मेरी थी

जैसी भी थी नातेदारी मेरी थी,
ढोते रहने की लाचारी मेरी थी,

मेरे बाद हक़ीक़त जानोगे,
अपने घर से हर बेज़ारी मेरी थी,

झेल रहे थे लोग ये मैं भी जान गई,
सुनते रहने की बेदारी मेरी थी,
उर्मिला माधव

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