हश्र देखा चाहते हैं
आग रख के बर्फ़ पे क्या हश्र देखा चाहते हैं,
सब्र आख़िर किसलिए सब आज़माया चाहते हैं,
अद्ल ख़ुद को मान कर ख़ुद फ़ैसला भी कर दिया,
इसके मानी ये हुए सब क़ह्ऱ बरपा चाहते हैं,
इक जुबां बंदी की हद तक ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ामोश थे,
हर तरह से थक चुके अब घर को जाया चाहते हैं,
इक निशाने हम हज़ारों तीर चारों सम्त से बस,
थक चुके हैं ज़ेह्न-ओ-दिल और सर बचाया चाहते हैं,
उर्मिला माधव
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