दुनिया का, वो जो हर दिन गुनाह करता है, उर्मिला माधव

आग ग़ैरों ने लगाई

आग ग़ैरों ने लगाई बोलो इसका क्या करें, हार कर बैठें के या फिर हौसला ज़िंदा करें, ज़िन्दगी में सच है कोई साथ तो देता नहीं, ख़ुद-ब-ख़ुद उठ जाएँ ख़ुद ही रास्ता पूरा करें, ज़िन्दगी कुछ भी नहीं है एक सिवाए हादसा, फिर भी इन हालात से कुछ खूबियां पैदा करें, पाँव के छाले न देखें,ज़िन्दगी रख्खें रवाँ, ये न सोचें किसलिए अब रास्ता नापा करें, कौन यक़ता है यहाँ पर सब के सब हैं एक से, ख़ुद को अदना मान कर क्यूं दिल भला छोटा करें फ़र्ज़ को अंजाम देना है बहुत तरतीब से, हर नफ़स ही कीमती है वक़्त क्या ज़ाया करें.... उर्मिला माधव... 21.9.2016

घर के आले देखना

जब कभी पिछले रिसाले देखना, हंसने वालों के भी छाले देखना, मुस्कुराहट पर फ़क़त जाना नहीं, हो सके तो आह-ओ-नाले देखना, महफ़िलों औ-क़ह्क़हों के शोर में, आंसुओं वाले......निवाले देखना, कुछ फ़सीलें तो झड़ी होंगी मगर, रंग पर्दों के निराले.........देखना, बिन चरागों के वहीँ मिल जायेंगे, जाके उनके घर के आले देखना.... उर्मिला माधव.... 19.9.2014

जब ख़ुदा ने दह्र बनाया था

जब खुदा ने दहर बनाया था, मेरे हिस्से में तू ही आया था, तेरी जो उम्र एक अमानत थी, वक़्त ने उसको लूट खाया था, मेरी उम्मीद यूँ ही क़ायम थी, गो कि हर रोज़ घर सजाया था, शाम ढलने को जब भी होती थी, चाँद तारों को....घर बुलाया था, मेरी आँखें खुली-खुली ही रहीं, तू कभी लौट कर न आया था, कैसे मुझको यक़ीन हो कह दो,   मैंने पत्थर से दिल लगाया था, मुझसे दुनियाँ के लोग कहते हैं, तू ही तू मेरे दिल पै छाया था...  उर्मिला माधव... 18.9.2014...

हश्र देखा चाहते हैं

आग रख के बर्फ़ पे क्या हश्र देखा चाहते हैं, सब्र आख़िर किसलिए सब आज़माया चाहते हैं, अद्ल ख़ुद को मान कर ख़ुद फ़ैसला भी कर दिया, इसके मानी ये हुए सब क़ह्ऱ बरपा चाहते हैं, इक जुबां बंदी की हद तक ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ामोश थे, हर तरह से थक चुके अब घर को जाया चाहते हैं, इक निशाने हम हज़ारों तीर चारों सम्त से बस, थक चुके हैं ज़ेह्न-ओ-दिल और सर बचाया चाहते हैं, उर्मिला माधव

तूल देना मूर्खता है

अपनी इच्छा को निरंतर तूल देना, मूर्खता है और ये इच्छा कहाँ ले जाएगी क्या ये पता है? व्यर्थ का अभिमान करना, सर्वथा अनुचित ही तो है, हर किसीका मान रखना ये मनुज की सभ्यता है आपकी सामर्थ क्या है, आप पर निर्भर है ये सब व्यक्ति के अनुरूप ही व्यवहार करना दिव्यता है दिग्भ्रमित हो कर कहीं भी आचरण अनुचित न हो बस, नीतिसंगत वार्ता ही प्रेम की परिपूर्णता है  उर्मिला माधव

न काम हमारा निकला

तुझसे ऐ दिल न मगर काम हमारा निकला जो बुलंदी की हवाओं पे उड़े शाम ओ सहर, उनकी तह में भी कोई ख़ास इदारा निकला, हम जो मग़रूर रहे, ख़ुद को जुदा कर लेंगे, तुझसे ऐ दिल न मगर काम हमारा निकला, हमने अहबाब से जब ख़ूब गुज़ारिश करली, इब्ने दुश्मन ही मगर यार सहारा निकला, हम खड़े होके भंवर में ही जलाते थे चराग़, झुक के देखा तो बड़ी पास कनारा निकला, हमको कमरे में बहुत धुंध नजऱ आने लगी, डर के देखा तो कोई आम शरारा निकला, उर्मिला माधव

