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Showing posts from September, 2020

नज़्म--बहुत देखा जहां जाना

बहुत देखा जहां जाना ,कभी मेरी गली आना, दर-ओ-दीवार गलियों के,बहुत सीलन भरे होंगे, मगर वो तीरगी के साए में, डरकर छुपे होंगे, जो बर्ग-ए-गुल मुख़ातिब हो,तो आंसू देखना उसके, बदन में आबले होंगे ,महज़ ग़म पूछना उसके, ये मेरी ज़िंदगी जो अब तलक पुर ख़ार ज़िन्दां है, मेरे ग़म से मेरे रब की भी दुनियां,ख़ास वीरां है, चमन वीरां,सहन वीरां,लगे रूह-ओ-ज़ेहन वीरां, बहे आँखों से जो दरिया लगे गंग-ओ-जमन वीरां, यहाँ आब-ओ-हवा शम्स-ओ-क़मर को दूर रखती है, मसर्रत के जहां में ख़ास कर माज़ूर रखती है , तो ज़ेरे आसमां लो रात भर तुम भी गुज़ारो तो, बड़ी शिद्दत से हिम्मत से सितारों को पुकारो तो, अगर आवाज़ ख़ाली लौट कर आये तो बतलाना, हुआ महसूस कैसा इस तरह,बेकार चिल्लाना, उर्मिला माधव

कांटों से जुमला

लिखा हमने फूलों पे काँटों से जुमला, चुभन कैसी लगती है तुमको?बताना, जो लफ़्ज़ों से अब तक निकलती रही है, जलन कैसी लगती है तुमको??बताना , फिजाओं मैं उठता धुंआ भी तो होगा ?? घुटन कैसी लगती है तुमको?बताना , जो शम्मा अभी तक सिरहाने जली है, तपन कैसी लगती है तुमको??बताना जो छाले.......हजारों की तादाद मैं थे, सडन कैसी लगती है तुमको??बताना.... उर्मिला माधव... २८.९.२०१३

उस समय घर लौट आना

उस समय घर लौट आना.... ------------------------------- खुद को दिल मजबूर पाए, जब  बहुत ही छटप टा ये, कुछ न हरगिज़ याद आये, उस समय घर  लौट आना, राह की तनहाइयां हों, रात की गहराइयाँ हों, ज़ह्र सी पुरवाइयां हों, उस समय घर लौट आना, उर्मिला माधव... 28.9.2014

जज़्बात मेरे

उम्र भर को जुड़ गए हैं,आपसे जज़्बात मेरे. साथ बस देते नहीं हैं,आजकल हालात मेरे, ख़ुश्क आँखों का वो मंज़र देख कर ऐसा हुआ  अश्क़ लानत दे गए हैं क्या कहूँ कल रात मेरे, सोचती हूँ आख़िरश बाहर निकलकर क्या करूँ  दम-ब-दम जलती ज़मीं ऑ सर पै ये बरसात मेरे, दोनों हाथों से उठा कर फेंकती रहती हूँ बाहर, हो गई घर में ग़मों की रात-दिन इफरात मेरे,  भूल सी जाती हूँ मैं सब,मेरी दुनियां क्या हुई ? वहशतें सी कह रही हैं कान में कुछ बात मेरे... #उर्मिलामाधव, 8.9.2015..

लेजाएँ

हम तो कुछ देर और बैठेंगे, आप महफ़िल उठाके लेजाएँ, हम तो अशआर नज़्र करते हैं आप बस दिल बचाके ले जाएं हम तो राही हैं उम्र भर वाले, आप मंज़िल हटा के ले जाएँ अब सफ़ीने के पांव जमने लगे, आप साहिल घुमा के ले जाएं ख़ून का रंग जम गया है मगर, आप क़ातिल छुपा के ले जाएं, उर्मिला माधव

