तुरपाई हो
ज़ख़्म ही रिसते रहें तब किस तरह तुरपाई हो,
ग़म को रुसवा कर रहे हो,क्या बहुत हरजाई हो ?
रब को हाज़िर और नाज़िर जान कर सुनते रहे,
पर कभी ऐसा भी कह दो,जिसमें कुछ अच्छाई हो,
पुरशिसे ग़म को अगर तुम आए हो तो शर्त है,
आंख नम काफ़ी नही है,दिल में भी बीनाई हो,
किसको अपना ग़म कहें ये फैसला करना है ख़ुद
मुनहसिर करता है दिल पर,ग़ैर हो या भाई हो,
अब महज़ दरकार है माहौल इस दिल के तईं,
बारिशों का ज़ोर हो और खुशनुमां पुरवाई हो,
सुर्ख़ आरिज़ कह रहे थे,ग़म गुज़िश्ता रात का,
लब मगर ख़ामोश हैं क्यूँ बे-सबब रुसवाई हो,
उर्मिला माधव,
14.9.2018
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