एक मुद्दत से मेरे पीछे पड़ा है

एक मुद्दत से मेरे पीछे पड़ा है, दर्द है के हर जगह आकर खड़ा है... रास्ते कुछ और भी हैं ...दुश्मनी के, ये बता तू किसलिए जिद पर अड़ा है? #उर्मिलामाधव... 16 .9.2015

रौशनी तो हो

 अपनी राह खुद चल लूँ,के इतनी रौशनी तो हो, हवा के साथ उड़ जाऊँ हवा में ज़िन्दगी तो हो, मिलाने हाथ आए हो, चलो,मंज़ूर भी कर लूँ , मगर दिल में तुम्हारे सादगी सी सादगी तो हो, उर्मिला मा5

आंखों की तुग्यानी नज़र आती है क्या?

आपको आंखों की तुग़यानी नज़र आती है क्या ? बेवज्ह भी यूँ किसीकी आंख भर आती है क्या ? हम तो हैं अनजान ये सब आप ही बतलाइये  आह की तह में ख़ुशी की हद भी दर आती है क्या ? मेरे सर की सरपरस्ती, सिर्फ़ रब करता है अब, ग़ैर की ख़ातिर मुहब्बत चलके घर आती है क्या ? उसको अपने वक़्त से आना है वो पाबंद है, उसको कितना भी पुकारें,मौत पर आती है क्या ? जब क़दम थक जाएंगे तो राह में पथ्थर भी हैं, कोई भी मंज़िल हो आख़िर पूछ कर आती है क्या ? उर्मिला माधव......

मिलने को आएगा शायद

फ़िर वो मिलने को आएगा शायद, कोई किस्सा सुनाएगा शायद, मुझसे बोला के ठहरो आता हूँ, क़त्ल ही करके जाएगा शायद, पहले तजवीज़ मौत की रख्खी, मर्सिया फ़िर सुनाएगा शायद, अब तआक़ुब में मारा फिरता है, घर को खंडहर बनाएगा शायद, मेरा रब भी किसीसे कम तो नहीं, रस्म अपनी निभाएगा शायद, उसकी तख़लीक़ है जहां सारा, वो ही करतब दिखाएगा शायद, जो भी आता है, उसको आने दो, आख़िरश मुड़ के जाएगा शायद, उर्मिला माधव, 15.9.2018

निभा ले जाएंगे

ज़ख़्म यूँ दिल के संभाले जायेंगे, कितने हैं गहरे खंगाले जायेंगे, चाहे जो हालात हों लेकिन सुनो, हर तरह से हल निकाले जायेंगे, गर ज़ुबां देदी तो बस देदी मियाँ, हम जुनूं ता हद निभा ले जायेंगे, उर्मिला माधव...

दूर होना चाहते हैं

आपसे हम दूर होना चाहते हैं, हम बख़ुद मजबूर होना चाहते हैं, ग़म भुलाने को मिलें हुज्जूम से, सोच लें, मशहूर होना चाहते हैं, घूमते हैं बस सरे बाज़ार हम जब ग़मों से चूर होना चाहते हैं उर्मिला माधव

कर पाएगा क्या?

कोई इस्तकबाल भी कर पायेगा क्या ? चलके दरवाज़े पै कोई आएगा क्या ? साथ लफ़्ज़ों के हुए हाज़िर यहाँ पर, कोई मेरे संग कुछ-कुछ गायेगा क्या ? है तख़इयुल चाँद का पर हूँ ज़मीं पै,  ख़्वाब के संग और कोई जाएगा क्या ? आईने के नाम पर पत्थर दिखा दे, इस तरह का ज़ुल्म कोई ढाएगा क्या? लोग इक दरवीश को जब दें सलामी, तब कोई हिस्सा तुम्हारा खायेगा क्या?  उर्मिला माधव.... 9.9.2014...