इशारा है

ख़ताएँ आपकी हैं रंज ओ ग़म हमारा है, समझ सकें तो यही ख़ास इक इशारा है. हमें है ख़ब्त यूं ही ग़मज़दा ही रहने का, तुम्हीं बताओ तुम्हें हमने कब पुकारा है. किसी भी वक़्त तुम्हें वक़्त ही नहीं रहता, तुम्हें समझ ही नहीं इसमें जो ख़सारा है.. हमारे पास है परचम फ़क़त बुलंदी का, हमारी उम्र तो ख़ल्वत का इक इदारा है.. हमारी आंख में ठहरा हुआ है इक सागर, मज़ा तो ये है यही ज़ीस्त का सहारा है.. उर्मिला माधव 24.9.2020

क्या करें

आग ग़ैरों ने लगाई बोलो इसका क्या करें, हार कर बैठें के या फिर हौसला ज़िंदा करें, कोई भी इस ज़िन्दगी में साथ तो देता नहीं, ख़ुद-ब-ख़ुद उठ जाएँ ख़ुद ही रास्ता पूरा करें, ज़िन्दगी कुछ भी नहीं है एक सिवाए हादसा, फिर भी इन हालात से कुछ खूबियां पैदा करें, पाँव के छाले न देखें,ज़िन्दगी रख्खें रवाँ, ये न सोचें किसलिए अब रास्ता नापा करें, कौन है यक़ता यहाँ पर सब के सब हैं एक से, ख़ुद को अदना मान कर क्यूं दिल भला छोटा करें फ़र्ज़ को अंजाम देना है बहुत तरतीब से, हर नफ़स ही कीमती है वक़्त क्या ज़ाया करें.... उर्मिला माधव... 21.9.2016

रिसाले देखना

जब कभी पिछले रिसाले देखना, हंसने वालों के भी छाले देखना, मुस्कुराहट पर फ़क़त जाना नहीं, हो सके तो आह-ओ-नाले देखना, महफ़िलों औ-क़ह्क़हों के शोर में, आंसुओं वाले......निवाले देखना, कुछ फ़सीलें तो झड़ी होंगी मगर, रंग पर्दों के निराले.........देखना, बिन चरागों के वहीँ मिल जायेंगे, जाके उनके घर के आले देखना.... उर्मिला माधव.... 19.9.2014

फ्री वर्स

जंगली, जंजाल देखो, मकड़ियों के, जाल देखो, आदमी का, हाल देखो, लड़कियों के नाम पर, रोज़ इक वबाल देखो, इज़्ज़तों पे क़ाबिज़ हैं, माईयों के लाल देखो, उफ़ अगर जो करनी है, गर्दनें हलाल देखो, हक़ जो कह रहे हैं उनकी खिंच रही है,खाल देखो, उँगलियाँ उठाने को, ख़ुद-ब-ख़ुद बहाल देखो, जो अलिफ़ न सीख पाए, उनका दाल,ज़ाल देखो, रेप,सीना जोरी की, रोज़ एक मिसाल देखो, देश के खिलाड़ियों को, हाय ख़स्ता हाल देखो जीत आईं ओलिम्पिक, उनका इस्तेमाल देखो, उसके आगे क्या होगा, ये है इक सवाल देखो, कुछ न मिलना,जाना है चेहरों पे मलाल देखो, सोचने का काम क्या है, बस यही हर साल देखो, उर्मिला माधव.. 19.9.2016

बीमार कर गए

उफ़ ज़िन्दगी के मरहले बीमार कर गए , ये सीखने को हम भी मगर दार पर गए , दामन में सिर्फ कांटे हैं और आबला-ए-पा, रस्ता बहुत कठिन था मगर पार कर गए , कुछ आरज़ू थी,कुछ थे इरादे बहुत बड़े , कुछ रास्ते के गम मुझे खुद्दार कर गए , सब लोग क्या कहेंगे यही डर बहुत रहा , क्या-क्या सुनेंगे हम जो अगर हार कर गए ... किसको अज़ीज़ होगी कहो ये अज़ल की राह, हम से ही  सिर फिरे हैं ,जिगर वार कर गए ...  उर्मिला माधव ... १४.९.२०१३

कसम उठवाई है

उसमें ग़र सुरख़ाब के पर ही लगे हैं,इससे क्या, अलविदा की उसने ही हमसे कसम उठवाई है... हर तरह खामोशियाँ लाज़िम हैं अपनी ज़ात को, अपना ग़म दिखलायेंगे तो इसमें अब रुसवाई है, उर्मिला माधव

