नज़्म अश्कों से
मेरे अश्क़ों से मिले हो क्या कभी तुम ?
मैं तुम्हें अश्कों से मिलवाने यहाँ तक लाई हूँ,
जाने कितनी सीढियां चढ़के यहाँ तक आई हूँ,
अनगिनत रंगों से लिख्खे वरक पढ़के आई हूँ
याद आता ही नहीं दिन,कब कहाँ हंस पाई हूँ
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एक वरक है लाल रंग का,खून से लिख्खा हुआ,
यक-ब-यक देखा कभी बाज़ार में फेंका हुआ,
क्या बताऊँ बस यही पहचान मेरी रह गई
हंस गई मैं दिल मेरा बे-काम का सिक्का हुआ,
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खैर छोडो दूसरे रंग से भी मिलवाउंगी अब,
ये यहाँ देखो हरे रंग से बहुत लिख्खा है सब,
सब्ज़ पत्तों से ढका सा एक बचपन है मेरा,
भूल ही जाती हूँ इसको क्यूँ कहाँ छोड़ा ऑ कब,
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रंग जवानी का लिखा है,जो बहुत पुर कर्ब था,
जिस जगह रहती थी मैं, वो घर नहीं इक क़र्ज़ था,
छोलदारी ही समझ कर जिसमें रहना था मुझे,
जैसे मुझको ज़िन्दगी जीने में कोई हर्ज था,
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खैर पीला रंग भी आना ज़रूरी था मगर,
इक सफेदी ने यक़ायक़ कर दिया पूरा सफ़र,
मुझको पूरी उन्सियत से ...देखते थे दीदावर
कुछ नहीं बाक़ी बचा लो होगया सब दर-ब-दर,
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अब तो कोई रंग ही बाक़ी कहाँ है ज़ीस्त में,
होगया लो खत्म करती हूँ यहां फेहरिस्त मैं,
उर्मिला माधव---
2.9.2015...
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