ग़म नमूदार हुए जाते हैं

ग़म नमूदार हुए जाते हैं, हम बहुत ख़्वार हुए जाते हैं, बर्क दुनियां पै गिर गई देखो, दर भी सब दार हुए जाते हैं, कांच का घर है तीरगी के तले, वक़्त की हार हुए जाते हैं, हाथ को हाथ भी नहीं दिखता, और क़दम बार हुए जाते हैं, बस सहारे हैं इन हवाओं के, जिससे कुछ पार हुए जाते हैं  उर्मिला माधव... 9.9.2017

दिन में शमा जलाके रखी

दिन में शमां जला के रखी, शाम के लिए, क्या ख़ैरियत हवा भी चली नाम के लिए, महफ़िल के रंग उड़ने लगे, आपके बग़ैर, दिन हो गया तो जाने लगे, काम के लिए, दिल का मुआमला था कई बोलियां उठीं, किसको थी फ़िक़्र पूछे कोई दाम के लिए, सूरज तेरी तपिश में रहे, उम्र भर को हम, भारी पड़ा क़दम जो उठा बाम के लिए, उसकी नज़र से पी जो कभी आख़री शराब, बस हाथ फ़िर उठे ही नहीं, जाम के लिए, उर्मिला माधव.. 9.9.2918

बुलाया करते हैं

हम अपने आप को हरदम जलाया करते हैं, सो आग वालों को रस्मन बुलाया करते हैं, अभी तो जिस्म से कितना हिसाब बाक़ी है, तो इसमें ज़ख़्म का गुलशन खिलाया करते हैं, अगरचे फूल भी मिलते हैं घिर के ख़ारों से, हम ऐसे शख़्स तो शबनम चुराया करते हैं, समझ में आ गया हम को के दुनिया फ़ानी है, सो नस्ले नौ को भी मदफ़न दिखाया करते हैं, उर्मिला माधव 9.9.2019

मेरी थी

जैसी भी थी नातेदारी मेरी थी, ढोते रहने की लाचारी मेरी थी, मेरे बाद हक़ीक़त जानोगे, अपने घर से हर बेज़ारी मेरी थी, झेल रहे थे लोग ये मैं भी जान गई, सुनते रहने की बेदारी मेरी थी, उर्मिला माधव

log kahte hain

लोग कहते हैं.....भई,नवाजिश है, ये भी तो एक तरह की साज़िश है, लफ्ज़ शीरीं जुबां.........शहद जैसी, दिल के अन्दर अजब सी खारिश है,  जब कभी ये.....उफ़क कहीं रोया, हंस के कहते हैं लोग.....बारिश है, हम से मिलना तो साफ़ दिल लेके, अपनी हर इक से ये..गुजारिश है... उर्मिला माधव.... 8.9.2014...

dil dukhata rahega

ख्वाजा मीर दर्द सा'ब की तर्ज़ पर ,ब शुक्रिया--- ------------------------------------------- अगर इस क़दर दिल दुखाता रहेगा, यक़ीनन ही बस आता-जाता रहेगा, तवज्जो को जाने न जाने तगाफ़ुल, फ़क़त दीदा-ए- तर दिखाता रहेगा  भटकती फ़ज़ाओं की तनहाइयों में  जबीं कोई कब तक झुकाता रहेगा, अजब खेल देखा ज़माने में दिल का, जो ठुकरा दे उस पर ही आता रहेगा, जहां पर कभी कोई इज्ज़त न पायी, उसी दर पे रह-रह के जाता रहेगा, उर्मिला माधव ... 8.9.2015

adab ab sabhi ke

अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं, बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए हैं सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको, जवां क्या हुए,........बे-वफ़ा हो गए हैं, वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना, किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं, उर्मिला माधव... 23.10.2014

raah ji chalni hai

राह जो चलनी है इसमें खूबियाँ कोई नहीं, रूह-ए-खुद को छोड़ के वक़्त-ए-गिरां कोई नहीं, पथ्थरों के आदमी हैं और दहर जलता हुआ, चिलचिलाती धूप है ऑ आशियाँ कोई नहीं, और कितना आज़माना,जो हुआ वो खूब है, तुम वही हो,हम वही राज़-ए-निहां कोई नहीं, है नया कुछ भी नहीं क्यूं इस क़दर हैरां हुए, साथ चलने को तुम्हारे,अय मियाँ कोई नहीं, सामने मक़्तल हुआ लो फ़िक़्र से खारिज़ हुए बस यही रस्ता है...जिसके दरमियाँ कोई नहीं..... उर्मिला माधव, 7.10.2014

bazm se izzat uchhal kr

वो जा चुके हैं बज़्म से,इज्ज़त उछाल कर, मैंने भी रख दिया है अभी गम संभाल कर, ख़ुद ही जवाब दूं ये कहाँ फिक्र है मुझे, हालात इसको लायेंगे बाहर निकाल कर कारीगरी अजब है मगर वक़्त की जनाब, कितनों को इसने पी लिया शीशे में ढाल कर, उर्मिला माधव....

kuchh nahin hoga

फ़िक़्र करने से कुछ नहीं होगा, आह भरने से कुछ नहीं होगा, दिल में इक इन्कलाब है तो है, मुफ़्त डरने से कुछ नहीं होगा, राह भी इन्तिख़ाब करके चल, बात करने से कुछ नहीं होगा, इक सहर खुशनुमा मुकाबिल है, यूँ सिहरने से कुछ नहीं होगा, मुस्कुरा, ये भी मन दुरुस्ती है, जीने मरने से कुछ नहीं होगा, हादिसे आदतों में शामिल कर, यूँ बिखरने से कुछ नहीं होगा.... उर्मिला माधव... 9.10.2014...

ज़ख़्म के दाग़

भीड़ में किसलिए खड़े होंगे, वो जो तन्हाई से लड़े होंगे, राह को नाप कर भी क्या होगा, यूं भी ज़ख्मों में ख़म पड़े होंगे, राह को नाप कर भी क्या होगा, यूं भी ज़ख्मों में ख़म पड़े होंगे, तंज़ के दाग़ इतने गहरे हैं  दिन ब दिन वो भी कुछ बड़े होंगे

बड़े होंगे

भीड़ में किसलिए खड़े होंगे, वो जो तन्हाई से लड़े होंगे, राह को नाप कर भी क्या होगा, यूं भी ज़ख्मों में ख़म पड़े होंगे, वो तो हर हाल में बड़े होंगे

तन्हा ही चला करते हैं

हम बहुत देर तक तन्हा ही चला करते हैं, उस प उस वक़्त ही तारे भी ढला करते हैं, अपनी दुनिया में मुख़ालिफ़ हैं बहुत दूर तलक, उस पे हर हाल में इस दिल को ख़ला करते हैं, हमने इस आग को नज़रों से बहुत देखा है, जाने वो कौन हैं जो ग़म से टला करते हैं, उर्मिला माधव

हम सितारों तक पहुंच भी जाएंगे

हम सितारों तक पहुँच भी जायेंगे तो क्या करेंगे, अपनी खातिर कौनसा फिर रास्ता हम वा करेंगे, उसके आगे ख्वाहिशें ही सिर्फ उड़ कर जा सकेंगी, ग़र ज़ियादः बढ़ गईं तो ,उससे भी तौबा करेंगे, ज़िन्दगी की आपा-धापी और अलहदा सा चलन, इससे तो बेहतर है"अपने आप" को सजदा करेंगे, कौन इस दुनिया में कुछ भी दे सका है ये बताओ, दिल को सब पामाल करके बस मज़ा लूटा करेंगे, जिसको देखो खुद को ही यकता समझता है यहाँ, जो समझता है वो समझे हम समझ कर क्या करेंगे... उर्मिला माधव... 6.9.2017

रू ए बिस्मिल से निकल

चल दफ़ा हो बेबसी अब रू-ए-बिस्मिल से निकल, मुझको सुनना कुछ नहीं है बस मेरे दिल से निकल, तयशुदा है, वक़्त के गिरदाब में घिरना ही है, इसलिए ख़ुद रास्ता चुन, बच के साहिल से निकल, सोच मत चढ़ना शुरू कर सीढियां मत कर शुमार मंज़िलें फिर और भी हैं पहली मंज़िल से निकल, देख मत हर सम्त मुड़ कर हौसला गिर जाएगा, छोड़ दामन बेकसी का, ज़ह्न-ए-जाहिल से निकल, दह्र की मायूसियां चलने न देंगी इक क़दम, उठ खड़ा हो ज़िंदा हो जा, ग़म के हाइल से निकल, उर्मिला माधव, 6.9.2018