मोड़ माड़ कर

Likkha jo hasraton se unhen khat kabhi janaab, Khiise main berukhi se rakhaa mod maad kar Hamko hamaari rooh ne aagaah kar diyaa Bas ham bhi chal diye lo unhen chhod chhad kar उर्मिला माधव

आशनाई न थी

नसीर तुराबी की तर्ज़ पर--- बराए नाम था वो,उससे आशनाई न थी, ये बात हमने किसीको कभी बताई न थी, फ़रेब देके कई बार उसने देख लिया, मगर ये ज़ीस्त ज़रा सी भी डगमगाई न थी, जब उसके दिल ने कहा उसने फिर पुकारा हमें, अजीब ज़िद सी रही हम में एक रसाई न थी,   वो मेरे शहर में आ आ के लौट जाता रहा, कभी मिलेंगे नहीं ये कसम भी खाई न थी उर्मिला माधव

ख़िताब वाले

रुतबा दिखा रहे हैं,इल्म-ओ-ख़िताब वाले, हैरत में पड़ गए हैं,इज़्ज़त-ओ-आब वाले, कितनी मुख़ालफ़त है, आए हुजूम लेकर, आंखें मिला रहे हैं, ईमान-ओ- ख़ाब वाले, जज़्बात मांगती है, हर्फ़-ओ-अदब की दुनियां, गिनती सिखा रहे हैं,कागज़ किताब वाले, दावा ही कब किया है,फ़नकार हम हैं यारब, फिर भी सवाल लेकर,आए हिसाब वाले, सबको है ये तआज्जुब,ज़िंदा हैं हम अभी तक, तूफां से लड़ सके हैं, बस इज़तराब वाले बाद-ए-सबा में हर सू कीलें उछल रही हैं, सूली से कब डरे हैं , ईसा की ताब वाले, उर्मिला माधव, 14.9.2017

तुरपाई हो

ज़ख़्म ही रिसते रहें तब किस तरह तुरपाई हो, ग़म को रुसवा कर रहे हो,क्या बहुत हरजाई हो ? रब को हाज़िर और नाज़िर जान कर सुनते रहे, पर कभी ऐसा भी कह दो,जिसमें कुछ अच्छाई हो, पुरशिसे ग़म को अगर तुम आए हो तो शर्त है, आंख नम काफ़ी नही है,दिल में भी बीनाई हो, किसको अपना ग़म कहें ये फैसला करना है ख़ुद मुनहसिर करता है दिल पर,ग़ैर हो या भाई हो, अब महज़ दरकार है माहौल इस दिल के तईं, बारिशों का ज़ोर हो और खुशनुमां पुरवाई हो, सुर्ख़ आरिज़ कह रहे थे,ग़म गुज़िश्ता रात का, लब मगर ख़ामोश हैं क्यूँ बे-सबब रुसवाई हो, उर्मिला माधव, 14.9.2018

ज़हीनों के शहर में

एक मतला तीन शेर----- हम ज़हीनों के शह्र में रह रहे, इसलिए ये बात सबसे कह रहे,  जिसको देखो दूर की ही हांकता, खूब अंदाज़-ए-बयां हम सह रहे, है हवा के ही मुताबिक पीठ भी, और हवा के साथ ही तो बह रहे, सच कहें तो अक्ल जैसे खो गई, रेज़:- रेज़: हो गए अब...ढह रहे..... उर्मिला माधव... 8.9.2014...

बारिश है

लोग कहते हैं.....भई,नवाजिश है, ये भी तो एक तरह की साज़िश है, लफ्ज़ शीरीं जुबां.........शहद जैसी, दिल के अन्दर अजब सी खारिश है,  जब कभी ये.....उफ़क  कहीं रोया, हंस के कहते हैं लोग.....बारिश है, हम से मिलना तो साफ़ दिल लेके, अपनी हर इक से ये..गुजारिश है... उर्मिला माधव.... 8.9.2014...

