ज़हीनों के शहर में

एक मतला तीन शेर-----

हम ज़हीनों के शह्र में रह रहे,
इसलिए ये बात सबसे कह रहे, 

जिसको देखो दूर की ही हांकता,
खूब अंदाज़-ए-बयां हम सह रहे,

है हवा के ही मुताबिक पीठ भी,
और हवा के साथ ही तो बह रहे,

सच कहें तो अक्ल जैसे खो गई,
रेज़:- रेज़: हो गए अब...ढह रहे.....
उर्मिला माधव...
8.9.2014...

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge