मिस्ल ए जहां हैं
आजकल हम सिर्फ़ इक मिस्ल-ए-जहां हैं,
जो हुआ करते थे हम अब वो कहाँ हैं,
हम नहीं बोलेंगे ख़ुद से तब तलक अब,
जब तलक दिल में जहाँ के ग़म निहाँ हैं,
हमने अपने वास्ते सोचा न कुछ भी,
उस पे ये इल्ज़ाम हम पर,बदज़ुबां हैं,
देखते भी क्या कभी खुशियों की जानिब,
हम निशाने ही फ़क़त वक़्त-ए-गराँ हैं,
टुकड़े टुकड़े ज़िन्दगी बिखरी रही बस,
अपनी किस्मत में लिखे ग़म के निशाँ हैं...
यक़-ब-यक़ हमको हुआ महसूस ऐसा
दिल अकेला है ग़मों के कारवां हैं...
#उर्मिलामाधव,
3.9.2015
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