आता रहेगा

ख्वाजा मीर दर्द सा'ब की तर्ज़ पर ,ब शुक्रिया--- ------------------------------------------- अगर इस क़दर दिल दुखाता रहेगा, यक़ीनन ही बस आता-जाता रहेगा, तवज्जो को जाने न जाने तगाफ़ुल, फ़क़त दीदा-ए- तर दिखाता रहेगा  भटकती फ़ज़ाओं की तनहाइयों में  जबीं कोई कब तक झुकाता रहेगा, अजब खेल देखा ज़माने में दिल का, जो ठुकरा दे उस पर ही आता रहेगा, जहां पर कभी कोई इज्ज़त न पायी, उसी दर पे रह-रह के जाता रहेगा, उर्मिला माधव ... 8.9.2015

दफ़ा हो गए हैं

अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं, बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए हैं सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको, जवां क्या हुए,........बे-वफ़ा हो गए हैं, वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना, किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं, उर्मिला माधव... 23.10.2014

अदा कहिए

ये एक फिल्बदी के तहत है... ------------------------------------- उसके इनकार को अदा कहिये, दौर-ए-मुश्किल में और क्या कहिये, आगे नज़रों के जो भी आजाये, बा-अदब उसको ना खुदा कहिये, ज़िन्दगी जिस तरह भी चलती हो, शुक्रिया उसको बा दुआ कहिये , धडकनें दिल की साथ उड़ लेंगी, जश्न-ए-दौरां में बस हवा कहिये, दिल पै कितना ही कुछ गुज़रता हो, उसको हरगिज़ न बे-वफ़ा कहिये उर्मिला माधव... 19.10 2014...

ख़ूबियाँ कोई नहीं

राह जो चलनी है इसमें खूबियाँ कोई नहीं, रूह-ए-खुद को छोड़ के वक़्त-ए-गिरां कोई नहीं, पथ्थरों के आदमी हैं और दहर जलता हुआ, चिलचिलाती धूप है ऑ आशियाँ कोई नहीं, और कितना आज़माना,जो हुआ वो खूब है, तुम वही हो,हम वही राज़-ए-निहां कोई नहीं, है नया कुछ भी नहीं क्यूं इस क़दर हैरां हुए, साथ चलने को तुम्हारे,अय मियाँ कोई नहीं, सामने मक़्तल हुआ लो फ़िक़्र से खारिज़ हुए बस यही रस्ता है...जिसके दरमियाँ कोई नहीं..... उर्मिला माधव, 7.10.2014

कुछ नहीं होगा

फ़िक़्र करने से कुछ नहीं होगा, आह भरने से कुछ नहीं होगा, दिल में इक इन्कलाब है तो है, मुफ़्त डरने से कुछ नहीं होगा, राह भी इन्तिख़ाब करके चल, बात करने से कुछ नहीं होगा, ले सहर खुशनुमा मुकाबिल है, यूँ सिहरने से कुछ नहीं होगा, मुस्कुरा, ये भी मन दुरुस्ती है, जीने मरने से कुछ नहीं होगा, हादिसे आदतों में शामिल कर, यूँ बिखरने से कुछ नहीं होगा.... उर्मिला माधव... 9.10.2014...

मानी कहाँ

इल्तिज़ा उसने मेरी मानी कहाँ, पर मिरे भी सब्र का सानी कहाँ, कांपती आवाज़ में रोका किये, उसने वो आवाज़ पहचानी कहाँ, सूखती है ये सरापा भीग कर, इश्क़ की बुनियाद में पानी कहाँ, मैंने उसके हाल पर छोड़ा उसे, हो सकी तब कोई मनमानी कहाँ, उर्मिला माधव... 30.8.2014...