चल दफ़ा हो बेबसी

चल दफ़ा हो बेबसी अब रू-ए-बिस्मिल से निकल, मुझको सुनना कुछ नहीं है बस मेरे दिल से निकल, तयशुदा है, वक़्त के गिरदाब में घिरना ही है, इसलिए ख़ुद रास्ता चुन, बच के साहिल से निकल, सोच मत चढ़ना शुरू कर सीढियां मत कर शुमार मंज़िलें फिर और भी हैं पहली मंज़िल से निकल, देख मत हर सम्त मुड़ कर हौसला गिर जाएगा, छोड़ दामन बेकसी का, ज़ह्न-ए-जाहिल से निकल, दह्र की मायूसियां चलने न देंगी इक क़दम, उठ खड़ा हो ज़िंदा हो जा, ग़म के हाइल से निकल, उर्मिला माधव, 6.9.2018

नज़्म अश्कों से

मेरे अश्क़ों से मिले हो क्या कभी तुम ? मैं तुम्हें अश्कों से मिलवाने यहाँ तक लाई हूँ, जाने कितनी सीढियां चढ़के यहाँ तक आई हूँ, अनगिनत रंगों से लिख्खे वरक पढ़के आई हूँ  याद आता ही नहीं दिन,कब कहाँ हंस पाई हूँ ; ; एक वरक है लाल रंग का,खून से लिख्खा हुआ, यक-ब-यक देखा कभी बाज़ार में फेंका हुआ, क्या बताऊँ बस यही पहचान मेरी रह गई  हंस गई मैं दिल मेरा बे-काम का सिक्का हुआ, ; ; खैर छोडो दूसरे रंग से भी मिलवाउंगी अब, ये यहाँ देखो हरे रंग से बहुत लिख्खा है सब, सब्ज़ पत्तों से ढका सा एक बचपन है मेरा, भूल ही जाती हूँ इसको क्यूँ कहाँ छोड़ा ऑ कब, ; ; रंग जवानी का लिखा है,जो बहुत पुर कर्ब था, जिस जगह रहती थी मैं, वो घर नहीं इक क़र्ज़ था, छोलदारी ही समझ कर जिसमें रहना था मुझे, जैसे मुझको ज़िन्दगी जीने में कोई हर्ज था, ; ; खैर पीला रंग भी आना ज़रूरी था मगर, इक सफेदी ने यक़ायक़ कर दिया पूरा सफ़र, मुझको पूरी उन्सियत से ...देखते थे दीदावर  कुछ नहीं बाक़ी बचा लो होगया सब दर-ब-दर, ; ; अब तो कोई रंग ही बाक़ी कहाँ है ज़ीस्त में, होगया लो खत्म करती हूँ यहां फेहरिस्त मैं, उर्मिला माधव--- 2.9.2015...

दर्द का आलम रहा

मेरे घर में एक दिन जब ..........दर्द का आलम रहा, आने-जाने वालों का इक...... ख़ास तबक़ा कम रहा, चश्म-ए-गिरयां एक तरफ़ कर,बस यही सोचा फ़क़त, अब से मैं तनहा चलूँगी,....... ग़र चे दम में दम रहा…. उर्मिला माधव, 2.9.2017

जीना आगया

जिसपे दुनियां को पसीना आ गया, मुझको आसानी से जीना आ गया, है अजब सा वाक़या पर सच भी है, ग़ैर के ज़ख्मों को सींना आ गया, मेरी आँखों में अजब तासीर थी, चल के साहिल पे सफ़ीना आ गया, लोग छाती पीट कर क्यूँ रो गये क्या मोहर्रम का महीना आ गया? ज़िन्दगी पाकर सभी यूँ खुश हुए, जैसे हाथों में नगीना आ गया... जब से देखा शाम-ए-हश्र-ए-आफ़ताब, बस के तबियत में करीना आ गया.. उर्मिला माधव, 2.9.2017

बिखरते हुए देखा

Apne sirahane khwab ko marte hue dekha, Jalti shama ko dar ke siharte  hue dekha अपने सिरहाने ख़्वाब को,मरते हुए देखा, जलती शमअ को डरके,सिहरते हुए देखा, Aahat thi siskiyon ki mere jism-o-zehan men Kis-kis ki justju ko,bikhrte hue dekha, आहट थी सिसकियों की मेरे जिस्म-ओ-ज़ेहन में किस-किसकी जुस्तजू को बिखरते हुए देखा.. उर्मिला माधव,