जब तुमसे हम मिले थे

जब तुमसे हम मिले थे हमें होश ही न था, अब सोचते हैं,क्या वो मुलाक़ात सच में थी ? तुम याद कुछ दिलाओ हमें,हम कहाँ रहे, कोइ बात भी हुई थी वहां?किसके हक़ में थी ? उर्मिला माधव.... 8.9.2016

पछताओगे

lप्यार न करना पछताओगे, क़दम-क़दम पे घबराओगे, ये क्यूँ पहना, वो मत पहनो, सुनते-सुनते थक जाओगे, उसको घूर के देख रहे थे ? लगता था के मर जाओगे!! मैं तो जैसे बे मतलब हूँ, जाओ, उसीके घर जाओगे ? मेरे आगे झूठा ड्रामा ?? बात-बात पे डर जाओगे, सच्चाई तो मुझे पता है, झूठी कसमें कब खाओगे ? अपनी ग़लती, छुप जाए सो, बात-बात पर चिल्लाओगे, क्या-क्या समझ में आया भैया? प्यार अभी भी फ़रमाओगे ? उर्मिला माधव, 7.9.2018

करने लगी है

काम मेरा बेख़ुदी करने लगी है, देख मैंने नींद फिर गिरवीं रखी है, ठीक रहता है कभी खामोश रहना, ये मेरी आदत है,मेरे संग चली है, Urmila Madhav.. 7.9.2016

एक मतला

क्या ही बेहतर हो उतारें,दिल से अब बार-ए-मुहब्बत, कब तलक सजदा करें यूँ तुझको हम दार-ए-मुहब्बत.. उर्मिला माधव.. 7.9.2016

मर सा गया

एक एहसास था जो मर सा गया, दिल ये हस्सास था सिहर सा गया, बेश कीमत था एक मरासिम जो, हाँ बहुत ख़ास था जिगर सा गया, हम समझते थे उसको नूर-ए-नज़र, उसका एक पास था गुज़र सा गया, सिर्फ़ ग़फ़लत थी इक मसर्रत की, ग़म भरा लिबास था,उतर सा गया, उसको अब कौन कहने जाता है, रेत की प्यास था,बिखर सा गया... उर्मिला माधव 7.9.2017..

कुछ भी अगर कहा होगा

मैंने कुछ भी अगर कहा होगा, उससे उसका कहाँ भला होगा, वो तो अल्फ़ाज़ सिर्फ़ सुनता है किस तरहा मुत्मइन रहा होगा, उसको मज़मून से नहीं मतलब, ध्यान मीज़ान पर धरा होगा, वैसे इक ख़त जो मैंने भेजा है, उसने महफ़िल में ही पढ़ा होगा, ख़ुद तो पत्थर सा बन के बैठा है, दिल भी पत्थर का ही बना होगा, जो है आदत से अब भी हरजाई, जाने वो किस तरहा बड़ा होगा, उर्मिला माधव

कैसे जुदा करते

तुम्हारी याद इस दिल से भला कैसे जुदा करते ?? तकाज़ा है मुहब्बत का बताओ और क्या करते ?? मुहब्बत में नहीं लाज़िम बहुत महदूद हो जाना ज़रा इतना समझ लेते कोई तो इत्तिला करते हम अपनी जान से करते,तुम्हारे प्यार का सदका, कोई दम तुम यहाँ आके फ़क़त वादा वफ़ा करते उर्मिला माधव... ३.९.२०१३

आधा ही ग़म देखा होगा

आधा ही ग़म देखा होगा, इसीलिए कम देखा होगा, बारिश का जलवा नींदों में, खूब झमाझम देखा होगा, बड़े दरख्तों की शाख़ों पर, पत्तों को नम देखा होगा, बिना पंख जब उड़ा तखैयुल, चाँद को मध्धम देखा होगा, पुर सुकून आँखों का मंज़र ?? आब-ए-जमजम देखा होगा... ------------------------------------- aadhaa hii gam dekhaa hogaa, isiliye.......kam dekhaa hogaa, baarish ka jalwaa niindon main, khoob jhamaajham dekha hogaa, bade darakhton kii shaakhon par, patton ko nam dekhaa dekha hogaa, binaa pankh jab udaa takhaiul, chaand ko madhdham dekhaa hoga, pur sukoon aankhon ka manzar, aab-e-jamjam dekhaa hogaa... उर्मिला माधव... 3.9.2014...

मिस्ल ए जहां हैं

आजकल हम सिर्फ़ इक मिस्ल-ए-जहां हैं, जो हुआ करते थे हम अब वो कहाँ हैं, हम नहीं बोलेंगे ख़ुद से तब तलक अब, जब तलक दिल में जहाँ के ग़म निहाँ हैं, हमने अपने वास्ते सोचा न कुछ भी, उस पे ये इल्ज़ाम हम पर,बदज़ुबां हैं, देखते भी क्या कभी खुशियों की जानिब, हम निशाने ही फ़क़त वक़्त-ए-गराँ हैं, टुकड़े टुकड़े ज़िन्दगी बिखरी रही बस, अपनी किस्मत में लिखे ग़म के निशाँ हैं... यक़-ब-यक़ हमको हुआ महसूस ऐसा दिल अकेला है ग़मों के कारवां हैं... #उर्मिलामाधव, 3.9.2015

अब ज़रूरी हो गया

अब ज़रूरी हो गया राहें बदलना, ख़ुद खड़े रहना अकेले है संभलना, राह को हमवार करना ख़ुद-ब-ख़ुद ही, और ख़ुद ही वक़्त के साँचे में ढलना, भीख में क्या माँगना, कोई मुहब्बत, जिस तरह हो ख़ुद के ही पैरों से चलना, दम बख़ुद आज़ाद हैं अपने जहां में, दम बख़ुद छोड़ेंगे गैरों पै मचलना, दूसरों के दिल पै क्यूँ पाबंदियां हों, ख़ुद भी आँखों को नहीं रो के मसलना... #उर्मिलामाधव.. 3.9.2015

कैसे जुदा करते

तुम्हारी याद इस दिल से भला कैसे जुदा करते ?? तकाज़ा था मुहब्बत का बताओ और क्या करते ?? मुहब्बत में नहीं लाज़िम बहुत महदूद हो जाना ज़रा इतना समझ लेते तो फिर ख़ुद राब्ता करते, हम अपनी जान से करते,तुम्हारे प्यार का सदका, कोई दम तुम यहाँ आकर फ़क़त वादा वफ़ा करते, अगर हम मर भी जाते तो,ये आँखें मुन्तज़िर होतीं, कहीं तुम चल के आ जाते,ऑ दामन से हवा करते, न जाने क्या समझ कर ज़िन्दगी ने कर दिया तनहा, अगर तुम साथ होते तो मुख़ालिफ़ भी दुआ करते, उर्मिला माधव... 3.9.2013

सोचा बहुत

रात हमने आईना देखा बहुत, और तब अपने तईं सोचा बहुत, इस क़दर हावी हुईं कमज़ोरियाँ ? अपने जी पै तीर,ख़ुद साधा बहुत? पाँव पर है धूप,सर पर आफ़ताब, दिल अबस ही शबनमी,भीगा बहुत, रफ़्ता-रफ़्ता राह भी कट जायेगी, हमसफ़र क्यों बेवज्ह चाहा बहुत? अपनी सारी ख़ूबियों को भूल कर, यार का दर्ज़ा किया ऊंचा बहुत, उसके बिन जीना हुआ मंज़ूर अब, एक दामन जो कभी थामा बहुत, क्या हुआ जो रात भर सोये नहीं, पर सहर में ख़ुद को तो पाया बहुत... #उर्मिलामाधव, 26.8.2015..

पास होना है

ग़म तिरे कितना पास होना है ? हमको कितना उदास होना है ? ये तआरुफ़ है ज़िंदगानी का? उम्र भर ग़म शनास होना है ? क्या बदलना है इन लिबासों का, आख़िरश बे लिबास होना है, उर्मिला माधव, 3.9.2018

पसीना आ गया

जिसपे दुनियां को पसीना आ गया, मुझको आसानी से जीना आ गया, है अजब सा वाक़या पर सच भी है, ग़ैर के ज़ख्मों को सींना आ गया, मेरी आँखों में अजब तासीर थी, चल के साहिल पे सफ़ीना आ गया, लोग छाती पीट कर क्यूँ रो गये क्या मोहर्रम का महीना आ गया? ज़िन्दगी पाकर सभी यूँ खुश हुए, जैसे हाथों में नगीना आ गया... उर्मिला माधव,